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Saturday, April 4, 2020

History of Communicable Diseases in Delhi_दिल्ली में संचारी रोगों का इतिहास

04042020, दैनिक जागरण 



आजादी की पहली लड़ाई (1857) में दिल्ली को जीतने के बाद अंग्रेजों के लिए शहर के सार्वजनिक स्वास्थ्य में सुधार एक बड़ी चिंता का विषय बन गया था। स्वच्छता और सुरक्षा के नाम पर शहर के लगभग एक तिहाई हिस्से को ध्वस्त कर दिया गया। परोक्ष रूप से, नए विदेशी शासकों ने देसी शहर को एक रोगग्रस्त जीव के रूप में देखा, जिसके बुरे प्रभाव को रोकने और कम से कम करने की जरूरत थी। उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में रहस्यमयी बीमारियों और मृत्यु की धारणा, सैनिकों के स्वास्थ्य की चिंता और सभ्य बनाने का राजनीतिक एजेंडे इन सभी बातों ने दिल्ली में स्वच्छता सुधार नीतियों को आकार देने में सहायक भूमिका निभाई।


तब दिल्ली में हैजा, मलेरिया और दिल्ली 'सोर' का जोर था, जिसके बारे में माना जाता था कि ये पूरी तरह से जल-जनित संक्रामक रोग हैं जो कि बहते पानी, कुएं के खारे पानी और तालाबों के रूके हुए पानी के माध्यम से फैलते हैं। इसी बात की पुष्टि करते हुए उर्दू के मशहूर शायर और दिल्लीवासी मिर्जा गालिब 1860-61 के अपने एक पत्र में लिखते हैं "कारी का कुंआ सूख गया है। लाल डिग्गी के सारे कुंओं का पानी अचानक पूरी तरह खारा हो गया है। अगर कुएं खत्म हो जाते हैं और ताजा पानी मोती के समान दुर्लभ हो जाता है तो यह शहर कर्बला की तरह एक उजाड़ में बदल जाएगा।" इससे यह साफ होता है कि यह केवल पानी की उपलब्धता ही नहीं बल्कि बचे हुए पानी की गुणवत्ता की बात थी।


1860 के दशक तक, खुले नालों और महामारियों से निपटने में दिल्ली म्युनिसिपल कारपोरेशन के खिलाफ याचिकाएं दायर होने लगी थीं। यहां तक कि दिल्ली में सफाई के लिए अपनाई जाने वाली तकनीक के संबंध में भी सफाईकर्मी अपना विरोध दर्ज करवाने लगे थे। एक महामारी की घटना के दौरान नगर पालिका अपने नियमों को पूरी तरह से लागू करने में विफल रही।


उल्लेखनीय है कि 1840 के दशक में भारत में तपेदिक के रोग का आगमन हो चुका था और इसके कारण प्लेग या हैजे की बीमारी से अधिक व्यक्तियों की मौत हुई थी। फिर भी इस बीमारी की रोकथाम के उपायों के लिए धन की व्यवस्था करने के काम में ढिलाई थी। इस बीमारी की मार से सरकार या अर्थव्यवस्था सीधे तौर पर प्रभावित नहीं होने के कारण इसके लिए पैसों का प्रबंध करने पर कतई ध्यान नहीं दिया गया।


इतना ही नहीं, वर्ष 1869 में दिल्ली में बड़े पैमाने पर फैली चेचक की बीमारी के दौरान म्युनिसिपल कमिश्नरों पुलिस शक्तियां न होने के कारण यमुना नदी के किनारे मृतकों के शवों को छोड़ने वालों को दंडित देने में अक्षम साबित हुए। उल्लेखनीय है कि अप्रैल 1871 में, उर्दू अखबार ने दिल्ली म्युनिसिपल कारपोरेशन की शहर में साफ नहरों, कचरे की नालियों और पीने के पानी उपलब्ध करवाने में विफल रहने के लिए आलोचना की थी। यही कारण था कि सरकारी चिकित्सा सुविधाओं को लेकर सामान्य नागरिक की सोच अच्छी नहीं थी। हकीमों और वैद्यों के निजी उपचार ही अधिक लोकप्रिय थे।


दिल्ली में वर्ष 1873 तक लोथियन ब्रिज और कश्मीरी गेट के बीच का क्षेत्र अंग्रेज सैनिक छावनी का हिस्सा था। दिल्ली म्युनिसिपल कारपोरेशन ने एक से अधिक बार सैन्य प्रशासन को इस क्षेत्र में फैली गंदगी को लेकर याद दिलाया था। भारतीय नागरिकों का कहना था कि इसी गंदगी के कारण शहर में दोबारा हैजा फैला है जबकि वर्ष 1857 से पहले परकोटे वाले शहर में यह बीमारी कभी नहीं हुई थी। सरकार सेना के जवानों को स्वास्थ्य की दृष्टि से तो सुरक्षित रखना चाहती थी लेकिन सैनिक छावनियों के करीब रहने वाली असैनिक भारतीय आबादी को निरोग रखने के लिए पैसे खर्च नहीं करना चाहती थी। ऐसे में मजबूरी में अंग्रेजों के सैन्य-नागरिक प्रशासन को आम भारतीय जनसाधारण के स्वास्थ्य पर ध्यान देना पड़ा।


करेला और नीम चढ़ा। वर्ष 1919 में भी, लाॅर्ड चेम्सफोर्ड के जमाने में दिल्ली में इन्फ्लुएंजा की महामारी फैली, जिसमें करीब साठ हजार लोग मृत्यु को प्राप्त हुए। असलियत यह थी कि अंग्रेजी राज के प्रशासन में शहरियों की आबादी के स्वास्थ्य को लेकर सही आंकड़ों का अभाव था, जिस कारण वह अंधेरे में हाथ-पैर मार रहा था। दिल्ली सूबे की सालाना सफाई रिपोर्टों में स्वास्थ्य के मोर्चे पर गिरावट की बात तो दर्ज की गई थी पर उस गिरावट के सही कारणों का उल्लेख नहीं था। वर्ष 1927 में, दिल्ली के चिकित्सा स्वास्थ्य अधिकारी डॉक्टर के. एस. सेठना ने तपेदिक की बीमारी का लेकर कार्रवाई शुरू की। तपेदिक के तेजी से फैलाव के कारण ऐसा करना जरूरी था क्योंकि यह रोग सीधे तौर पर अधिक आबादी और सघन शहरी बसावट से जुड़ा था।


सेठना का कहना था कि अन्य श्वसन रोगों में श्रेणीबद्ध (वर्ष 1926 में 3,237 मौतें) अनेक मौतों को तपेदिक से हुई मौतें मानना चाहिए जबकि वास्तव में यक्ष्मा (480 मौतें) के रूप में दर्ज मामले उस बीमारी के कारण हुए ही नहीं थे। 1920 के दशक के मध्य में 34 से 40 प्रतिशत मौतों को "सांस की बीमारियों" से होना गिना गया था और सेठना ने इन अधिकांश मौतों के लिए तपेदिक को जिम्मेदार ठहराया।


वर्ष 1928 में यह दावा किया गया कि धीरे-धीरे बुखारों को मलेरिया, प्लेग, हैजा और तपेदिक के रूप में बांट दिया गया है। फिर भी वर्ष 1935 तक हुई कुल मौतों के 50 फीसदी का असली कारण का पता नहीं लग पाया था। जैसे, 10,483 लोगों की मौत को अन्य बुखारों, 1,593 की मौतों को "सांस के दूसरे कारणों" और 1,398 "मौतों को अन्य कारणों" के शीर्षक में सूचीबद्ध किया गया। इतना ही नहीं, असली रोग तक पहुंचने की विफलता के साथ मृतकों की गलत पहचान और जनसंख्या में वृद्वि से भी आंकड़ों को लेकर भी नई समस्याएं पैदा हो गई। ऐसे में, अंग्रेज सरकार के लिए दिल्ली में रोग की सही पहचान और उसके उपयुक्त निदान को लेकर सही निष्कर्ष पर पहुंचना संभव नहीं था।


दिल्ली के शहरी क्षेत्रों में मलेरिया से सम्बन्धित कार्य वर्ष 1936 में आरम्भ हो गया जबकि काफी लागत लगाकर गंदे पानी की निकासी की सुविधापूर्वक व्यवस्था के लिए इंजीनियरी प्रायोजनाएं चलाई गई। दूसरे विश्व युद्व के बाद दिल्ली की असैनिक आबादी से भी डीडीटी के प्रयोग का परीक्षण कराया गया तथा बाद में यह राष्ट्रीय मलेरिया उन्मूलन कार्यक्रम में शामिल की गई। वर्ष 1958 तक मलेरिया नियंत्रण कार्यक्रम निदेशक, मलेरिया संस्थान अब संचारी रोगों का राष्ट्रीय संस्थान के तकनीकी नियंत्रण में था जब कि दिल्ली नगर निगम की स्थापना हुई और यह कार्यक्रम निकाय को सौंपा गया।


दिल्ली में सबसे पहले, क्षय रोग नियंत्रण कार्यक्रम वर्ष 1933 में आरम्भ किया गया जबकि रामकृष्ण आश्रम मिशन ने पहाड़गंज में एक क्षय रोग निदानशाला स्थापित की। उसके बाद निदानशाला जामा मस्जिद ले जाई गई। 68 बिस्तरों वाल सिल्वर जुबली अस्पताल वर्ष 1935 और श्यामा प्रसाद मुखर्जी मार्ग पर म्युनिसिपल टीबी क्लीनिक वर्ष 1938 में स्थापित किए गए। भारतीय क्षय रोग संघ ने नई दिल्ली क्षय केन्द्र वर्ष 1940 में प्रारम्भ किया। जबकि भारत में राष्ट्रीय क्षय रोग कार्यक्रम वर्ष 1950 में आरंभ हुआ, जिसके तहत क्षय रोग के छिपे हुए मामलों का पता लगाना और स्थानिक उपचार की व्यवस्था करना, लोगों से सम्पर्क के कारण होने वाले क्षय रोग की रोकथाम, जनता को क्षयरोग से बचाना और बीसीजी के टीके की व्यवस्था शामिल है।


केंद्रीय मलेरिया ब्यूरो और भारतीय मलेरिया सर्वेक्षण

वर्ष 1909 में केंद्रीय समिति के तहत कसौली में एक केंद्रीय मलेरिया ब्यूरो की स्थापना की गई थी। वर्ष 1916 में भारत के लिए एक मलेरिया संगठन की संकल्पना की गई और उसी वर्ष शिमला में हुई इंपीरियल मलेरिया कान्फ्रेन्स के बाद उसे साकार रूप दे दिया गया। एक केंद्रीय मलेरिया समिति सहित भारत के आठ सूबों में एक-एक प्रांतीय मलेरिया समिति गठित की गई। वर्ष 1925 में कसौली में केंद्रीय मलेरिया संगठन की स्थापना की स्वीकृति प्राप्त की गई और जो कि भारतीय मलेरिया सर्वेक्षण के नाम से जाना गया।भारत का मलेरिया सर्वेक्षण की शुरूआत कसौली स्थित सेन्ट्रल रिसर्च इंस्टीट्यूट के भवन से हुई थी। लेकिन यह बाकी सब लिहाज से स्वतंत्र संगठन था। इसके प्रशासन और वित्तपोषण का दायित्व आईआरएफए पर था। आईआरएफए को विशेष सरकारी अनुदान प्राप्त था पर वह इंग्लैंड के मेडिकल रिसर्च काउंसिल की तरह काफी हद तक एक स्वतंत्र निकाय था। सिंटन को इस संगठन के पहले निदेशक के रूप में नियुक्त किया गया और समस्त जांच-पड़तालों और अनुसंधानों को नए संगठन के तहत कर दिया गया। सिंटन वर्ष 1936 में संगठन के निदेशक पद से सेवानिवृत्ति हुए। उनके बाद लेफ्टिनेंट कर्नल गोर्डन कॉवेल ने संगठन की कमान संभाली। वर्ष में 1937 में भारत सरकार ने सर्वेक्षण के सार्वजनिक स्वास्थ्य और सलाह देने के कार्य को अपने हाथ में लेने का निर्णय किया। इसके साथ ही, संगठन का नाम और मुख्यालय के स्थान में परिवर्तन किया गया।


भारत के मलेरिया संस्थान के नए नाम के साथ उसे दिल्ली स्थानांतरित कर दिया गया। वर्ष 1947 में आजादी के समय राष्ट्रीय मलेरिया नियंत्रण कार्यक्रम (एनएमसीपी) के शुरू होने से पूर्व देश की 22 प्रतिशत आबादी मलेरिया से पीड़ित थी। देश में मलेरिया उन्मूलन के उद्देेश्य के साथ वर्ष 1958 में राष्ट्रीय मलेरिया उन्मूलन कार्यकम शुरू किया गया।

भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद
भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) वर्तमान समय में देश की शीर्ष एवं प्रमुख चिकित्सा शोध संस्था है जो देश में जैवचिकित्सा संबंधी अनुसंधान करने की मुख्य जिम्मेदारी भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद के कंधों पर है। नई दिल्ली के अंसारी रोड पर स्थित आईसीएमआर के नाम से प्रसिद्ध यह संस्था जैव चिकित्सा के क्षेत्र में अनुसंधान की योजना बनाने से लेकर क्रियान्वयन के लिए जिम्मेदार है। यह योजना, सूत्रीकरण, समन्वय, क्रियान्वयन तथा प्रोत्साहन को बढ़ावा देने की मुख्य दायित्व है।


यह विश्व के सबसे पुराने चिकित्सा शोध निकायों में से एक है। वर्ष 1911 में, अंग्रेजी भारत सरकार ने देश में चिकित्सा संबंधी अनुसंधान को प्रायोजित और समन्वित करने के विशिष्ट उद्देश्य के साथ इंडियन रिसर्च फंड एसोसिशन (आईआरएफफ) की स्थापना का ऐतिहासिक निर्णय लिया था। देश की आजादी के बाद वर्ष 1949 में आईआरएफए, के कार्यों और गतिविधियों में उचित विस्तार करके इसे नया नाम "भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद" दिया गया।


आईआरएफफ का प्राथमिक उद्देश्य संचारी रोगों की रोकथाम के लिए चिकित्सा अनुसंधान, उससे संबंधित ज्ञान का प्रसार और प्रायोगिक कार्यों को प्रोत्साहन देने तथा ऐसे कार्यों के प्रचार का वाहक बनने के साथ दूसरे क्षेत्रों में भी हो रही अनुसंधान गतिविधियों का वित्तपोषण करना और सहायता देना था। इस पूरे काम की जिम्मेदारी आईआरएफफ के संचालक मंडल को दी गई थी। जिसमें अंग्रेज वायसराय की कार्यकारी परिषद में शिक्षा और स्वास्थ्य तथा भूमि विभागों के सदस्य की अध्यक्षता में शेष सभी सदस्य सरकारी अफसर थे। तब आईआरएफफ के सदस्यों में इंडियन मेडिकल सर्विस के महानिदेशक, भारत सरकार के स्वच्छता आयुक्त, कसौली के सीआरआइ के निदेशक, वर्ष 1909 में बने केंद्रीय मलेरिया ब्यूरो के विशेष कार्याधिकारी, इंडियन मेडिकल सर्विस (स्वच्छता), के सहायक महानिदेशक और मानद परामर्शदाता सदस्य के रूप में चुने गए रोनाल्ड रॉस थे।


एसोसिएशन के संचालक मंडल की पहली बैठक 15 नवंबर 1911 को मुंबई के परेल स्थित प्लेग प्रयोगशाला में हरकोर्ट बटलर की अध्यक्षता में हुई थी। जबकि दूसरी बैठक में एसोसिएशन की आम सभा में चिकित्सा अनुसंधान के प्रसार की दृष्टि से इंडियन मेडिकल रिचर्स का एक जर्नल शुरू करने का निर्णय हुआ। इसका नाम "इंडियन जर्नल ऑफ़ मेडिकल रिसर्च" रखा गया और उसमें पहले से प्रकाशित हो रहे "पाल्यूडिज्म" नामक प्रकाशन तथा वैज्ञानिक संस्मरणों के रूप में छपे अधिकतर मोनोग्राफों को भी समाहित कर लिया गया। यह जर्नल एसोसिएशन का आधिकारिक प्रकाशन है, जो कि जुलाई 1913 से नियमित प्रकाशित हो रहा है।


Saturday, August 17, 2019

Kashmir House of Delhi_दिल्ली का कश्मीर हाउस

17082019, Dainik Jagran


आज कश्मीर संसद के अनुच्छेद 370 को निरस्त करने के कारण देशव्यापी चर्चा का विषय बना हुआ है। ऐसे में अंग्रेजों के दौर की दिल्ली में बने लेकिन अपेक्षाकृत कम चर्चित कश्मीर हाउस की उपस्थिति को नोटिस में लिया जाना स्वाभाविक है। नई दिल्ली के राजाजी मार्ग पर स्थित कश्मीर हाउस के नाम से ही आभास होता है कि कोई रिहाइश की इमारत रही होगी। अगर हकीकत में देखें तो यह इमारत पहले एक महलनुमा निवास थी। इतिहास में झांकने से पता चलता है कि वर्ष 1930 के दशकों में अंग्रेजों ने इस इमारत को मूल रूप से अंग्रेजी सेना के कमांडर-इन-चीफ के निवास स्थान के रूप में बनाया था। उल्लेखनीय है कि भारत में इस अवधि में दो अंग्रेज कमांडर इन चीफ रहे, जो कि फील्ड मार्शल विलियम रिडल बर्डवुड (6 अगस्त 1925-30 नवंबर 1930) और फील्ड मार्शल फिलिप वालहाउस चेटवोड (30 नवंबर 1930-30 नवंबर 1935) थे। लेकिन अज्ञात कारणों से, इस इमारत को कश्मीर रियासत को बेच दिया गया।


कश्मीर रियासत को इस इमारत को खरीदने के कारण इंडिया गेट के पास बने प्रिंसेस पार्क में आवंटित अपने भूखंड को छोड़ना पड़ा। अंग्रेजों ने नई दिल्ली को बसाने के समय अपने वफादार राजा-रजवाड़ों को इंडिया गेट के दोनों ओर भवन निर्माण के लिए भूखंड दिए थे। "द लाॅस्ट महारानी ऑफ़ ग्वालियरः एक आत्मकथा" में राजमाता विजयराजे सिंधिया ने इस बात का उल्लेख किया है कि प्रिंसेस पार्क में ग्वालियर के अलावा दूसरी रियासतों त्रावणकोर, धौलपुर और नाभा को भी निर्माण के लिए स्थान प्रदान किए गए थे।


इंटैक के दो खंडों में प्रकाशित पुस्तक "दिल्ली द बिल्ट हैरिटेज ए लिस्टिंग" के अनुसार, कश्मीर हाउस आयताकार में बनी एक बड़ी इमारत है। इस दो मंजिला ऊंची इमारत के मुख्य प्रवेश द्वार के लिए समानांतर रूप से बने पंक्तिबद्व खंबों से होकर गुजरना पड़ता है। जबकि इसके बाहर की तरफ दो कोनों पर अलग से खंड बने हुए हैं और मुख्य प्रवेश द्वार के ऊपर का हिस्सा ढका हुआ है। इस इमारत में प्रयुक्त ईंट चिनाई साफ दिखती है।

आजादी के बाद, वर्ष 1953 में यहां यूनाइटेड सर्विस इंस्टीट्यूशन ऑफ़ इंडिया का कार्यालय शिमला से दिल्ली स्थानांतरित हुआ। वर्ष 1870 में बने यूनाइटेड सर्विस इंस्टीट्यूशन ऑफ़ इंडिया की स्थापना का श्रेय एक अंग्रेज सैन्य विद्वान कर्नल (बाद में मेजर जनरल) सर चाल्र्स मैकग्रेगर को है। एक तरह से कहा जा सकता है कि इस संस्थान की प्रगति की कहानी, भारतीय सशस्त्र बलों के विकास से जुड़ी हुई है। इसके गठन का मूल उदेश्य राष्ट्रीय सुरक्षा और उसमें भी विशेष रूप से रक्षा सेवाओं के साहित्य और उससे संबंधित कला, विज्ञान और साहित्य में रुचि और ज्ञान को बढ़ाना था। कश्मीर हाउस में 1957 से 1987 की अवधि में इस संस्थान तत्कालीन सचिव कर्नल प्यारे लाल ने तमाम कठिनाइयों के बावजूद पूरे समर्पण और निस्वार्थ भाव से इसे रचनात्मक रूप से क्रियाशील रखा। उसके बाद, यह संस्थान कश्मीर हाउस करीब 43 साल यहां रहने के बाद वर्ष 1996 में बसंत विहार के राव तुलाराम मार्ग पर स्थानांतरित हो गया।

अब कश्मीर हाउस में मुख्य रूप से भारतीय सशस्त्र बलों के इंजीनियर-इन-चीफ का कार्यालय है। मिलिट्री इंजीनियर सर्विसेज (एमईएस), भारतीय सेना के इंजीनियर कोप्र्स (बल) का एक प्रमुख अंग है जो कि सशस्त्र बलों को पार्श्व में रहकर इंजीनियरी सहायता प्रदान करता है। इसकी गिनती देश की सबसे बड़ी निर्माण और रखरखाव एजेंसियों में होती है। एमईएस पूरे देश में अपनी इकाइयों के माध्यम से सेना, वायु सेना, नौसेना और डीआरडीओ की विभिन्न इकाइयों को इंजीनियरिंग क्षेत्र में सहायता प्रदान करता है।

एमईएस, इंजीनियर-इन-चीफ के नेतृत्व में कार्य करता है। इंजीनियर-इन-चीफ युद्वकाल और शांति के समय में निर्माण गतिविधियों के संबंध में दिल्ली स्थित रक्षा मंत्रालय और सेना के तीनों अंगों के प्रमुखों के सलाहकार के दायित्व का निर्वहन करते हैं। मिलिट्री इंजीनियरिंग सर्विसेज के जिम्मे थल सेना, नौसेना और वायु सेना की सभी ढांचागत परिसंपत्तियों के डिजाइन, निर्माण और रखरखाव की जिम्मेदारी है। सेना की इंजीनियरी शाखा के माध्यम से उसके अधिकारियों की देखरेख में ठेके पर होने वाले कार्यों का डिजाइन भी एमईएस तैयार करता है। एमईएस के पास बहु-विषयक विशेषज्ञों का एक एकीकृत समूह है, जिसमें वास्तुकार, सिविल, इलेक्ट्रिकल, मैकेनिकल इंजीनियरों सहित स्ट्रक्चरल डिजाइनर, सर्वेक्षक और विभिन्न कार्यों के नियोजन, डिजाइनिंग और निगरानी के लिए विशेषज्ञ शामिल हैं।

Saturday, March 23, 2019

Post Partition Settlement of Refugee Colonies in Delhi_दिल्ली में बसी विस्थापितों की काॅलोनियां





अगस्त 1947 में भारत के विभाजन के तुरंत बाद सांप्रदायिक कट्टरता और महजबी असहिष्णुता के कारण हुई अभूतपूर्व रक्तिम हिंसा हुई। इसी का नतीजा था कि पाकिस्तान में रहने वाले हिंदुओं और सिखों को अपनी जानमाल की सुरक्षा के डर से पलायन करके भारत आना पड़ा। इस अप्रत्याशित माननीय आबादी के पलायन की पहले से कोई व्यवस्था न होने का परिणाम यह हुआ कि सरकार को राहत और पुनर्वास की भारी समस्याओं का सामना करना पड़ा। 


दिल्ली में ही पाकिस्तान से कुल 459,391 हिंदू-सिख विस्थापित आकर बसे, जिनमें 265,679 पुरुष और 229,712 महिलाएँ थी। इन शरणार्थियों में कुछ तो पाकिस्तान गए मुसलमानों के खाली घरों में ठहरे, लेकिन अधिकांश विस्थापित खुले आकाश के नीचे ही रहने को विवश थे। तत्कालीन परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए उनके अस्थाई आश्रय के लिए पुनर्वास सहित अन्य व्यवस्थाएं की गई, जिसके तहत उनको पुरानी सैनिक बैरकों और तंबू वाले शिविरों में रखा गया। किंग्सवे कैंप की पुरानी सैन्य बैरकों में 50,000 विस्थापितों को आश्रय प्रदान किया गया। 

पुराना किला में छप्पर की छत वाले तंबू लगाए गए। यहां तक कि किले की दीवारों से सटाकर रहने लायक कमरों में तब्दील कर दिया गया। अनेक शरणार्थियों को फिरोजशाह कोटला और सफदरजंग मकबरे के मैदानों में शरण दी गई। तीस हजारी में एक तंबू शिविर बनाया गया, जिसमें करीब 3000 विस्थापितों की रहने की व्यवस्था की गई। इन सभी अस्थायी शिविरों में रहने वाले विस्थापितों के लिए रसोई, स्नानघर और शौचालय बनाए गए।

आजादी के बाद दो साल तक सरकार के लिए दिल्ली में विस्थापितों को राहत और आश्रय देने की समस्या एक बड़ी चुनौती बनी रही। केंद्र सरकार ने दूसरे राज्यों की तरह दिल्ली को तीन लाख विस्थापितों के पुनर्वास का लक्ष्य दिया था। पर वास्तविकता में विस्थापितों की संख्या उपरोक्त में वर्णित लक्ष्य से बहुत अधिक थी। यहां आने वाले विस्थापितों में 470386 शहरी विस्थापित और 25005 ग्रामीण विस्थापित व्यक्ति थे। 
केंद्रीय राहत और पुनर्वास मंत्रालय ने शहरी पुनर्वास की बड़ी समस्या के समाधान के लिए कार्यालय स्थापित किए। जिनमें से एक शत्रु संपत्ति संरक्षक कार्यालय पी ब्लॉक, नई दिल्ली में और दूसरा पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन के ठीक सामने वेवल कैंटीन में हाॅउस एंड रेंट ऑफिसर का कार्यालय बनाया गया। इसमें पहले कार्यालय का काम शहर में खाली हुई संपत्ति के मामलों और दूसरे कार्यालय का काम नवनिर्मित घरों, दुकानों, किराए के मकानों, नए भूखंडों के आवंटन और ऋण और अनुदान के वितरण, रखरखाव के भत्तों और वजीफों के मामलों को देखना था। जबकि आवास और ग्रामीण क्षेत्र में भूमि के आवंटन की जिम्मेदारी मुख्य रूप से जिला प्रशासन के जिम्मे थी। 

1951 के अंत तक करीब 190, 000 विस्थापितों को दिल्ली छोड़कर पाकिस्तान गए परिवारों के खाली घरों में बसा दिया गया। केंद्रीय पुनर्वास मंत्रालय ने ऐसे व्यक्तियों को मकान उपलब्ध कराने के लिए नई आवास नीति और योजनाएँ तैयार की, जिन्हें खाली हुए घरों में रहने की जगह नहीं मिली। ऐसे में राजधानी में व्यापक स्तर पर आवासीय निर्माण की आवश्यकता को देखते हुए इस कार्य को केन्द्रीय लोक निर्माण विभाग, जिसने बृहत्तर दिल्ली की योजना बनाने की जिम्मेदारी अपने कंधों पर ली, के माध्यम से करवाने का निर्णय लिया गया। जिसके तहत सभी क्षेत्र अनुसार वाली योजनाओं को उनके पड़ोस से जोड़ने और मुख्य शहर के केंद्र तक आसान पहुंच को ध्यान में रखते हुए योजना बनाई गई। 

इस काम के लिए करीब तीन हजार एकड़ की भूमि चिन्हित की गई, जहां पर लगभग दो लाख व्यक्तियों को आवास प्रदान करने का लक्ष्य था। इस योजना के तहत विभिन्न कालोनियों बनाई गईं। इन काॅलोनियों में प्रमुख रूप से राजेंद्र नगर (नई दिल्ली उत्तरी विस्तार क्षेत्र), पटेल नगर (शादीपुर), मलकागंज, किंग्सवे, विजय नगर, निजामुद्दीन, निजामुद्दीन एक्सटेंशन, जंगपुरा, जंगपुरा एक्सटेंशन ए और बी, लाजपत नगर (किलोकरी) पूर्व, लाजपत नगर पश्चिम, कालकाजी, मालवीय नगर, भारत नगर, तिलक नगर (तिहाड़), पुराना किला, फिरोजशाह कोटला, आजादपुर, रैगरपुरा, अंगूरी बाग और प्रदेश गाॅर्डन थीं।



First Indian Bicycle Lock_Godrej_1962_याद आया स्वदेशी साइकिल लाॅक_नलिन चौहान

कोविद-19 ने पूरी दुनिया को हिलाकर रख दिया है। इसका असर जीवन के हर पहलू पर पड़ा है। इस महामारी ने आवागमन के बुनियादी ढांचे को लेकर भी नए सिरे ...