Showing posts with label बारापुला. Show all posts
Showing posts with label बारापुला. Show all posts

Sunday, July 15, 2018

Changing course of river yamuna_यमुना की बदलती राहे



दिल्ली के इतिहास को आकार देने में यमुना एक निर्धारक कारक रही है। ऐसा माना जाता है कि यह रिज के पश्चिम से बहते हुए सरस्वती, ऋग्वेद के प्राचीन श्लोकों में सभी नदियों के सबसे प्रमुख नदी के रूप में प्रशंसनीय, में मिलती थी। उल्लेखनीय है कि सरस्वती नदी राजस्थान के रेत के धोरों में अदृश्य हो गई। आज की दिल्ली के भौतिक भूदृश्य की रूपरेखाएं-वनस्पति समूह और जंतु समूह सहित-जिस रूप में दिखाई पड़ती हैं, वे कई अर्थों में हजारों वर्ष पूर्व के इनके रूप से भिन्न हैं।

यमुना नदी का इतिहास पुराना और घटनापूर्ण रहा है और दिल्ली शहर के बसने में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। प्रसिद्व अंग्रेज इतिहासकार पर्सिवल स्पीयर के शब्दों में, दिल्ली के इतिहास और उसकी वास्तुकला को तो ढंग से संकलित किया गया है परंतु उसके प्राकृतिक भूदृश्य और बसावट की जानकारी कमतर है। दिल्ली पर ऐतिहासिक साहित्य मुख्य रूप से राजनीतिक, सामाजिक, पुरातात्विक या स्थापत्य इतिहास पर केंद्रित है। जहां तक आसपास के पर्यावरण की बात है, उसको लेकर साहित्यिक संदर्भ नाममात्र के ही रहे हैं। ऐसे संदर्भ भी शायद नदी, पहाड़ियों, वनस्पतियों, जीवों और भूविज्ञान के सामान्य विवरण तक ही सीमित थे।

उत्तर भारत की एक प्राचीन जल वाहिका यमुना दिल्ली के जल निकास का प्रमुख साधन है। उत्तर से दक्षिण दिशा में बहने वाली यह नदी मोटे तौर पर उत्तर प्रदेश के साथ दिल्ली की पूर्वी सीमा रेखा के रूप में मौजूद है। हजार बरसों से यह नदी दिल्ली की जमीन से होकर बह रही है और इस तरह, दोनों ही किनारों पर उपजाऊ मिट्टी लाकर जमा करती है। दिल्ली में जमीन का ढलान भी यमुना नदी के बहाव की मुख्य दिशा के अनुरूप है यानी उत्तर से दक्षिण की ओर। नदी के पश्चिम में एक स्थानीय जल विभाजक रेखा है जो उस अंचल के जल निकास को दो क्षेत्रों में बांटती है। पूर्वी अंचल का पानी यमुना में जा गिरता है, पश्चिमी अंचल की सतह का पानी प्राकृतिक रास्तों से गुजरता हुआ दक्षिण की ओर नजफगढ़ नाले में जा मिलता है। 

एक समय यमुना की धारा पश्चिम की ओर होकर बहती थी और यह घग्गर-हकरा नदी में मिलती थी। समय के साथ इसकी धारा पूरब की ओर होती गई और अंततः यह गंगा नदी में मिल गई। नजफगढ़, सूरजकुंड और बड़कल की झीलें यमुना की पुरानी धाराओं का प्रतिनिधित्व करती हैं। नदी की पुरानी धारा के चिन्ह परिव्यक्त जल मार्गों और चाप झीलों में देखे जा सकते हैं जो वर्तमान धारा के पश्चिम में विशेषतः उत्तरी भाग में दिल्ली की सीमा में पहले पाई जाती है। 

दिल्ली क्षेत्र के पुरायुगीन पर्यावरण के अनुसार, यमुना नदी का विस्थापन दिल्ली की उत्तरी और पश्चिमी दिशाओं में 100 किलोमीटर और दक्षिण में 40 किलोमीटर हुआ। चार हजार वर्ष पूर्व यह नदी बदरपुर पहाड़ियों से होकर बहती थी। 

यह नदी पिछले चार हजार साल में अपनी दिशा बदलती रही है। सैटेलाइट इमेजरी यानी उपग्रहों से यमुना की तस्वीरों से पता चलता है कि यह नदी अपना रास्ता बार-बार बदलती रही है। पहले यमुना उत्तर पूर्व से दक्षिण पश्चिम की ओर आज के करनाल, सफीदों एवं भिवानी से होकर बहती थी और फिर मुड़कर झज्झर से गुडगांव होकर दिल्ली की ओर आती थी। फिर इस नदी ने पूर्व की ओर खिसकना शुरू किया। इस नदी के कम से कम पांच बार पूर्व की ओर खिसकना शुरू किया। इस नदी के कम से कम पांच बार पूर्व की ओर खिसकते जाने के प्रमाण आज की दिल्ली में देखे जा सकते हैं। नजफगढ़, सूरजकुंड और बड़कल की झीलें यमुना की पहाड़ियों के बीच रास्ता बदलते जाने कारण बनी मानी जाती हैं। इस प्रकार यह नदी खिसकती हुई रिज के दक्षिण पश्चिम की ओर पूर्व की ओर बढ़ती रही है। कालांतर में यह पूर्व के मैदानी क्षेत्र की तरफ बहते-बहते अपने वर्तमान प्रवाह-मार्ग में बहने लगी।

वैसे तो यमुना दिल्ली से होकर बहने वाली एक बारहमासी नदी है, तथापि यहां की छोटी बरसाती नदियां भी महत्वपूर्ण हैं। ये बरसाती नदियां अब प्रायः गंदे और बदबूदार पानी वाले नालों के रूप में शेष रह गई हैं, इनका ऐतिहासिक या पर्यावरणीय महत्व गौण हो गया है। अधिकांश नदी-नाले, जिनमें बुधी नाला सबसे प्रमुख है, दक्षिणी दिल्ली के बल्लभगढ़ पहाड़ी इलाके से पूर्व की ओर बहता है। प्राचीन काल की बस्तियां प्रायः ऐसे ही जल स्त्रोतों के अपवाह क्षेत्र में सघन रूप से बसीं। ऐसा माना जाता है कि हरियाणा में सोनीपत के निकट बहने वाला बुधी नाला शायद यमुना की ही एक पुरानी धारा है। 

उल्लेखनीय है कि बुधी नाला ही भूमि को खादर और बांगर में विभाजित करता है। दिल्ली से नीचे नदी की धारा आम तौर पर बांगर जलोढक के पूर्वी तट के साथ-साथ बहती है। खादर यमुना नदी की नई बालू मिट्टी का निक्षेप है। इसके पश्चिम में बांगर है जो बहुत समय पूर्व नदी के पुराने प्रवाह-मार्गों के निक्षेपों से बने बालू मिट्टी के टीले हैं। डाबर दक्षिण-पश्चिमी दिल्ली की बाढ़ प्रभावित नीची भूमि है। यह पहाड़ियों के पश्चिम में जल जमाव का क्षेत्र है जहां से धाराएं पश्चिम को जाती है।

यमुना नदी दिल्ली के भूदृश्य का एक मुख्य आकर्षण है। आज संकुचित स्वरूप और प्रदूषित जल वाली इस नदी की स्थिति दयनीय है। मानसून के दौरान जब इसका पानी खतरे के निशान से ऊपर उठता है तभी यमुना की ओर सबका ध्यान जाता है। दिल्ली की सीमा में प्रवेश करने से पूर्व यमुना से दो नहरें, ईस्टर्न यमुना कैनाल और वेस्टर्न यमुना कैनाल, निकाल लिए जाने के कारण दिल्ली के मैदानी भाग में यह एक पतली धारा के रूप में बहती है। नदी के दोनों किनारे निचले और बलुई है जबकि ओखला वीयर के पास तल में मजबूत चट्टानें भी पाई गई हैं। 

आज यमुना नदी दिल्ली की सीमा में पल्ला गांव से प्रायः एक मील उत्तर में प्रवेश करती है, जहां इसकी समुद्र तल से ऊंचाई लगभग 690 फुट है। यह समुद्र तल से 650 फुट की ऊंचाई पर ओखला के नीचे जैतपुर के पूर्व में एक स्थान पर दिल्ली की सीमा छोड़ देती है। यमुना नदी दिल्ली महानगरीय क्षेत्र में उत्तर से दक्षिण-पूर्व की ओर बहती है। सामान्य रूप से जल का पाट बहुत चौड़ा नहीं है किन्तु बारिश के मौसम में बाढ़ से शहर को बचाने के लिए पक्के बांध और पुश्ते बनाकर नदी के दोनों किनारों को रोकथाम की जाती है। इतना ही नहीं, उसके बीच बाढ़ के पानी को रोके रखने के लिए काफी स्थान छोड़ा हुआ है।

दिल्ली के अन्तर्गत उसके प्रवाह की लंबाई लगभग 51 किलोमीटर है और वह 18 से 20 इंच प्रति मील की औसत से नीचे उतरती है। उत्तर में पल्ला गांव से दक्षिण में जैतपुर तक नदी का वर्तमान प्रवाह बहुत टेढ़ा-मेढ़ा है। वजीराबाद तक नदी दक्षिण की ओर बहती है और फिर पूर्व की ओर तेज मोड़ लेती है। लाल किले के निकट से गुजरती हुई वह दक्षिण पूर्व दिशा में ओखला तक पहुंचती है जहां उसकी प्रवाह धारा में आगरा नहर हेडवर्क्स से बाधा पड़ती है।

Saturday, June 17, 2017

Barapula_water drain_गंदगी नहीं ताज़े पानी का स्त्रोत था बारापुला




दक्षिणी दिल्ली में रिज से पानी के यमुना नदी की ओर बहाव की ओर नजर डालें तो बारापुला, तेहखंड और बुधिया नाला तीन ऐसे रास्ते हैं, जिनसे होकर रिज की पहाड़ियों का पानी यमुना में पहुंचा करता था। ये तीनों अब नाले के रूप में दिखाई देते हैं जो शहर की गंदगी को यमुना में पहुंचाने का काम करते हैं। इन नालों ने कभी अच्छे दिन भी देखे थे। मानसून के दिनों में तेज रफ्तार से पानी की निकासी करने वाली ये नाले पहाड़ी नदियों की तरह काम करते थे।


मार्ग से प्रकाशित जट्टा-जैन-नेउबाउर की संपादित “वाटर डिजाइन, एनवायरनमेंटएंड हिस्ट्रिज” पुस्तक में जेम्स एल वेशकोट “बारापुला नाला और इसकी सहायक धाराएं, सल्तनत और मुगलकालीन दिल्ली में जल विभाजन की वास्तुकला” नामक अध्याय में लिखते हैं कि दिल्ली रिज से लेकर मैदान, महरौली से लेकर शाहजहांनाबाद तक का समूचा क्षेत्र एक बड़े जल स्त्रोत से सिंचित होता था। यह पानी के एक प्रमुख प्रवाह का रूप ले लेता था जो कि आज बारापुला नाला (अब इस नाम के बने नए फ्लाईओवर के कारण प्रसिद्ध) के नाम से जाना जाता है। बारापुला नाला आज के शहरी गांव निजामुद्दीन से होते हुए बहता हुआ एक प्रमुख जल स्त्रोत से मिलता है, जिसे आज कुशक नाला के रूप में जाना जाता है।



जेम्स एल वेशकोट के अनुसार, बृहत्तर दिल्ली में पानी की चार प्रमुख धाराएं थी। इनमें से एक हौजखास तालाब में पहुंचती थी, कुशक नाला दक्षिणपूर्व दिल्ली को सिंचित करता था, मध्य रिज की पहाड़ी धाराएं थीं और अंतिम धारा पानी की घुमावदार धाराएं थीं, जिनसे लोदी मकबरे के बागों और गांवों को पानी पहुँचता था।



जब हम किला रॉय पिथौरा की पानी की विभिन्न धाराओं से दिल्ली के जल प्रवाह क्षेत्र तक की यात्रा करते हैं तो हमें इनके व्यापक अंर्तसंबंध का पता चलता है। यहाँ नदी के किनारे की बसावट का इलाका किलोकरी के नाम से जानी जाती थी। यह बारापुला के यमुना नदी में मिलने के स्थान के ठीक दक्षिण में है। 1286 ईस्वी में सुल्तान कैकुबाद ने किलोकरी का विस्तार किया था। ऐतिहासिक पुस्तकों में यहां पर सुन्दर महल और उद्यानों के होने का वर्णन है। ऐसा माना जाता है कि शायद नाले और नदी दोनों में पानी की बाढ़ के कारण किलोकरी अधिक समय तक आबाद नहीं रही जबकि आज के आधुनिक समय में यहां घनी शहरी आबादी का विकास देखने को मिलता है।



कुशक नाला में मिलने वाली पानी की मुख्य धारा में पहाड़ी ढलानों की छोटी धाराओं सहित तुगलकाबाद से ऊपरी क्षेत्र में विभिन्न जल स्त्रोंतों से पानी आता था। कुशक नाला में मिलने वाले जल स्त्रोतों का समागम, एक तुगलक-कालीन जल नियंत्रण संरचना सतपुला बांध के ऊपर होता था। सतपुला अंग्रेजों से पहले की दिल्ली का विशालतम और सर्वाधिक परिष्कृत जल नियंत्रण ढांचा है। मुहम्मद बिन तुगलक ने 1343 ईस्वी में इसको बनवाया था।



जेम्स एल वेशकोट के अनुसार, सतपुला बांध से नियंत्रित पानी एक संकरी जलधारा के रूप में निकलता था, जिसकी दाई ओर चिराग-दिल्ली गांव, और बाई ओर सिरी का किला था। अफसोस की बात है कि आज इसके ठीक उलट यह दुर्गंध-कचरे से भरा हुआ नाला चिराग दिल्ली गुजरता हैं।



बारापुला नाला के आगे बढ़ने के साथ इसमें दक्षिण से, अब्दुल रहीम खानखाना (प्रसिद्ध हिंदी मध्यकालीन कवि) के भव्य मकबरे के बाग से होकर बहने वाली पानी की छोटी उपधाराएं आकर मिलती हैं। दिल्ली के इतिहास में इस कब्र परिसर शायद नाले के सामने बेहतरीन बगीचा था। इस नाले पर अभी तक बची हुई सबसे पुरानी जल संरचना मुगलकालीन बारापूला का पुल है, जिस पर इस नाले का नाम है।



First Indian Bicycle Lock_Godrej_1962_याद आया स्वदेशी साइकिल लाॅक_नलिन चौहान

कोविद-19 ने पूरी दुनिया को हिलाकर रख दिया है। इसका असर जीवन के हर पहलू पर पड़ा है। इस महामारी ने आवागमन के बुनियादी ढांचे को लेकर भी नए सिरे ...