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pasandida line

कभी किसी का साथ

ऐसा मत छोड़ना दोस्त

जिंदगी बहुत लंबी है

फिर आमने सामने ला खड़ा करती है

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मीडिया विमर्श_media discourse

चंदा करने के बजाय अपने शेयर दर्शकों को बेचने का विकल्प भी जनवादी है। आखिर खाली-पीली रोने वाली रुदालियों और खीसे से कुछ खर्च न करने वालों की पहचान तो होगी! हिंदी में एक कविता की किताब भले ही "तीन सौ" में बेस्ट सेलर न बने पर एक "काव्यात्मक स्वप्न" को तो फेसबुकिया सेक्युलर हिन्दू नहीं हिंदी समाज साकार कर ही सकता है.
चैनल_बेक चैनल_मनी_ब्लैक मनी
अगर प्रगतिशील चैनल के लिए, "चार बड़े चिंता करने वाले" अपना लखटकिया 'अंशदान' दे तो एक शुरूआत हो सकती है!
नहीं तो "चारे का पैसा" ही सही, सेकुलरिज्म के नाम पर इतना तो बनता है.
परिवार न सही किसी के तो काम आएँगी, लक्ष्मी मैय्या भले ही काली सही!
आखिर "बेचारा चैनल" तो बाजार में बे-भाव बिकने से बचेगा?
गंगा-जमुनी तहजीब की कसम, इतने बेगैरत तो हम न समझे थे, तुमको.
विडम्बना है कि आज समाज का पढ़ा लिखा तबका, नेताओं को 'गुंडा' बता रहा है तो राजनीति पुरुष पत्रकार को 'दलाल' और महिला पत्रकार को 'वारांगना' जैसे विशेषणों से नवाज रही है. कुछ-एक के ख़राब होने से सभी पर एक ही ठप्पे को चस्पां …

Women in Indian Constituent Assembly (भारतीय संविधान सभा में महिला सदस्य)

Proceedings of Constituent Assembly, as published by the Lok Sabha Secretariat, suggest that fifteen women Members were present throughout the tenure of the Constituent Assembly. These includes Ammu Swaminathan, Annie Mascarene, Begum Aizaz Rasul, Dakshayani Velayudan, G. Durgabai, Hansa Mehta, Kamla Chaudhri, Leela Ray, Malati Chowdhury, Purnima Banerji, Rajkumari Amrit Kaur, Renuka Ray, Sarojini Naidu, Sucheta Kripalani and Vijayalakshmi Pandit. लोकसभा सचिवालय की ओर से प्रकाशित संविधान सभा की कार्यवाही के अनुसार, भारतीय संविधान सभा के कार्यकाल के दौरान पन्द्रह महिला सदस्य उपस्थित थी। इनमें, अमू स्वामीनाथन, एनी मासकरीन, बेगम ऐजाज रसूल, दक्षयनी वेलायुदन, जी दुर्गाबाई, हंसा मेहता, कमला चैधरी, लीला रे, मालती चौधरी, पूर्णिमा बनर्जी, राजकुमारी अमृत कौर, रेणुका रे, सरोजनी नायडू, सुचेता कृपलानी और विजयलक्ष्मी पंडित थी।

united province Muslims_partition of india_उत्तर प्रदेश के मुसलमान और देश विभाजन

फोटो: मुस्लिम  लीग वर्किंग कमेटी, लखनऊ 
हमें भूलना नहीं चाहिए कि धर्म के आधार पर इस देश का विभाजन उन मुसलमानों ने नहीं करवाया जो मुस्लिम बहुल प्रदेशों में रहते थे। यह विभाजन उत्तर प्रदेश के मुसलमानों की सांप्रदायिकता के कारण हुआ जहां गंगा-जमनी संस्कृति की सबसे ज्यादा बातें होती थीं।  -प्रभाष जोशी (आड़ी और खड़ी रेखाओं में, हिंदू होने का धर्म)