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Saturday, December 21, 2019

Surajmal Jat beyond third battle of Panipat_पानीपत से आगे, सूरजमल की कहानी

21122019_दैनिक जागरण 


हाल में रिलीज हुई हिंदी फिल्म "पानीपत" के कारण जाट राजा सूरजमल को ऐतिहासिक चरित्र दोबारा चर्चा में आ गया। उल्लेखनीय है कि फिल्म कथानक में उनके सही चरित्र चित्रण न किए जाने को लेकर काफी असंतोष भी देखा गया। जबकि पानीपत की लड़ाई (वर्ष 1761) में ऐन मौके पर सदाशिव भाऊ के व्यवहार से बेजार होकर अपनी सेना सहित मैदान से हटने वाले सूरजमल का उदात्त मानवीय चरित्र युद्ध के पश्चात् घायल मराठा सेना और स्त्रियों को सुरक्षा और शरण देने से उजागर हुआ।

नटवर सिंह ने अपनी पुस्तक "महाराजा सूरजमल" में लिखा है कि पानीपत युद्ध से बचे हुए एक लाख मराठे बिना शस्त्र, बिना वस्त्र और बिना भोजन सूरजमल के राज्य-क्षेत्र में पहुंचे। सूरजमल और रानी किशोरी ने प्रेम और उल्लास से उन्हें ठहराया और उनका आतिथ्य किया। हर मराठे सैनिक या अनुचर को खाद्य सामग्री दी गई। घायलों की तब तक शुश्रूषा की गई, जब तक कि वे आगे यात्रा करने योग्य न हो गए।

अंग्रेज इतिहासकार ग्रांट डफ ने मराठे शरणार्थियों के साथ सूरजमल के बरताव के बारे में लिखा है कि जो भी भगोड़े उसके राज्य में आए, उनके साथ सूरजमल ने अत्यन्त दयालुता का बरताव किया और मराठे उस अवसर पर किए गए जाटों के व्यवहार को आज भी कृतज्ञता तथा आदर के साथ याद करते हैं। फादर वैंदेल, और्म की पांडुलिपि के अनुसार, (पानीपत की लड़ाई के परिणामस्वरूप) सूरजमल उन अनेक महत्वपूर्ण स्थानों का स्वामी बन गया, जो इससे पहले पूरी तरह मराठों के प्रभाव-क्षेत्र में थे। चम्बल के इस ओर उसके सिवाय अन्य किसी का शासन नहीं था और गंगा की ओर भी लगभग यही स्थिति थी।

अठारहवीं शती तक मुगल शासन की यह स्थिति हो गई थी कि दिल्ली में बादशाहत कमजोर पड़ने से सारे देश में सत्ता की छीनझपट आरम्भ हो गई थी। मुगल बादशाह मुहम्मद शाह राग-रंग-रस में इतना मग्न रहता था कि परदेश से नादिरशाह और अहमद शाह के रेले आते और किले और नगर को लूटकर जाते रहे, देश और प्रजा का कुछ भी होता रहा, वह तो अपनी लालपरियों के आगोश में मस्त रहा।

इतिहास के अनुसार, ब्रजप्रदेश पर अब्दाली के आक्रमण दो बार हुए। पहला आक्रमण 26-27 फरवरी 1757 को जहान खां अफगानी के सेनापतित्व में हुआ था, फिर नजीम खां आया था और दूसरी बार का आक्रमण पन्द्रह दिन बाद स्वयं अब्दाली के नेतृत्व में हुआ था। लेकिन चाचा वृन्दावन दास की लंबी कविता "श्री हरिकला बेला" के अनुसार वर्ष 1757 और वर्ष 1761 में तीन वर्ष के अंतराल से वे आक्रमण किए गए थे। उल्लेखनीय है कि अन्तिम आक्रमण के बाद कवि ने "हरिकला बेला" की रचना भरतपुर में सुजानसिंह सूरजमल के शासनकाल में की थी।

उत्तर मुगल काल में नादिरशाह का आक्रमण दिल्ली तक और उसके बाद अहमद शाह दुर्रानी अब्दाली का आक्रमण मथुरा-वृन्दावन तक हुआ था। उन दोनों को यहां हमले के लिए आमंत्रित किया गया था। असली बात यह थी कि ब्रज प्रदेश का जाट राजा सूरजमल और दक्खिन के मराठे दिल्ली पर निगाह लगाए हुए थे और जो अपने को दिल्ली का वंशागत मालिक समझते थे, वे इन शक्तियों से घबड़ाए हुए थे।

अहमदशाह अब्दाली को विशेष रूप से सूरजमल जाट की बढ़ती शक्ति और प्रभाव से टक्कर लेने के लिए बुलाया गया था। उसका वश सूरजमल पर तो चला नहीं, मथुरा-वृंदावन की लूटपाट और हिन्दुओं के सिरों की मीनारें बनाकर ही वह लौट गया। ऐसे में अब्दाली के सूरजमल को कुचल डालने के बुलावा की बात बेअसर ही रही और उसका वह कुछ नहीं बिगाड़ पाया।

जयपुर के महाराजा सवाई जयसिंह के मृत्यु के बाद ही सूरजमल का सितारा चमका। जयपुर राज्य में ईश्वरी सिंह और माधोसिंह के बीच सात वर्षों तक उत्तराधिकार संघर्ष हुआ। इस दौरान की सूरजमल उभरा क्योंकि न तो विलास भवन में बैठे मुगल बादशाह को उस ओर ध्यान देने की फुरसत थी और न अंतपुर के षड्यंत्रों में फंसे जयपुर नरेश के पास समय था। बल्कि मराठों के आक्रमण से अपनी रक्षा करने बगरू की लड़ाई (1748) माधोसिंह को समझाने-बुझाने के लिए ईश्वरीसिंह ही सूरजमल की आवश्यकता पड़ गई थी। उस आवश्यकता ने सिद्व कर दिया कि जयपुर की तुलना में भरतपुर की शक्ति कम नहीं थी, बल्कि बढ़ने लगी थी। उसकी शक्ति बढ़ने का एक और प्रमाण यह है कि दिल्ली के शाह आलम के वजीर सफदरजंग ने भी अपने पठान विरोधी अभियान में सूरजमल की सहायता मांगी थी। बाद में सफदरजंग और सूरजमल ने मिलकर दिल्ली को खूब लूटा और नष्ट कर डाला। 

अब्दाली के जाने के बाद सूरजमल मुगल बादशाह का अटल शत्रु बन गए थे और जयपुर का सहायक हो गए थे। ईश्वरीसिंह की आत्महत्या के बाद जब माधोसिंह जयपुर का राजा बन गया, तब उसके भाई प्रतापसिंह के लिए भी आड़े वक्त में वही शरणदाता सिद्ध हुए थे ।


Sunday, November 5, 2017

Maharaja Surajmal_ हिंदू हितकारी, महाराजा सूरजमल



महाराजा सूरजमल अठारहवीं सदी के भारत का निर्माण करने वाले प्रमुख व्यक्तियों में से एक थे। उनके जन्म ऐसे समय में हुआ जब दिल्ली की राजनीति में भारी उथल-पुथल हो रही थी तो देश विनाशकारी शक्तियों की जकड़न में था। विदेशी लुटेरों नादिरशाह और अहमदशाह अब्दाली ने उत्तर भारत में बहुत बड़ी संख्या में हिन्दुओं को मार डालने के साथ उनके तीर्थों-मंदिरों को भी नष्ट कर दिया था। इन बर्बर आक्रांताओं को रोकने वाला कोई नहीं था। श्रीविहीन हो चुके मुगल, न तो दिल्ली का तख्त छोड़ते थे और न अफगानिस्तान से आने वाले आक्रांताओं को रोक पाते थे। ऐसे अंधकार में महाराजा सूरजमल का जन्म उत्तर भारत के इतिहास की एक अद्भुत घटना थी। 


दिल्ली के यमुना पार क्षेत्र शाहदरा के एक पार्क में सूरजमल की छोटी समाधि बनी हुई है। सूरजमल सोसाइटी ने दिल्ली सरकार की मदद से इस समाधि को अच्छा स्वरूप देते हुए पत्थरों से सुसज्जित किया। यह पार्क उस क्षेत्र में स्थित है, जहां कभी युद्ध क्षेत्र हुआ करता था। आज भी यहां नाले के अवशेष देखे जा सकते हैं। यहां कांटेदार झाड़ियां भी दिखती हैं जो कि सूरजमल के समय भी थी। इस क्षेत्र की भूआकृति आज भी जस की तस है, केवल इसके आसपास कुछ निर्माण हुआ है। यह समाधि भरतपुर राज्य के खजाने में सुरक्षित रखे सूरजमल के दांत पर बनाई गई। मथुरा के नजदीक गोवर्धन में कुसुम सरोवर में भी सूरजमल की स्मृति में एक सुंदर छत्तरी बनी हुई है।


बदनसिंह के पुत्र तथा उत्तराधिकारी सूरजमल (1756-63) जाट शासकों में सर्वाधिक शक्तिशाली सिद्ध हुए तथा उनके शासनकाल में जाट समुदाय, जो कि किसान होने के साथ ही वीर और सदैव युद्ध के लिए तैयार थे, की शक्ति अपने चरम पर पहुँच गई। महाराजा सूरजमल का राज्य आर्यावर्त के केन्द्र में था। एक योग्य कूटनीतिज्ञ व सेनापति होने के साथ-साथ वह अपने समय का महान निर्माता भी थे। उनके राज्य का प्रशासनिक मुख्यालय भरतपुर था तो डीग दूसरी राजधानी। सूरजमल ने 1730 में डीग में सुदृढ़ दुर्ग और ऊंचे रक्षा प्राचीर सहित बुर्जों का निर्माण करवाया। डीग में सुन्दर एवं विशाल बगीचों से शहर का सौन्दर्यीकरण किया जाना, सूरजमल की सबसे महत्वपूर्ण कलात्मक देन थी, जो आज भी जाटों के इस महानायक की गौरवपूर्ण स्मृति के रूप में जीवित है। 


सूरजमल ने दिल्ली के एक बर्खास्त वजीर इमाद-उल-मुल्क से धन प्राप्त किया था, जो कि अब इस जाट प्रमुख का सहयोगी बन गया था। उल्लेखनीय है कि युवराज के रूप में सूरजमल की वैधता जयपुर के महाराज सवाई जयसिंह ने अपने अश्वमेध यज्ञ के अवसर पर प्रदान की थी।


वर्ष 1761 में पानीपत में अफ़ग़ान लुटेरे अहमद शाह अब्दाली और मराठों के बीच हुए युद्ध से पूर्व महाराजा सूरजमल ने सैनिक तथा आर्थिक साधन मराठा सेनापति भाऊ की सेवा में प्रस्तुत किए थे, परन्तु उन्हें ग्रहण करने के बजाय उसने उनके प्रति अप्रच्छन्न तिरस्कार दिखाया। इससे ज्यों ही सूरजमल दिल्ली से चले गए, त्यों ही वास्तविकता भाऊ के सामने आ गई। अब्दाली को रसद रूहेला प्रदेश से प्राप्त हो रही थी और भाऊ की सेना के लिए भोजन सामग्री सूरजमल देते रहे थे। भाऊ की नासमझी के कारण यह अक्षय स्त्रोत अब सूख गया। अतः कोई आश्चर्य नहीं कि मराठों को पानीपत में खाली पेट रहकर लड़ना पड़ा।


14 जनवरी 1761 में पानीपत की तीसरी लड़ाई मराठों की पूरी पराजय थी और युद्व से बचे हुए एक लाख मराठे बिना शस्त्र, बिना वस्त्र और बिना भोजन सूरजमल के राज्य-क्षेत्र में पहुंचे। सूरजमल और रानी किशोरी ने प्रेम और उत्साह से उन्हें ठहराया और उनका आतिथ्य किया। हर मराठे सैनिक या अनुचर को मुफ्त खाद्य सामग्री दी गई। घायलों की तब तक शुश्रूषा की गई, जब तक कि वे आगे यात्रा करने योग्य न हो गए।


"हिस्ट्री आॅफ मराठा" में अंग्रेज़ इतिहासकार ग्रांट डफ ने मराठे शरणार्थियों के साथ सूरजमल के बरताव के बारे में इस प्रकार लिखा है-जो भी भगोड़े उसके राज्य में आए, उनके साथ सूरजमल ने अत्यंत दयालुता का बरताव किया और मराठे उस अवसर पर किए गए जाटों का व्यवहार को आज भी कृतज्ञता तथा आदर के साथ याद करते हैं। नाना फड़नवीस ने एक पत्र में लिखा है कि सूरजमल के व्यवहार से पेशवा के चित्त को बड़ी सान्त्वना मिली।


विदेशी यात्री फादर फ्रांस्वा ग्जाविए वैंदेल ने अपनी पुस्तक "मेम्वार द ल इंदोस्तान" (हिंदुस्तान के संस्मरण) में लिखा है कि यह तब जब कि उनकी शक्ति सचमुच इतनी थी कि यदि सूरजमल चाहता, तो एक भी मराठा लौटकर दक्षिण नहीं जा सकता था। जब हिन्दुस्तान के नवाब तथा अन्य शक्तिशाली मुस्लिम शासक उनके अपने ही इलाकों को लूटने और उजाड़ने के लिए अब्दाली के मनमौजी संग्रामों (अपने खर्च पर) सम्मिलित होने को विवश हुए थे, तब भी सूरजमल को अपने घर में बैठे यह पता था कि ऐसे प्रचंड शत्रु से अपने राज्य-क्षेत्र की रक्षा कैसे करनी करनी है। 


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