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Thursday, November 3, 2016

दिल्ली की मुद्रा देहलीवाल_Delhi coin Dehliwal






बारहवीं शताब्दी के मध्य में अजमेर के चौहानों से पहले तोमरों राजपूतों ने दिल्ली को अपनी पहली बार अपने राज्य की राजधानी बनाया था। तोमर वंश के बाद दिल्ली की राजगद्दी पर बैठे चौहान शासकों के समय में दिल्ली राजनीतिक स्थान के साथ एक महत्वपूर्ण व्यापारिक केंद्र बन गई थी। तत्कालीन दिल्ली में व्यापक रूप से प्रचलित मुद्रा, देहलीवाल कहलाती थी। वैसे तो उस समय सिक्के, शुद्ध चांदी से लेकर तांबे के होते थे। पर सभी सिक्कों को चांदी की मुद्रा के रूप में ढाला गया था और सभी एक ही नाम देहलीवाल से जाने जाते थे।
सन् 1192 में तराइन के लड़ाई में विदेशी मुसलमान हमलावर मुहम्मद गौरी की जीत और अंतिम भारतीय हिंदू सम्राट पृथ्वीराज चौहान की हार के साथ दिल्ली की राजनीति में बदलाव से साथ आर्थिक रूप से दिल्ली टकसाल की गतिविधियों में भी परिवर्तन आया। दिल्ली के कुतुब मीनार के परिसर में सत्ताईस हिंदू मंदिरों के ध्वंस की सामग्री से खड़ी की गई नई मस्जिद के शिलालेख में उत्कीर्ण जानकारी के अनुसार, इस मस्जिद के निर्माण में 120 लाख देहलीवाल का खर्च आया।
उल्लेखनीय है कि विदेशी मुस्लिम हमलावर भी दिल्ली के हिंदू राजपूत शासकों की मुद्रा को देहलीवाल के नाम से ही पुकारते थे। वैसे बैल-और-घुड़सवार के सिक्कों का उत्पादन तो जारी रहा पर इन सिक्कों से राजपूत शूरवीरों की आकृति को हटा दिया गया। उनकी आकृति के स्थान पर संस्कृत में उरी हउमीरा (अमीर या सेनापति) और देवनागरी लिपि में उरी-महामदा के साथ बदल दिया गया।
इस पूरी अवधि के दौरान दिल्ली टकसाल की उत्पादन क्षमता स्थिर और उत्पादन की दर भी काफी हद तक एकसमान थी। अंग्रेज़ इतिहासकार एडवर्ड थॉमस के अनुसार, मोहम्मद बिन साम यानी मुहम्मद गौरी की मौत तक जन साधारण व्यक्तियों का मौद्रिक लेनदेन देहलीवाल अथवा जीतल की मुद्रा में ही होता थी। देहलीवाल मुद्रा का भार 32 रत्ती था। ऐसा देखा गया है कि अधिकतर प्राचीन भारतीय मुद्राएं औसत रूप से 50 ग्रेन भार की होती थी। जैसे वराह वाली चांदी की पुराने मुद्राओं सहित राजपूत मुद्राओं का औसतन भार 50 ग्रेन होता था। उल्लेखनीय है कि भारत में महाराज मनु के काल से ही चांदी तौलने का माप रत्ती होता था।
भारतीय इतिहासकार डी.सी. सरकार की पुस्तक भारतीय सिक्कों में अध्ययन के अनुसार, बारहवीं शताब्दी के अंत में, मोहम्मद गौरी ने अपनी स्वर्ण मुद्रा के लिए गहड़वाल की सिक्के पर बैठी लक्ष्मी को अपनाया। गुलाम वंश के सुल्तानों ने देहलीवाल नामक सिक्के जारी किए, जिसमें एक ओर प्रसिद्व चौहान घुड़सवार और दूसरी ओर भगवान शिव के बैल के साथ नागरी अक्षरों में शाही नाम खुदा हुआ था। उनके सिक्के आम तौर पर चांदी और तांबे के मिश्रण से बने थे, जिनका वजन 56 सेर था। उनके सोने के सिक्के भी चांदी और तांबे के मिश्रण वाले सिक्कों के समान ही थे। गौरतलब है कि दिल्ली के विभिन्न शासकों-तोमर, चौहान, गौरी और गुलाम-वंश के दौर में दिल्ली टकसाल की स्थिति कोई खास अलग नहीं थी। 12 वीं सदी में विभिन्न राजपूत शासकों के शासनकाल में दिल्ली टकसाल ने करीब एक अरब सिक्के ढ़ाले थे।
वर्ष 1053 के बाद से गांधार यानि आज के अफगानिस्तान में स्थित गजनी राज्य से चांदी की लगातार आमद ने दिल्ली टकसाल के पीढ़ी दर पीढ़ी सिक्का बनाने वाले कारीगरों को एक मानक स्तर के वजन वाले सिक्के (3.38 ग्राम) तैयार करने में मदद की थी। उस समय धातु सामग्री, सामान्य वजन सीमा और डिजाइन में यह सिक्का शाही दिरहम पर आधारित था। चांदी-तांबा की मिश्र धातु वाले इन सिक्कों में विशुद्ध रूप से 0.59 ग्राम चांदी होती थी।
उस दौर में भारतीय व्यापारी अपने व्यापार के लिए लाल सागर की नौवहन प्रणाली का उपयोग करते थे। इस समुद्रपारीय व्यापार के कारण इन सिक्कों का चलन फारस की खाड़ी से भारत के उत्तर पश्चिम तट तक हो गया था। उल्लेखनीय है कि इन सिक्कों में वर्ष 1180 में खलीफा शासन के दौरान यूरोपीय चांदी के टुकड़ों से दोबारा गढ़े गए सिक्के शामिल थे। बारहवीं सदी के उत्तरार्ध में पश्चिम यानी यूरोप से होने वाली चांदी की नियमित आपूर्ति के परिणामस्वरूप उत्तर भारत में सिक्के गढ़ने वालों ने गुजराती गड़िया पैसा और राजपूतों के देहलीवाल सिक्के बनाए।
हालांकि पूरे मुइजिद शासन (1192-1210) और गुलाम वंश के कालखंड में बैल-और-घुड़सवार वाले देहलीवाल सिक्कों का उत्पादन और पूर्ववर्ती राजपूत सिक्कों के रूप में उनका उपयोग समान रूप से जारी रहा। लेकिन सिक्के के मानक भार में पांच प्रतिशत की वृद्धि करने के साथ समान रूप से ही उतनी ही प्रतिशत चांदी घटा दी गई। दिल्ली के बैल-घुड़सवार के सिक्कों के ढलने यानि तैयार करने का कार्य जारी रहने के कारण ही वर्ष 1192-1216 तक के कालखंड में इन सिक्कों का निर्यात गांधार, पंजाब और अफगानिस्तान से आगे तक होता रहा।
मुहम्मद बिन साम (1193-1206), इल्तुतमिश (1210-1235), रूक्न अल दीन फिरोज (1235), रादिया (1236-1240), मुइज्ज अल दीन बहराम (1240-1242), अलाउद्दीन मसूद (1242-1246) और नासिर उल-दीन महमूद (1246-1266) के सोने और तांबे के सिक्के देहलीवाल ही कहलाते थे। इन छोटे सिक्कों की एक ओर शिव का बैल (नंदी) और दूसरी ओर राजपूत घुड़सवार होता था और लंबाई में राजा का नाम नागरी लिपि में या अरबी की कुफिक शैली में लिखा होता था।
उत्तर भारत में स्थापित दिल्ली सल्तनत के सुल्तानों ने चांदी और तांबे के सिक्कों पर आधारित मुद्रा प्रणाली को ही चलाए रखा जिसमें चांदी के टका और देहलीवाल का प्रभुत्व था। इसके साथ ही, तांबे का जीतल का भी प्रचलन था। जीतल पुरानी हिंदू देहलीवाल मुद्रा का ही एक विस्तार था जो कि देहलीवाल से अधिक लोकप्रिय तो था पर उसका दायरा एक हद तक शहर तक ही सीमित था।
जब वर्ष 1210 में इल्तुमिश दिल्ली के सुल्तान बना तो उसे विरासत में मिली सिक्कों की टकसालों में दिल्ली में मुसलमानों के राज से पहले के राजपूती सिक्कों का गढ़ना जारी था। यह काम वर्ष 1220 में मध्य एशिया में चांदी के उत्पादन के खत्म होने तक कायम रहा। तुर्कों की दुश्मन रियासतों के गुजरात और बंगाल के समुद्री तटों पर कब्जे के कारण वर्ष 1220 में दिल्ली सल्तनत को पश्चिम से समुद्र की ओर से होने वाली होने वाली चांदी की महत्वपूर्ण आपूर्ति अवरुद्ध हो गई। इसका परिणाम देहलीवाल के अस्तित्व पर संकट के रूप में सामने आया।
अंग्रेज़ इतिहासकार एच नेल्सन राइट के अनुसार, शम्स अल-दीन इल्तुतमिश (1210-1235) के दौर में दिल्ली की मुद्रा के मानकीकरण के साथ इन सिक्कों में चांदी की मात्रा को घटाकर आधा कर दिया गया। नए सिक्के, जिसे जीतल का नाम दिया गया, का वजन 32 रत्ती था। जीतल में प्रयुक्त चांदी और तांबे का संयुक्त मूल्य चांदी की दो रत्ती के बराबर था। जबकि तांबे के लिए चांदी का सापेक्ष मूल्य 1:80 था। दक्षिण भारत में देवगिरी पर दिल्ली सल्तनत के सुलतानों की जीत के बाद उत्तरी भारत में जीतल का चांदी के टका का सापेक्ष मूल्य बदलकर 1:48 और दक्कन में 1:50 हो गया। दक्षिण भारत में इसके थोड़े से अंतर से महंगा होने का कारण यह था कि तांबा विदेशों से आयात किया जाता था।
तत्कालीन इतिहास की पुस्तकों में सिंध के शासक मलिक नासिरूद्दीन कुबाचा के अपने बेटे के माध्यम से इल्तुतमिश को एक सौ लाख देहलीवाल की पेशकश करने और अपने पिता की मौत पर उसके बेटे के इल्तुतमिश के शाही खजाने में पांच सौ लाख देहलीवाल जमा करवाने का हवाला आता है। उत्तर भारत में दिल्ली के सुल्तान शम्स अल-दीन इल्तुतमिश का शासनकाल को राजनीतिक सुदृढ़ीकरण का दौर माना जाता है और राइट के मुताबिक, यह दिल्ली के सिक्कों के इतिहास में एक मील का पत्थर था।
इतिहासकार राइट के अनुसार 48 जीतलों का एक टका था। एक जीतल दो रत्तियों के बराबर था। और इस तरह से वह टका और जीतल दोनों को तब उत्तर भारत में प्रचलित माशा और रत्ती के सोने के वजन मानक से जोड़ने में सफल रहा। उसके बाद हमारे समय में दशमलव प्रणाली को अपनाया गया था।
"हिस्ट्री ऑफ सिविलाइजेशनंस ऑफ सेंट्रल एशिया" पुस्तक में लेखक मुकम्मद साजपिदिनोविक अस्मीमोव लिखते हैं कि एडवर्ड थॉमस के बारे में अपने पहले के विचारों का खंडन करने के बाद, राइट ने इल्तुतमिश की चांदी के टका का सही ढंग से मूल्य आंकने का दावा किया जो कि एक तोले के बराबर था। उदाहरण के लिए, 12 माशा और प्रत्येक माशा में 12 रत्ती थी। ऐसे, एक तोला 96 रत्तियों के बराबर था। भारतीय रुपए के मामले में वजन का मानक आज के समय तक कायम है। दूसरी नई बात जीतल का चलना था, जिसने पुराने देहलीवाल मुद्रा का स्थान लिया।


(कादंबिनी, नवम्बर 2016)

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