Showing posts with label अंग्रेजी राज. Show all posts
Showing posts with label अंग्रेजी राज. Show all posts

Friday, August 7, 2020

Coolies sacrificed lives for British Rail network in India_मजदूरों की लाशों पर बनी अंग्रेजी राज में रेल पटरियां









मजदूरों की लाशों पर बनी अंग्रेजी राज में रेल पटरियां 

वर्ष 1857 में भारत की पहली आजादी की लड़ाई के दो साल बाद बंगाल में भयंकर हैजा फैला था। वर्ष 1859 में इस हैजे की महामारी की मार के शिकार हुए थे, हजारों रेल मजदूर। ये मजदूर देश के सुदूर भागों से दो जून रोटी की तलाश में बंगाल पहुंचे थे। इन गरीब-गुरबा मेहनतकशों को रोटी तो नसीब हुई नहीं, पर वे मौत के सफर पर निकल गए। 

इयान जे. कैर की पुस्तक "बिल्डिंग द रेलवेज आफ द राज" के अनुसार, ’’रोजाना, बड़े पैमाने पर मजदूरों का आना जारी रहा। जबकि रेल इंजीनियर इन मजदूरों को एकबारगी में उनके रहने का इंतजाम करने में विफल रहे। मजदूरों की एक बड़ी आबादी वहां आने के कई दिनों बाद तक सिर पर छत का इंतजाम नहीं कर सकीं। जबकि हैजा उनके बीच में फैला हुआ था।‘‘

जाहिर तौर पर उस महामारी के लिए रेल पटरी निर्माण स्थल पर ही करीब 4000 कुलियों का देहांत हो गया। वैसे, अकेला अंग्रेजों के औपनिवेशिक शासन के लिए रेलमार्ग बनाने वाले मजदूरों का एकमात्र हत्यारा हैजा ही नहीं था। भारतीय कुली वर्ग मलेरिया, चेचक, टाइफाइड, निमोनिया, पेचिश, दस्त और अल्सर जैसी बीमारियों का भी खूब शिकार हुआ। रेल निर्माण के कुछ बड़े भागों में तो कभी-कभी कुल मजदूरों की 30 प्रतिशत या उससे अधिक आबादी किसी महामारी वाली बीमारी के कारण काल का ग्रास बनी। 

उदाहरण के लिए, वर्ष 1888 में, भारत में बंगाल-नागपुर लाइन के बीच रेल पटरी निर्माण के एक ही हिस्से में करीब 3,000 मजदूरों की मौत हुई। हालत इतनी खराब थी कि इन मृत मजदूरों के शवों को रेलवे लाइन के किनारे पर ही फेंक दिया गया। इन बेसहारा लाशों का कोई धनी-वारिस नहीं था। इस कारण यहां पर इस कदर असहनीय बदबू फैली कि शवों का ढेर लगाकार, उनका सामूहिक रूप से अंतिम संस्कार किया गया।


Saturday, December 8, 2018

Dhaka village of British Raj_दिल्ली में अंग्रेजी राज का गवाह ढका गांव

08122018_दैनिक जागरण 

दिल्ली विधानसभा से किंग्सवे कैंप चौराहे से दाई तरफ मुड़ने पर रास्ता, वर्ष 1911 में अंग्रेज भारत में हुए तीसरे दिल्ली दरबार के स्मारक की तरफ जाता है। उल्लेखनीय है कि 12 दिसंबर 1911 को दिल्ली में हुए दरबार में अंग्रेज सम्राट जार्ज पंचम ने घोषणा की कि देश की राजधानी कलकत्ता से दिल्ली हो गई है। शहर के उत्तर में पुरानी सिविल लाइन में अस्थायी भवनों का निर्माण किया गया और वाइसराय को रिज के दूसरी ओर के भवन में ठहराया गया, जहां 1857 में घेरा डालने वाली अंग्रेज सेना ने एक बार शिविर लगाया था। आज यहां परमानंद कॉलोनी के रूप में एक भरी-पूरी आबादी बस गई है, जहां मकान-दुकान से लेकर सदाबहार बाजार हैं। यह बानगी सरसरी तौर पर देखने में बेहद अच्छी लगती है पर इसके मूल में कम व्यक्तियों की ही दृष्टि जाती है। और वह है एक छोटा-सा गांव जो कि आज भी अपने मूल नाम ढका के साथ महानगरीय चकाचौंध में अपना अस्तित्व बनाए हुए है।


1920 के दशक में ढका गांव भी, देश के दूसरे हजारों गांवों की तरह एक गांव था। जो कि इम्पीरियल सेक्रेटेरियट के कनिष्ठ कर्मचारियों, छोटा साहब लोग, के टेंट वाली बसावट के नजदीक होने के बावजूद अपने स्वरूप को बनाए हुए था। उल्लेखनीय है कि नई दिल्ली के बनने से पहले अंग्रेज कर्मचारी इसी क्षेत्र में रहे थे। तब यहां के खुले खेतों में बबूल के पेड़ और कांटेदारें नागकनी की मेडे होती थीं।

“दिल्ली तेरा इतिहास निराला” पुस्तक में वेद प्रकाश गुप्ता ने दिल्ली सर्कल के ढका गांव के विषय में विस्तार से लिखा है। पुस्तक के अनुसार, “अरसा तखमीनन 70 साल हुआ कि पहले रकबा देह हजा वीरान पड़ा था और मालकान मौजा वजीराबाद उसमें मवेशी चराते थे। जनबा मिस्टर वजीर साहब बहादुर ने मससियान ठाकर दास व धनी व छज्जन व किशना हर चार मारूसियान हम मालकान को खेरखवाही व खिदमतगुजारी (सेवकाई) कि वो हमेश साहब के साथ रहते थे, हक बिसवेदारी बीस बिसवा रकबा हजा बसीसनाथ 287 बीघे 11 बिस्बे हकीयत सरकार मवाफ हस्व तफसील जेल, ठाकुर दास को साढ़े 7 बिस्वे धन्नी को ढाई बीसवा छज्जन को पांच बिस्बे, किशना को पांच बिस्वे देकर अमल करा दिया। जनाब मिस्टर वजीर साहब बहादुर ने हर चार मारूसियान मजकूर को रकबा देह हजा का दिया था, को उस वक्त एक टीला बन्द रकबा देह हजा में बाका था और नीज उस पर दरखत ढाक कसरत से थे वो दरखत मारूसियान ने काट कर उस पर बसर्फ लागत खुद आबादी तैयार करी। बासवव maujudमौजुदगी दरखतान ढाक के नाम से ढाका आबाद मौसूम हुआ। मगर बबायस कसरत गलत इस्तेमाली ढका मारूफ (मशहूर) हो गया जब से आबादी कभी वीरान नहीं हुई और सिवाए आबादी देह और कोई खेड़ा कुनाह के रकबा देह हजा में नहीं है।”

अंग्रेजी पत्रकार राज चटर्जी अपनी पुस्तक “द बॉक्सवाला एंड द मिडलमैन” में संकलित “द इबोनी बॉक्स” नामक लेख (1965 में स्टेटसमैन में प्रकाशित) में लिखते हैं कि यह (ढका गांव) करीब 300 निवासियों, जिसमें जाट, गुर्जर और जाटव थे, का एक गांव था। यहां पर केवल एक मुस्लिम जलालुद्दीन का परिवार था जो कि पेशे से बुनकर था। तब गांववालों की निगाह में पटवारी या लंबरदार से अधिक महत्वपूर्ण व्यक्ति 70 साल का जाट किसान प्रताप सिंह था। वह सबसे ज्यादा जोत वाली जमीन के साथ पूरे गांव में एकलौते पक्के मकान का मालिक था। 

प्रताप सिंह के पास एक दस्तावेज था, जिसमें लिखा था कि यह बताया जाता है कि ढका गांव के जमीदार शमशेर सिंह ने मुझे और मेरे दो बच्चों को रिज पर अंग्रेज छावनी में पहुंचने तक शरण देने के साथ भोजन दिया। एजिलाबेथ कोर्टनी, 89 वीं नेटिव इन्फैन्ट्री के कैप्टन जॉन कोर्टनी की पत्नी, जून 1857। उल्लेखनीय है कि शमशेर सिंह, प्रताप सिंह के पिता थे और यह चिट्ठी परिवार की सबसे मूल्यवान थाती थी।

Saturday, May 26, 2018

Wells_Traditional water sources of Delhi in british raj_अंग्रेजी राज में कुओं की अथ कथा

दैनिक जागरण 26/05/2018


नगरों में नल से पानी हमारे घरों में क्या पहुंचा, हम उसके स्रोतों का महत्व ही बिसरा बैठे हैं। यदि आज कुओं से पानी खींचना पड़े तो मालूम हो जाए कि पनघट की डगर कितनी कठिन है। अब तो महानगरों में कुएं दिखाना भी अध्ययन का भाग हो गया है क्योंकि कुएं अब दीखते ही कहां हैं, राज-समाज ने यह मानकर कुओं का मुंह बंद कर दिया है कि उसमें गिरने का खतरा है। खैर कुओं की अपनी व्यथा है तो उनकी अथ-कथा भी है। 


1912 तक दिल्ली पंजाब सूबे का केवल एक जिला थी और दो अन्य तहसीलें, सोनीपत और वल्लभगढ़, जो अब हरियाणा राज्य की हिस्सा है। चकबंदी के वर्षों (1872-75) में पंजाब जिले में कुल 8841 कुएं थे, जिनमें दिल्ली में 2,256, सोनीपत में 4797 और वल्लभगढ़ में 1,788 कुंए थे। अंग्रेजी राज के दिल्ली के गजेटियर (1883-84) के अनुसार, ''पंजाब सूबे के सभी जिलों में दिल्ली खेती के लिए सिंचाई योग्य क्षेत्र के मामले में अव्वल थी। अकाल आयोग को दिए गए आंकड़ों के हिसाब से कुल 37 सिंचाई योग्य क्षेत्रों में से 15 कुंओं से सिंचित होते थे। जबकि चार सिंचाई योग्य क्षेत्रों में झील पर बने बंध से और अठारह सिंचाई योग्य क्षेत्रों में नहरों के पानी से सिंचाई की जाती थी।"

उस दौर में मुख्य रूप से चार तरह के कुओं का प्रयोग होता था। पहला, चिनाई वाला कुंआ ईंट, पत्थर और गारे से बना होता था, जिसे बरसों-बरस के उपयोग के हिसाब से बनाया जाता था। ऐसे कुएं लंबे समय तक पानी देने के काम आते थे। दूसरे, मजबूती के हिसाब से बनने वाले शुष्क चिनाई वाले कुंए थे जो कि मुख्य रूप से पहाड़ी इलाकों में होते थे, जहां आस-पास चट्टान के होने के कारण कुएं को बनाने में पत्थरों का उपयोग सस्ता पड़ता था। तीसरे, लकड़ी के कुएं थे। ऐसे कुओं की चारोें ओर बैलगाड़ी के पहिए के समान लकड़ी के नौ इंच से दो फीट लंबे घुमावदार टुकड़े लगे होते थे जो कि अधिक गहरे न होने पर भी बरसों पानी देते थे। खादर इलाके के गांवों में इनकी संख्या अधिक थीं। चौथे, सिंचाई और टिकाऊपन के हिसाब से उपयोगी झार का कुंआ था जो कि जमीन में खुदा एक खड्डा भर होता था।
तब सिंचाई-पेयजल के लिए दो तरह के कुएं होते थे। पहला रस्सी-और-मशक यानी चड़स वाला और दूसरा रहट वाला कुआं। आज सिंचाई के जिस साधन को चड़स के नाम से पहचाना जाता है, वह मूल रूप से चमड़े का होता था। बैलों के बल के सहारे कुएं से जल को पात्र (चड़स) में भरकर ऊपर उठाया जाता और खाली कर पानी को इच्छित स्थान पर पहुंचाया जाता था। भ्रमणी (भूण) व ताकलिया (बेलनाकार चरखी) से लैस कुएं पर ही इसे संचालित किया जाता था। जबकि रहट खेतों की सिंचाई के लिए कुएँ से पानी निकालने का एक प्रकार का गोलाकार पहिए रूपी यंत्र होता था और जिस पर मिट्टी के हाँड़ियों की माला पड़ी रहती है। इसी पहिए के घूमने से कुंए में नीचे से हाँड़ियों में भरकर पानी ऊपर आता था।


दिल्ली के गजेटियर (1912) के अनुसार, "दिल्ली में होने वाली कुल सिंचित क्षेत्र में 57 प्रतिशत में सिंचाई के कृत्रिम साधनों से, 19 प्रतिशत में कुओं से, 18 प्रतिशत में नहरों से, और 20 प्रतिशत में बंध से होती थी।" 1860 तक, शहर में 1,000 कुएं होने बात दर्ज थी, जिनमें लगभग 600 निजी स्वामित्व और 400 सार्वजनिक उपयोग में थे। उर्दू शायर मिर्जा गालिब ने 1860-61 में एक खत में लिखा कि अगर कुएं गायब हो गए और ताजा पानी मोती की तरह दुर्लभ हो जाएगा तो यह शहर कर्बला की तरह एक वीराने में बदल जाएगा।


Saturday, April 1, 2017

अंग्रेजी राज और देसी रियासतों का संबंध_British Empire and princely states

दैनिक जागरण 01042017


जब एड्विंस लुटियन और हरबर्ट बेकर ने अंग्रेजों की नयी राजधानी नई दिल्ली के डिजाइन करने पर काम शुरू किया, उस समय ब्रितानी भारत में करीब 600 रजवाड़े-रियासतें थीं। इन रियासतों के शासक दिखाने के लिए तो भारतीय राजा-महाराजा थे पर असली ताकत दरबारों में मौजूद अंग्रेज रेजिडेंट के हाथ में थी। अंग्रेज सरकार के इन प्रतिनिधियों के बिना रियासतों में कुछ नहीं होता था।


इन राजाओं को अंग्रेजी राज का स्वामिभक्त बनाए रखने के लिहाज से भारत सरकार अधिनियम 1919 को शाही स्वीकृति देने के बाद 23 दिसंबर 1919 को अंग्रेज सम्राट जॉर्ज पंचम ने चैंबर ऑफ प्रिंसेस की स्थापना की घोषणा की। इस नरेन्द्र मंडल के नाम से भी जाना जाता था। 8 फरवरी 1921 को दिल्ली में चैंबर की पहली बैठक हुई। इस अवसर पर लालकिले के 'दीवान-ए-आम' में आयोजित उद्घाटन समारोह में 'ड्यूक-ऑफ़-कनाट' ने अंग्रेज राजा के प्रतिनिधि के रूप में भाग लिया।

चैंबर ऑफ प्रिंसेस की आंरभिक बैठक में देसी रियासतों के 120 राजप्रमुख सदस्य थे। इनमें से 108 राजा अति महत्वपूर्ण राज्यों के थे जो स्वयं ही सदस्य थे। जबकि शेष 12 सीटों के लिए अन्य 127 रियासतों में से प्रतिनिधित्व था। जबकि 327 छोटी रियासतों का चैंबर में कोई प्रतिनिधित्व नहीं था। 



चैंबर ऑफ़ प्रिंसेस का मुख्य काम रियासतों-रजवाड़ों से जुड़े विभिन्न मामलों पर अंग्रेज वाइसराय को सलाह देना था। तत्कालीन वायसराय ने चैंबर के गठन के अवसर पर कहा था कि इसका मुख्य कार्य राज्यों को प्रभावित करने वाले या रजवाड़ों के समान विषय सहित ब्रितानी हुकूमत की भलाई के लिए जरूरी मामलों पर चर्चा करना है। वैसे भी, अंग्रेज सरकार ने प्रिंसेस के चैंबर की भूमिका कार्यकारी न रखकर सलाहकार के रूप में तय की थी। 



किसी समय में विभिन्न रियासतों के सुंदर वेशभूषाओं में सजे-धजे शासकों के भरा रहने वाले हॉल का उपयोग अब संसद में सांसदों के अध्ययन कक्ष के रूप में होता है। हर साल फरवरी या मार्च में चैंबर ऑफ प्रिंसेस की बैठक कांउसिल हाउस (आज का संसद भवन) के निर्दिष्ट हॉल में होती थी। बैठक के दौरान अपने दिल्ली प्रवास में राजा-महाराजा अपने राजधानी स्थित महलों में राजपरिवारों के सदस्यों और बड़े संख्या में नौकर-चाकरों के साथ ठहरते थे। इस दौरान सामाजिक जमावड़ों के साथ राजाओं के आपस में छोटे समूहों वाली पार्टियां धूमधाम और पूरे उत्साह के साथ आयोजित की जाती थी। राजा-महाराजा अंग्रेज वायसराय से भेंट करते थे तो इसी तर्ज पर वायसराय अपने यहां या दिल्ली जिमखाना क्लब में राजपरिवारों के लिए पार्टी देता था। ऐसी पार्टियों में खानदानी बावर्चियों का बनाया विशेष भोजन और पेय परोसे जाते थे। शाम को होने वाली पार्टियों में राजपरिवारों के सदस्य और सरकारी उच्च अधिकारी मेहमान होते थे। 



चैंबर ऑफ प्रिंसेस के गठन का एक सीधा परिणाम अंग्रेजों की नई राजधानी में राजा-महाराजाओं को स्थान देने के रूप में आया। आखिर चैंबर की बैठकों में हिस्सा लेने के लिए राजधानी आने पर दिल्ली में ठहरने के लिए जगह की जरूरत थी। इस जरुरत का परिणाम था, प्रिंसेस पार्क। आज के इंडिया गेट के आस-पास के क्षेत्र में महत्वपूर्ण रजवाड़ों के शासकों को महल बनाने के लिए आठ एकड़ आकार के 36 भूखंड पट्टे पर दिए गए। इस तरह, हैदराबाद, बड़ौदा,बीकानेर, पटियाला और जयपुर रियासतों को इंडिया गेट की छतरी के किंग्स वे (अब राजपथ) के चारों ओर स्थान आवंटित हुए। जबकि उनसे कम महत्व रखने वाले जैसलमेर, त्रावणकोर, धौलपुर और फरीदकोट के शासकों को केंद्रीय षट्भुज (सेंट्रल हैक्सागन) से निकलने वाली सड़कों पर निर्माण के लिए भूमि दी गई।


इसके बावजूद, लुटियन की दिल्ली के अनुरूप डिजाइन होने की शर्त भी थी। इसके लिए रजवाड़ों को अपने महलों के नक्शों को अंग्रेज सरकार से स्वीकृत करवाना पड़ता था। देश की आजादी के बाद देसी रियासतों के भारतीय संघ में विलय के साथ ही राजा-महाराजाओं के सभी महल भारत सरकार की संपत्ति बन गए। इनमें से अधिकांश पर अभी भी सरकार का स्वामित्व है, जहां केंद्रीय सरकर के विभिन्न विभागों के कार्यालय हैं जैसे धौलपुर हाउस में संघलोक सेवा आयोग का कार्यालय है जो कि देश के भावी प्रशासकों यानी आइएएस के चयन का कार्य करता है।



देश की आजादी तक कायम रहे चैंबर ऑफ प्रिंसेस (1921-1947) के चार चांसलर यानी प्रमुख हुए। ये बीकानेर के महाराज गंगा सिंह, महाराजा पटियाला सरदार भूपिंदर सिंह, नवानगर के महाराज रंजीतसिंहजी और नवानगर के ही महाराज दिग्विजयसिंहजी तथा भोपाल के नवाब हमदुल्लाह खान थे।



First Indian Bicycle Lock_Godrej_1962_याद आया स्वदेशी साइकिल लाॅक_नलिन चौहान

कोविद-19 ने पूरी दुनिया को हिलाकर रख दिया है। इसका असर जीवन के हर पहलू पर पड़ा है। इस महामारी ने आवागमन के बुनियादी ढांचे को लेकर भी नए सिरे ...