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Symbol of Democracy_Political Party symbols लोकतंत्र के प्रतीक राजनीतिक चुनाव चिन्ह

दैनिक जागरण, 27/04/2019


इस बात को ध्यान में रखते हुए ही निर्वाचन आयोग ने 30 जुलाई 1951 को भारतीय चुनावों में निर्वाचन प्रतीकों के आरक्षण और आबंटन के उद्देश्य से नई दिल्ली में एक बैठक बुलाई। देश के पहले मुख्य निर्वाचन आयुक्त सुकुमार सेन की अध्यक्षता में हुई इस बैठक में प्रमुख राजनीतिक दलों के प्रतिनिधि शामिल हुए। इस बैठक में आमंत्रित अखिल भारतीय स्तर पर स्थापित राजनीतिक दलों से पूरे देश में उनके प्रत्याशी को एक विशिष्ट प्रतीक (चिन्ह) आबंटित करने के विषय पर चर्चा हुई। जिसमें भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, अखिल भारतीय फॉरवर्ड ब्लाक (रूइकर), अखिल भारतीय फॉरवर्ड ब्लाक (मार्क्सवादी), अखिल भारतीय हिंदू महासभा, किसान मजदूर प्रजा पार्टी, अखिल भारतीय रामराज्य परिषद और सोशलिस्ट पार्टी के प्रतिनिधि शामिल थे। अखिल भारतीय अनुसूचित जाति फेडरेशन को भी इस बैठक के लिए आमंत्रित किया गया था पर उसने अपने किसी प्रतिनिधि को न भेजते हुए, चुनाव चिन्ह के संबंध में अपने दृष्टिकोण के बारे में सूचित कर दिया था।

निर्वाचन आयोग ने चुनाव चिन्ह प्रदान करने की योजना के का प्रारूप की प्रतियां बैठक से पहले ही प्रमुख राजनीतिक दलों को वितरित कर दी थी। इस बैठक में हुई चर्चा के बाद, राजनीतिक दलों में चार मुख्य बिंदुओं पर आम सहमति बनी। पहला, एक राष्ट्रीय दल के सभी प्रत्याशियों के समूचे भारत में विधानसभा और संसदीय चुनावों में एक ही चुनाव चिन्ह का प्रयोग, दूसरा अनुसूचित जाति एवं जनजाति के लिए आरक्षित सीटों से चुनाव लड़ने वाले दलीय प्रत्याशियों को अलग से चुनाव चिन्ह की अनिवार्यता न होने के साथ उनके दलीय चुनाव चिन्ह की पहचान के लिए, उस पर एक घेरे का अतिरिक्त निशान लगाना, तीसरा मतदान केंद्र में मतदान पेटी पर राजनीतिक चुनाव चिन्ह के होने के अलावा प्रत्येक प्रत्याशी का नाम अंकित होना तथा चौथा प्रत्येक दल के अपने चयनित आधिकारिक प्रत्याशी की पहचान के लिए हरेक राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी को चयनित व्यक्ति या उन व्यक्तियों के नामों के बारे में सूचना देना, जिन्हें दल ने अपने प्रत्याशियों के चयन के विषय में निर्णय के बारे में अवगत करवाने के लिए अधिकृत किया है।

देश के राष्ट्रीय दलों में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने अपने चुनाव चिन्हों के लिए क्रमषः पहली वरीयता में दो बैलों की जोड़ी और दूसरी वरीयता में चरखे वाला कांग्रेसी ध्वज के चिन्ह, अखिल भारतीय फॉरवर्ड ब्लाक (रूइकर) ने मानवीय हथेली, लालटेन और झोपड़ी के चिन्ह, अखिल भारतीय फॉरवर्ड ब्लाक (मार्क्सवादी) ने छलांग लगाते शेर, खड़े शेर और भारत के नक़्शे पर खड़े शेर के चिन्ह, अखिल भारतीय हिंदू महासभा ने स्वास्तिक के साथ तलवार, घोड़ा और सवार और पेड के चिन्ह़, किसान मजदूर प्रजा पार्टी ने झोपड़ी, तराजू की जोड़ी और पेड़ के चिन्ह, अखिल भारतीय रामराज्य परिषद ने दुधारू गाय-बछड़े के साथ महिला, उगता आधा सूरज और स्वास्तिक के चिन्ह, सोशलिस्ट पार्टी ने हल, पेड़, मानवीय हाथ और छाते के चिन्ह तथा अखिल भारतीय अनुसूचित जाति फेडरेशन ने हाथी के चिन्ह का चयन किया था। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने 30 जुलाई 1951 को हुई बैठक में आमंत्रण के लिए, निर्वाचन आयोग से कुछ देरी से संपर्क किया। वैसे, भाकपा ने दो अगस्त 1951 को हथौड़ा और दरांती और मकई की बालियों के एक ओर हंसिया और दूसरी तरफ हथौड़े वाले चिन्ह के साथ अपने विकल्प के बारे में सूचित किया।

निर्वाचन आयोग ने दो अगस्त 1951 को विभिन्न राष्ट्रीय दलों के चुनाव चिन्हों को लेकर प्राप्त आवेदनों पर निर्णय लेते हुए, छह दलों को चुनाव चिन्हों के आवंटन की घोषणा की। इसमें अखिल भारतीय फॉरवर्ड ब्लाक (मार्क्सवादी) को "खड़ा हुआ शेर", अखिल भारतीय फॉरवर्ड ब्लाक (रूइकर) को "मानवीय हाथ", अखिल भारतीय हिंदू महासभा को "घोड़ा और सवार", किसान मजदूर प्रजा पार्टी को "झोपड़ी", अखिल भारतीय रामराज्य परिषद को "उगता आधा सूरज" तथा अखिल भारतीय अनुसूचित जाति फेडरेशन को "हाथी" का चुनाव चिन्ह प्रदान किया गया।

फिर, 17 अगस्त 1951 को निर्वाचन आयोग ने पांच अन्य राष्ट्रीय दलों को चुनाव चिन्ह दिए। जिनमें भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को "दो बैलों की जोड़ी", सोशलिस्ट पार्टी को "पेड़", भाकपा को "मकई की बालियों के साथ हंसिया" (उन क्षेत्रों में जहां दल को अवैध घोषित नहीं किया गया था), रिवोल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी को "कुदाल के साथ फावड़ा" (दिल्ली, असम, बिहार, मद्रास, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल और त्रावणकोर कोचीन में) तथा रिवोल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया को "जलती मशाल" (बम्बई, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल में) के चुनाव चिन्ह जारी किए गए। सात सितंबर 1951 को निर्वाचन आयोग ने तीन और दलों को चुनाव चिन्ह प्रदान करते हुए बोल्शेविक पार्टी ऑफ़ इंडिया को "सितारा", कृषिकार लोक पार्टी को "गेंहू झाड़ता किसान" और अखिल भारतीय जनसंघ को "दीपक" का चुनाव चिन्ह प्रदान किए।

इस तरह अंत में, निर्वाचन आयोग ने 8 सिंतबर 1951 को चुनावों में उपयोग के लिए 26 चुनाव चिन्हों की पूरी एक सूची प्रकाशित की। इस सूची में पहले चौदह चुनाव चिन्ह (दो बैलों की जोड़ी, पेड़, खड़ा हुआ शेर, मानवीय हाथ, घोड़ा और सवार, झोपड़ी, उगता आधा सूरज, हाथी, मकई की बालियों के साथ हंसिया, कुदाल के साथ फावड़ा, जलती मशाल, सितारा, धान ओसाता किसान, दीपक, धनुष-बाण, रेलवे इंजिन, साईकिल, छकड़ा, नाव, फूल, घड़ा, सीढ़ी, तराजू, मुर्गा, ऊंट और दो पत्तियों वाली एक टहनी) केवल राष्ट्रीय दलों के लिए आरक्षित थे और इन दलों से संबंध न रखने वाले किसी भी प्रत्याशी को इनका आवंटन नहीं हो सकता थां।

ऐसे में, निर्वाचन आयोग ने यह निर्देश भी दिया कि कोई भी प्रत्याशी रिटर्निंग अफसर (चुनाव अधिकारी) की अनुमति के बिना इन 14 चुनाव चिन्हों में से कोई भी चिन्ह नहीं ले सकता। इस कारण ही, दिल्ली में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (दो बैलों की जोड़ी), भारतीय जनसंघ (दीपक), किसान मजदूर प्रजा पार्टी (झोपड़ी), अनुसूचित जाति फेडरेशन (हाथी), रामराज्य परिषद (उगता आधा सूरज) और  हिंदू महासभा (स्वास्तिक के साथ तलवार) ने आबंटित चुनाव चिन्हों के साथ पहले लोकसभा चुनावों में हिस्सा लिया।

देश में 1952 में हुए पहले लोकसभा चुनावों में दिल्ली में छह राजनीतिक दलों के प्रत्याशियों सहित निर्दलीय अपने-अपने चुनाव चिन्हों के साथ मैदान में उतरे थे। इन राजनीतिक दलों को मिले चुनाव चिन्हों की कहानी का विवरण अनजाना ही है।  भारत निर्वाचन आयोग प्रथम आम चुनावों में बहुसंख्यक निरक्षर मतदाताओं को देखते हुए, चुनावों में मतदाताओं की अधिकतम भागीदारी के लिए एक पारदर्शी और सहज चुनावी प्रक्रिया सुनिश्चित करना चाहता था।


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