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Tuesday, December 6, 2016

Environmental History of Delhi_दिल्ली का हरा-भरा पर्यावरणीय इतिहास



भारत के इतिहास में दिल्ली की एक अद्वितीय भू-राजनीतिक स्थिति है। प्राचीन काल से ही दिल्ली भारतीय उप-महाद्वीप की राजधानी के साथ ‘‘उद्यान-नगर” दोनों ही रही है। दिल्ली राज्य का कुल क्षेत्रफल 1,48,639 हेक्टेअर है, जिसमें 4,777 हेक्टेअर शहरी क्षेत्र है। राजधानी का हरित क्षेत्रफल कुल क्षेत्रफल का 19 प्रतिशत है, जो कि देश के दूसरे शहरों की तुलना में अधिक है। यह दिल्ली को भारत के सर्वाधिक हरियाली वाले शहरों में से एक बनाता है। जहां एक ओर करीब तीन करोड़ मनुष्यों की आबादी है तो दूसरी ओर यमुना नदी और रिज का वन एक भरे-पूरे पशु-पक्षियों के संसार को जिलाए हुए हैं। पर इस बात से कोई इंकार नहीं है कि महानगर के शहरीकरण का मूल्य तेजी से घटी जैव विविधता को चुकाना पड़ा है, जिसमें खासी कमी आई है।


इतिहास इस बात का गवाह है कि कुछ दशक पहले तक यमुना नदी में घड़ियालों, मगरमच्छों और कछुओं की खासी संख्या होती थी। वहीं सर्दियों के हजारों की संख्या में प्रवासी पक्षियों के अलावा कई अन्य जीव-जंतुओं भी पाए जाते थे। ऐतिहासिक काल से रिज को असाधारण पौधों और भयानक पशुओं के निवास के रूप में अभेद्य क्षेत्र माना गया। इस तरह से, भाग्य के धनी दिल्ली के नागरिकों के दोनों हाथों में लड्डू थे यानी एक नदी और दूसरा भरपूर हरा भरा जंगल। जंगल भी ऐसा, जिसमें तेंदुओं से लेकर भेड़ियों और सूक्ष्म कीटों की खासी संख्या थी और सब एक सामंजस्य पूर्ण ढंग से एकसाथ गुजर करते थे।


पुराने समय से ही दिल्ली के शासकों में पर्यावरण के संरक्षण और सुरक्षा की जागरूकता का भाव रहा है। 14 वीं सदी में जब रिज के वन बेहद कम पेड़ थे, तब तुगलक वंश के बादशाह फिरोजशाह तुगलक ने यहां पौधे लगवाए थे। वर्ष 1803 में दिल्ली पर कब्जा करने के बाद अंग्रेज कंपनी सरकार ने भी दिल्ली में बड़े पैमाने पर पौधारोपण का कार्यक्रम शुरू कर दिया और लिखित दस्तावेज बताते हैं कि यहां 1878-79 की अवधि में 3000 नीम और बबूल के पेड़ लगाए गए थे। सन् 1911 में अंग्रेज राजा के कलकत्ता से राजधानी को दिल्ली लाने की घोषणा के बाद ब्रितानिया सरकार ने वर्ष 1913 में उत्तर और मध्य रिज को भारतीय वन अधिनियम, 1878 के तहत संरक्षित वन घोषित कर दिया गया। वर्ष 1942 में रिज के उत्तरी भाग के अतिरिक्त 150.46 हेक्टेयर भूमि को भी संरक्षित वन बनाने की घोषणा कर दी गई। उसके बाद, वर्ष 1948 में रिज के दक्षिणी और मध्य भाग को भी संरक्षित वन घोषित कर दिया गया।


अंग्रेजों के समय का दिल्ली का गजेटियर (1883-84), दिल्ली के वन्य जीवन का वर्णन करते हुए बताता है कि यमुना नदी के पूर्वी किनारे में भरपूर संख्या में सूअर, लोमड़ी, खरगोश थे। लगभग हर जगह काले हिरन पाए जाते थे जबकि चिंकारा पहाड़ियों, विशेष रूप से भूंसी और सिनाली, और रिज के हिस्से में मिलते थे। भेड़ियों की संख्या अधिक नहीं थी लेकिन वे आम तौर पर पुरानी छावनी के पास दिखते थे। बुराड़ी और खादीपुर के गांवों के पास नीलगायें दिखती थीं। तुगलकाबाद और बाहरी गांवों में तेंदुआ देखा जाता था जबकि बुराड़ी और यमुना के पास अच्छी संख्या में पैरा (हॉग हिरण) होते थे। साथ ही यमुना नदी में मुख्य रूप से मगर और घड़ियाल की उपस्थिति की बात रिकॉर्ड की गई है। यहां चपटी नाक वाले आदमखोर मगरमच्छ काफी थे और इनमें से काफी यमुना नदी के तट पर आज की राइफल रेंज के पास धूप सेकते देखे जा सकते थे। यह दस्तावेज दिल्ली के जीवों के बारे में रोचक तथ्यों का उल्लेख करते हुए बताता है कि है कि पिछले पांच साल में दस तेंदुए, 367 भेड़िए और 1127 सांपों को मारने के लिए 8900 रुपये की राशि पुरस्कार के रूप में दी गई।


1912 के गजेटियर के अनुसार, एक तेंदुए को मारने पर पांच रुपये के हिसाब से 143 रुपये दिए गए। जबकि एक नर भेड़िया के शिकार पर पांच रुपये और मादा भेड़िया के शिकार पर तीन रुपये के हिसाब से ईनाम दिया जाता था। इस दस्तावेज में स्थानीय और प्रवासी पक्षियों की व्यापक सूची भी है, जिसमें विशेष रूप से नजफगढ़, भलस्वा के आसपास चैती और बत्तखों के होने का उल्लेख है।


देश की आजादी के बाद वर्ष 1980 में, रिज के उत्तरी, मध्य और दक्षिणी रिज में बीस स्थानों को चिन्हित करते हुए भारतीय वन अधिनियम, 1927 के तहत संरक्षित वन बना दिया गया। 9 अक्तूबर, 1986 को दिल्ली के उपराज्यपाल ने रिज के दक्षिणी भाग के 1880 हेक्टेयर क्षेत्र को असोला-भाटी वन्य जीव अभयारण्य होने और फिर वर्ष 1989 में महरौली परिसर को संरक्षित विरासत क्षेत्र होने की घोषणा की। अप्रैल 1991 में भाटी माइंस का 840 हेक्टेयर का और अधिक क्षेत्र असोला अभयारण्य में शामिल किया गया।


अप्रैल 1993 में रिज प्रबंधन समिति (जिसे लवराज कुमार समिति के रूप में भी जाना जाता है) को नियुक्त किया गया। इस समिति ने अक्तूबर 1993 में दिल्ली रिज के प्रबंधन के लिए अपनी रिपोर्ट सौंपी। नवंबर, 1993 में केंद्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्रालय ने दिल्ली प्रशासन को रिपोर्ट को पूरी तरह से लागू करने के निर्देश दिए। मई 1994 में, दिल्ली के उपराज्यपाल ने वर्तमान समय की सीमाओं के आधार पर भारतीय वन अधिनियम, 1927 की धारा 4 के तहत पूरे रिज को संरक्षित वन घोषित कर दिया। यह निर्णय रिज पर लवराज कुमार समिति की रिपोर्ट के अनुरूप लिया गया था। दिल्ली में हरित क्षेत्र के प्रबंधन का काम विभिन्न सरकारी एजेंसियों में बंटा हुआ है, जिसमें 5,050 हेक्टेअर क्षेत्र के लिए जिम्मेदार दिल्ली विकास प्राधिकरण रिज और यमुना नदी मुहाने पर प्राकृतिक पर्यावरण संरक्षण का कार्य किया है।


असोला-भाटी वन्य जीव अभयारण्य
दिल्ली दुनिया की अकेली महानगरीय राजधानी है जो अपनी नगरीय सीमा में एक वन्यजीव संरक्षित क्षेत्र-छतरपुर के पास असोला भाटी वन्य जीव अभयारण्य-का दावा कर सकती है। असोला भाटी वन्य जीव अभयारण्य, पहला मानव निर्मित अभयारण्य होने के साथ एक समृद्व वन्य जीवन का भी पोशण करता है। इतना ही नहीं यह अरावली पहाड़ियों में एकमात्र संरक्षित क्षेत्र होने के साथ दिल्ली और उससे सटे उपनगरों के पर्यावसरण को साफ रखने वाले फेफड़ों का कार्य करता है। वर्ष 1986 में असोला भाटी वन्य जीव अभयारण्य को राजधानी के तीन गांवों और दक्षिणी रिज के एक हिस्से को मिलाकर बनाया गया। वर्ष 1991 में एक सरकारी अधिसूचना के भाटी क्षेत्र को वन्यजीव अभयारण्य घोषित करने का परिणाम राजधानी में 4845.58 एकड़ क्षेत्र वाले असोला भाटी वन्य जीव अभयारण्य के रूप में सामने आया। इस अभयारण्य के बनने से यहां और सुरक्षित वातावरण से यहां वऩ-वन्य जीवन में विविधता बढ़ी है।

Friday, September 9, 2016

ऐतिहासिक दिल्ली की गवाह है, राजधानी की रिज_Delhi Ridge_age old witness of historic delhi

हाल में ही केन्द्रीय सूचना आयोग के दिल्ली के रिज क्षेत्र के सीमांकन में देरी के कारण अंधाधुंध अतिक्रमण और अतिक्रमण करने वालों के खिलाफ कार्रवाई पर रिपोर्ट सौंपने का निर्देश दिया। इतना ही नहीं, आयोग ने रिज क्षेत्र की सीमा चिन्हित करने में देरी से अतिक्रमण और मानचित्र सहित जानकारी मांगी है। इस तरह, एक बार फिर दिल्ली की रिज चर्चा में है। दुनिया की सबसे ऐतिहासिक राजधानियों में से एक दिल्ली का उल्लेख हिंदुओं के प्राचीन महाकाव्य महाभारत में मिलता है। 

इस शहर की दो प्राकृतिक विशेषताओं-रिज और यमुना नदी ने इसे सदियों से शासकों के लिए एक सुरक्षित और मनपसंद जगह बनाया। यही कारण है कि दिल्ली की हरियाली के फेफड़े की रक्षा की लड़ाई बहुत पहले ही शुरू हो गई थी। दिल्ली में पहाड़ी का भाग, दिल्ली रिज तो कभी रिज के नाम से पुकारा जाता है जो कि कभी शहर की लगभग 15 प्रतिशत भूमि पर फैला हुआ था।

यह रिज एक भूवैज्ञानिक कारक है जिसकी विशेषता यह है कि वह कुछ दूरी तक लगातार चोटी की तरह उठान पर है। दिल्ली रिज भारत की सबसे पुराने पहाड़ अरावली पर्वत श्रृंखला का उत्तरी विस्तार है जो कि गुजरात से लेकर राजस्थान और हरियाणा से दिल्ली तक विस्तार लिए हुई है। दिल्ली रिज कुल 35 किलोमीटर की दूरी तक फैली हुई है जो कि भाटी माइंस से दक्षिण पूर्व में 700 साल पुराने तुगलकाबाद तक अलग-अलग दिशाओं में शाखाओं में विभाजित है और अंत में यमुना नदी के पश्चिमी तट पर वजीराबाद के पास उत्तरी छोर तक इसका फैलाव है।


दिल्ली के इतिहास में रिज ने एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है और यहां तक कि इसका अपना प्राग इतिहास भी है। दिल्ली रिज क्वार्टजाइट चट्टानों से बनी है, जिससे पाषाण युग वाले मानव अपने औजार बनाते थे। दरअसल, पुरातत्वविदों ने दिल्ली रिज में पाषाण युग के कारखानों की खोज की है जो कि व्यापक स्तर पर औजारों के उत्पादन का साक्ष्य है। पाषाण कालीन मानव की रिज के घने वन आच्छादित क्षेत्र में भी रहगुजर थी जो कि उन्हें भोजन (कंदमूल और पशु) तथा आश्रय प्रदान करती थी। इतना ही नहीं, वहाँ पर्याप्त जल भी था और यह तथ्य आज भी उतना ही प्रासंगिक है।

रिज अपनी स्थलाकृतिक विशेषता के कारण हजारों साल से मानव को इस क्षेत्र में बसने के लिए आकर्षित करती रही है। यही कारण है कि आठवीं सदी के लालकोट के किले, 12 वीं सदी की कुतुब मीनार, 17 वीं सदी का परकोटे वाला शहर शाहजहांनाबाद से 20 वीं सदी की लुटियन की नई दिल्ली तक राजधानी की ऐतिहासिक वास्तुकला रिज के भीतर और उसके आसपास पाई जाती है।

दिल्ली सात शहरों के उत्थान-पतन की गवाह रही है। इनमें मुख्य किला राय पिथौरा, लाल कोट, महरौली, सिरी, तुगलकाबाद, फिरोजाबाद और मुगल शहर शाहजहांनाबाद, जो कि अब पुरानी दिल्ली के नाम से जाना जाता है। उल्लेखनीय है कि अंग्रेजो ने शाहजहांनाबाद पर ही कब्जा किया था। मध्य काल में इन शहरों में से पहले चार पारिस्थितिक कारणों और पहाड़ियों की वजह से मिली सैन्य सुरक्षा के कारण सीधे तौर पर रिज में ही बने थे।

14 वीं सदी में, दिल्ली रिज का जंगल कांटेदार झाड़ियों से ढका था, जहां प्राकृतिक हरीतिमा कम थी। शिकार के बेहद शौकीन बादशाह फिरोज तुगलक ने रिज के चट्टानी दक्षिणी भाग को साफ करवाया जिस पर गयासुद्दीन तुगलक ने किलेदार शहर तुगलकाबाद किले का निर्माण करवाया। उत्तर मुगल कालीन दौर में शहर के यमुना नदी के तट की ओर ले बनने के कारण रिज पर बड़े पैमाने पर जंगलों की कटाई हुई। फिर भी इसने एक भूमिगत जल स्रोत के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और स्थानीय चरवाहे के लिए गोचर भूमि के रूप में कार्य किया।


दिल्ली के हालिया इतिहास में रिज की भूमिका संवेदनशील रही है। अंग्रेज शासन काल के दौरान रिज विभिन्न कारणों से असाधारण रूप से महत्वपूर्ण बन गई। पहली महत्वपूर्ण घटना वर्ष 1857 का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम था, जिसमें अंग्रेजों के विदेशी शासन के खिलाफ विद्रोह देखा गया। वैसे तो समूचा उत्तर भारत अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह में आगे था पर सर्वाधिक सरगर्मी दिल्ली में थी। ऐसा इसलिए था क्योंकि भारतीय विद्रोही सैनिक मुगल बादशाह, जो कि अंग्रेजों की कड़ी नजर में था, को केंद्रबिंदु मानकर चारों ओर से लामबंद हुए थे। अंग्रेज सैनिकों ने रिज की ऊंचाई का लाभ हासिल करने के हिसाब से उसके उत्तरी हिस्से में अपना मोर्चा कायम किया था। बाद में भारतीय आजादी के रणबांकुरों की शहादत के कारण रिज को एक पवित्र स्मारक का दर्जा मिला।

भारत में अंग्रेजी राज के वर्ष 1883-84 में प्रकाशित दिल्ली के गजेटियर में दिल्ली में बड़े स्तर पर जैव विविधता के होने की बात रिकॉर्ड में दर्ज है। अंग्रेज सरकार ने वर्ष 1913 में अधिसूचनाओं के माध्यम से एक मजबूत वैधानिक तंत्र बनाया था। भारतीय वन अधिनियम, 1878 के प्रावधानों के तहत दिल्ली के आठ गांवों की 796.25 हेक्टेअर भूमि को एक आरक्षित वन के रूप में अधिसूचित किया गया था। इसके बाद भी, दिल्ली में रिज को सुरक्षा प्रदान करने के उद्देश्य से कुछ और अधिसूचनाएं जारी की गईं।

19 वीं सदी में अंग्रेजों ने बड़े पैमाने पर रिज के जंगल का वनीकरण शुरू किया था। वर्ष 1807 का एक अंग्रेजकालीन नक्शा वर्तमान समय में रिज के बिखरे हुए जंगलों के विपरीत रिज के उत्तर से दक्षिण दिशा तक के निर्बाध विस्तार को प्रदर्शित करता है। वर्ष 1900 के आरंभ में, अंग्रेजों ने कुछ मुगल बाग़ों को सहेजने का काम शुरू किया। और जब उनकी शाही राजधानी कलकत्ता (अब कोलकाता) से दिल्ली स्थानांतरित हुई तब अंग्रेजों ने नए शहर के विकास पर ध्यान केंद्रित करते हुए प्रभावशाली इमारतें, चौड़ी और सुचारू सड़कों आदि बनवाईं जो कि आज भी ध्यान आकर्षित करती है।

अंग्रेजों ने नए शहर की एक उपयुक्त राजसी पृष्ठभूमि के रूप में रिज की कल्पना की। इस तरह, एक बार फिर से रिज पर ध्यान केंद्रित हो गया और वनीकरण का काम पूरे जोरों से शुरू हुआ। इसके पीछे मूल विचार नई शाही राजधानी को पत्ते के समुंदर के रूप में तैयार करने का था। इसी कारण विभिन्न विदेशी प्रजातियों के पौधों को रोपा गया जिसमें प्रोसोपिस जूलीफ्लोरा, मैक्सिको देश का पेड़, भी था जिसे अब भारत में विलायती कीकर के नाम से जाना जाता है। इसी विलायती कीकर की वजह से आज रिज में व्यापक रूप से एक ही प्रकार की वनस्पति की अधिकता हुई। इससे दिल्ली के हरित क्षेत्र में वृद्धि हुई पर यह पूरी तरह से एक सकारात्मक विकास नहीं था।

अंग्रेजों के दिल्ली रिज में किए गए वनीकरण से अंग्रेजी औपनिवेशिक वानिकी की प्रकृति और विशिष्टता का पता चलता है। रिज के पास के गांवों में रहने वाले हिंदुस्तानियों को विस्थापित कर दिया गया और ईंधन और चारे के लिए रिज पर निर्भर रहने वाले स्थानीय लोगों को बाड़ और सुरक्षाकर्मियों के सहारे उनके स्वाभाविक अधिकार से वंचित कर दिया गया। वर्ष 1913 में, अंग्रेज सरकार ने सेंट्रल रिज की प्राकृतिक संपदा को संरक्षित करने के लिए भारतीय वन कानून, 1878 के सातवें अधिनियम की धारा 4 को लागू करने का निर्णय लिया। दिल्ली के मुख्य आयुक्त ने आठ गांवों-दसघरा, खानपुर, शादीपुर, बंद शिकार खातून, अलीपुर पिलांजी, मालचा और नारहौला की 796॰25 हेक्टेअर भूमि को आरक्षित वन घोषित कर दिया। इस संबंध में, 6 दिसंबर 1913 को अधिसूचना निकालने के साथ वन बंदोबस्त अधिकारी के रूप में एक आईसीएस अधिकारी और अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट दिल्ली विन्सेंट कोनोली की नियुक्ति की गई। इस तरह, रिज पर अंग्रेजों के नियंत्रण को और अधिक कड़ा कर दिया गया।

वर्ष 1915 में एक बार फिर दिल्ली के मुख्य आयुक्त ने सात सितंबर 1915 को भारतीय वन अधिनियम, 1878 की सातवें अधिनियम की धारा 19 के तहत एक अधिसूचना जारी करते हुए पट्टी चंद्रावल गांव की भूमि के एक भाग को आरक्षित वन घोषित कर दिया। इन वनों का मालिकाना हक सीपीडब्ल्यूडी की अधिसूचित को दे दिया गया और समिति के सचिव को वन अधिकारी बना दिया गया।

लेकिन तेजी से शहरीकरण के कारण जमीन पर दबाव बढ़ा और 1920-30 के दौरान दिल्ली विश्वविद्यालय के पास रिज के एक बड़े हिस्से को बारूद से विस्फोट करके उड़ाया गया। यह काम आवासीय कालोनियों और व्यावसायिक परिसर सहित करोल बाग की नई कॉलोनी के लिए आने जाने का रास्ता बनाने की गरज से किया गया था। 16 सितंबर 1942 को दोबारा मुख्य आयुक्त की अधिसूचना को निरस्त करते हुए पट्टी चंद्रावल महल गांव की जमीन के एक हिस्से को बतौर आरक्षित वन घोषित किया गया। इस तरह, यह साफ पता चलता है कि अंग्रेजों ने शाही वानिकी का एक ऐसा मॉडल लागू किया, जिसकी छाया अभी भी आधुनिक पर्यावरण नीति में नजर आती है।

आजादी के बाद के वर्षों में, बढ़ती जनसंख्या के दबाव, संसाधन की अत्यधिक निकासी, प्राकृतिक दृश्यों वाले सार्वजनिक पार्कों के निर्माण, सार्वजनिक आवास, आधुनिक निर्माण के कचरे के निपटान आदि के कारण रिज को एक गंभीर खतरा पैदा होने के साथ उसकी क्षेत्रफल में कमी आई है। किसी समय अखंड इकाई वाली यह रिज अब पांच क्षेत्रों-उत्तरी रिज, मध्य रिज, दक्षिण मध्य रिज, दक्षिणी रिज और नानकपुरा दक्षिण मध्य में विभाजित है। इन सभी पांच क्षेत्रों का कुल क्षेत्रफल 7784 हेक्टेयर है जो कि पूरे शहर में अलग-अलग खंडों में फैला हुआ है।




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