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Saturday, October 31, 2020
Maker of Indian Administrative System in India_प्रशासनिक व्यवस्था के प्रणेता सरदार पटेल
सरदार पटेल ने अंतरिम सरकार के अपने पूर्ववर्ती अनुभवों को स्मरण रखते हुए 10 अक्तूबर 1949 को भारतीय संविधान सभा की बहस में कहा, 'मैं इस सभा के रिकार्ड के लिए यह कहना चाहता हूं कि यदि गत दो या तीन वर्षों में सिविल सेवाओं के अधिकारियों ने देशभक्ति की भावना से और निष्ठा से काम नहीं किया होता तो यह संघ समाप्त हो गया होता। आप सभी प्रान्तों के प्रीमियरों से पूछिए। क्या कोई भी प्रीमियर सिविल सेवा अधिकारियों के बिना काम करने को तैयार है? वह तत्काल त्यागपत्र दे देगा। उसका गुजारा नहीं है। हमारे पास सिविल सेवा के बचे हुए कुछ ही अधिकारी थे। हमने उन थोड़े से व्यक्तियों के साथ बहुत कठिन से कार्य किया है।'
उल्लेखनीय है कि सरदार पटेल ने प्रशासन की स्थिरता, उसे पुनः सबल बनाने का कार्य तथा सिविल सेवाओं के मनोबल को ऊंचा रखने की दृष्टि से महत्वपूर्ण कदम उठाएं। सरदार पटेल बिना देरी किए शीघ्रता से देश के केंद्रीय प्रशासनिक ढांचे को मजबूत बनाने के काम में जुट गए। 21 अप्रैल 1947 को दिल्ली के मेटकाफ हाउस में, जब देश में सत्ता का हस्तांतरण तकरीबन चार महीने दूर था और अभी इस विषय पर कोई निर्णय नहीं हुआ था, उस समय सरदार पटेल ने अखिल भारतीय प्रशासनिक सेवा प्रशिक्षण स्कूल के पहले परिवीक्षार्थियों के समूह को संबोधित किया। सरदार पटेल ने अपने संबोधन में कहा, ‘आप भारतीय सेवा के अग्रणी हैं और इस सेवा का भविष्य आपके कार्यों, आपके चरित्र और क्षमताओं सहित आपकी सेवा भावना के आधार से रखी नींव और स्थापित परंपराओं पर निर्भर करेगा।’
दिल्ली की यमुना नदी के किनारे बने इस स्कूल में प्रशिक्षण लेने वाले भारतीय प्रशासनिक सेवा के चौबीस और भारतीय विदेश सेवा के नौ परिवीक्षकों को पटेल ने स्पष्ट शब्दों में कहा, 'शायद आप पिछली सिविल सेवा, जिसे इंडियन सिविल सर्विस के नाम से जाना जाता है, को लेकर भारत में प्रचलित एक कहावत से परिचित हैं जो न तो भारतीय है, न ही सिविल है और उसमें सेवा की भावना का भी अभाव है। सही मायने में, यह भारतीय नहीं है क्योंकि भारतीय सिविल सेवा के अधिकारी अधिकतर अंग्रेजीदां हैं, उनका प्रशिक्षण विदेशी जमीन पर हुआ था और उन्हें विदेशी आकाओं की चाकरी करनी थी। इस कारण प्रभावी रूप से यह पूरी सेवा, भारतीय न होने, न ही नागरिकों के प्रति शिष्ट होने और न ही सेवा भावना से ओतप्रोत होने के लिए जानी जाती थी। फिर भी इसकी पहचान भारतीय सिविल सेवा के रूप में होती थी। अब यह बात बदलने जा रही है।'
भारतीय प्रशासनिक सेवा में भर्ती के लिए पहली प्रतियोगी परीक्षा जुलाई 1947 में आयोजित हुई। इससे पूर्व इंडियन सिविल सर्विस के लिए चयनित लेकिन वास्तव में उस सेवा में नियुक्त नहीं किए गए व्यक्तियों को भी भारतीय प्रशासनिक सेवा में सम्मिलित कर दिया गया।
यह सरदार पटेल की पहल का ही परिणाम था कि केन्द्रीय गृह मंत्रालय ने 1 अक्तूबर, 1947 को प्रशासनिक तंत्र का भारतीय नामकरण करते हुए अंग्रेजों की इंडियन सिविल सर्विस और इंडियन पुलिस को भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) और भारतीय पुलिस सेवा (आइपीएस) के रूप में नामित करने की सार्वजनिक घोषणा की।
दूरदर्शी पटेल को स्पष्ट था कि एक नव-स्वतंत्र राष्ट्र को एकता के सूत्र में बांधे रखने और किसी भी प्रकार के विखंडन को थामने के लिए एक शक्तिशाली अखिल भारतीय सिविल सेवा का होना महत्वपूर्ण है। उन्होंने इसी बात को तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू को 27 अप्रैल 1948 को भेजे पत्र में रेखांकित करते हुए लिखा, 'मेरे लिए इस बात पर जोर देना शायद ही जरूरी हो कि कार्यक्षम, अनुशासनबद्व तथा संतुष्ट अधिकारी, जिन्हें अपने परिश्रमपूर्ण और प्रामाणिक कार्य के फलस्वरूप उन्नति का आश्वासन प्राप्त है-लोकतांत्रिक शासन-पद्धति में स्थिर शासन के लिए निरंकुश शासन की अपेक्षा अधिक अनिवार्य है।'
Saturday, February 15, 2020
Address of Ghalib in his letters_गालिब के खतों में बल्लीमाराँ का पता
पूछते हैं वो के गालिब कौन है?
कोई बतलाओ के हम बतलाएं क्या?
आज हिंदुस्तान में एक आम समझ के हिसाब से उर्दू और गालिब एक ही सिक्के के दो है। पर हकीकत इससे बहुत जुदा है। मिर्जा असदुल्ला बेग गालिब अपने आपको फारसी का कवि मानते रहे। इन कवियों की परम्परा अमीर खुसरो से प्रारम्भ होती है। गालिब भी इसी परम्परा के थे। उल्लेखनीय है कि कई शतियों तक हमारे देश में हजारों परिवारों के लिए फारसी केवल शासन की भाषा ही नहीं थी। इन परिवारों ने उसे सांस्कृतिक भाषा के रूप में भी स्वीकार किया था। जो मुसलमान विदेशों से आए थे उनकी सबकी मातृभाषा फारसी नहीं थी। जो विदेशी मुस्लिम राजवंश दिल्ली की गद्दी पर बैठे उनमें से अधिकांश फारसी नहीं बोलते थे। फिर भी फारसी का प्रभाव दिन पर दिन बढ़ता गया।
इसी पृष्ठभूमि में गालिब के मित्रों ने यह सुझाव रखा था कि वे उर्दू में भी लिखें, जिससे साधारण जनता उनकी रचनाओं से लाभ उठा सकें। इस प्रकार के सुझाव के सम्बन्ध में आरम्भ में गालिब का विचार था-मैं उर्दू में अपना कमाल क्या जाहिर कर सकता हूँ। उसमें गुंजाइश इबारत आराई (अलंकरण की) कहां है? बहुत होगा तो ये होगा के मेरा उर्दू बनिस्बत औरों के उर्दू के फसीह होगा। खैर, बहरहाल कुछ करूंगा और उर्दू में अपना जोरे कलम दिखाऊंगा। ये विचार गालिब ने वर्ष 1858 में मुंशी शिवनारायण को लिखे गए पत्र में व्यक्त किए थे।
एक तरह से, गालिब के गद्य का स्वरूप उनके पत्रों में देखा जा सकता है। ये पत्र एक समय में एक व्यक्ति को नहीं लिखे गए। गालिब की ओर से जिन लोगों को पत्र लिखे गए हैं, उनमें से अधिकांश व्यक्ति साहित्यिक हैं, किन्तु उनकी रुचियों में समानता नहीं है, उनकी सामाजिक और आर्थिक स्थिति भी भिन्न है और उन लोगों के साथ गालिब का सम्बन्ध भी एक जैसा नहीं है। उनका जीवन दिल्ली के अन्तिम मुगल बादशाह और बड़े-बड़े सामन्तों के साथ व्यतीत हुआ था। उन्होंने जब उर्दू में लिखा शुरू किया तो एक नई शैली को जन्म दिया।
उन्नीसवीं शती के पांचवे दशक से गालिब हिन्दी में (गालिब अपनी मृत्यु से कुछ दिन पहले तक उर्दू के लिए हिन्दी शब्द का ही प्रयोग करते रहे) पत्र लिखने लगे। इससे पहले वे फारसी में ही पत्र लिखा करते थे। सम्भवतः उनका अन्तिम पत्र वर्ष 1868 का है। 1857 की पहली आजादी की लड़ाई के बाद उन्होंने फारसी लिखना बहुत कम कर दिया था।
गालिब के पत्र हिन्दी और उर्दू की मिली-जुली सम्पत्ति है। गालिब ने लिखा है कि मैंने वो अन्दाजे तहरीर (लिखने का ढंग) ईजाद किया है (निकाला है) के मुरासिले (पत्र) को मुकालिमा (बातचीत) बना दिया है। हजार कोस से बजबाने कलम (लेखनी की जिह्वा) से बातें किया करो। हिज्र (वियोग) में विसाल (मिलन) के मजे लिया करो।
दिल्ली में अपनी रिहायश के बारे में 12 मार्च 1852 को लिखे एक खत में गालिब लिखते हैं, मैं काले साहब के मकान से उठा आया हूँ। बल्लीमारों के महल्ले में एक हवेली किराए को लेकर उसमें रहता हूँ। वहां का मेरा रहना तखफीफे (किराए की कमी) किराए के वास्ते न था। सिर्फ काले साहब की मुहब्बत से रहता था वास्ते इत्तला के तुमको लिखा है, अगर चे मेरे खत पर हाजत मकान के निशान की नहीं है, दर देहली ब असदुल्लाह ब रसद (पहुंचे) काफी है, मगर अब लाल कुआं न लिखा करो, मुहल्ले बल्लीमाराँ लिखा करो।
एक दूसरे खत में वे लिखते हैं, हाँ साहब, ये तुमने और बाबू साहब ने क्या समझा है, के मेरे खत के सरनामे पर इमली के मुहल्ले का पता लिखते हो। मैं बल्लीमारों में रहता हूँ। इमली का मुहल्ला यहां से बेमुबालिगा (निसन्देह) आध कोस है। वो तो डाक के हरकारे मुझको जानते हैं, वर्ना खत हिरजा (व्यर्थ) फिरा करे। आगे काले साहब के मकान में रहता था, अब बल्लीमामाराँ हूँ किराए की हवेली में रहता हूँ। इमली का मुहल्ला कहां और मैं कहां? गौरतलब है कि एक जमाने में बल्लीमारान को बेहतरीन नाविकों के लिए जाना जाता था इसीलिए इसका नाम बल्लीमारान पड़ा यानी बल्ली मारने वाले।
इसी तरह, 5 दिसम्बर 1857 के खत में गालिब बताते हैं कि और मैं जिस शहर में हूँ, उसका नाम भी दिल्ली और उस मुहल्ले का नाम बल्लीमारों का मुहल्ला है, लेकिन एक दोस्त उस जनम के दोस्तों में से नहीं पाया जाता! वल्लाह! ढूँढने को मुसलमान इस शहर में नहीं मिलता! क्या अमीर क्या गरीब, क्या अहले (दस्तकार) हिर्फा। अगर कुछ हैं, तो बाहर के हैं। हुनूद (हिन्दू) अलबत्ता कुछ आबाद हो गए हैं। अब पूछो के तू क्यों कर मसकने (पुराना निवास स्थान) कदीम में बैठा रहा। साहबे बन्दा, मैं हकीम मुहम्मद हसन खां मरहूम (स्वर्गीय) के मकान में नौ दस बरस से किराए को रहता हूँ और यहां करीब क्या बल्के दीवार ब दीवार हैं घर हकीमों के, और वौ नौकर हैं राजा नरेन्द्रसिंघ बहादुर वाली (पटियाला नरेश) ए-पटियाला के। राजा ने साहबाने आलीशान से अहद (वचन) ले लिया था के बरवक़्त (दिल्ली के विध्वंस के बाद) गारते देहली ये लोग बच रहें। राजा के सिपाही आ बैठे और ये कूचा महफूज रहा, वरना मैं कहाँ और ये शहर कहाँ?
Saturday, February 8, 2020
Political party symbols in Delhi Assembly Elections_दिल्ली के चुनावी दंगल के दलीय चिन्हों का लेखाजोखा
Sunday, January 5, 2020
Delhi and Political Life of Gandhi_ गांधी के राजनीतिक जीवन में दिल्ली
मोहनदास करमचंद गांधी दिल्ली में पहली बार वर्ष 1915 में आए थे। वे अपने पहले दिल्ली प्रवास के दौरान सेंट स्टीफंस कॉलेज के पहले भारतीय प्रिंसिपल सुशील कुमार रूद्र के कश्मीरी गेट स्थित आवास में ठहरे थे। इस प्रवास के दौरान गांधी ने 13 अप्रैल को कॉलेज के छात्रों को संबोधित किया था। गांधी ने कहा कि प्रिंसिपल से पहले ही यह बात सुनिश्चित करके कि कॉलेज का यूरोपीय स्टॉफ यहां के लोगों की भाषा समझता है, हिंदी में बोलने का निर्णय लिया है। उन्हें यह बात जानकर ख़ुशी हुई कि यूरोपीय स्टॉफ यहां की भाषा का जानकार है। उन्होंने छात्रों को कहा कि मैं आपको यह बात समझाना चाहूंगा कि आप अपने शिक्षकों का अनुसरण करें और अपने कॉलेज के "ध्येय वाक्य, सत्य के प्रति समर्पित" को ईमानदारी के साथ अपने जीवन में उतारें। इस तरह से आप अपनी मातृभूमि की सेवा के लिए पूरी तरह सुयोग्य साबित होंगे। उन्होंने कहा कि काफी बरस पहले वह अपने गुरू गोखले (गोपाल कृष्ण गोखले) से मिले थे तब उन्होंने यह बात महसूस की थी कि उन्हें राजनीति के क्षेत्र में अपना गुरू मिल गया है और तब से उन्होंने पूरी विनीत भाव और ईमानदारी से उनका अनुसरण करने की कोशिश की है।
फिर गाँधी, दिल्ली में 23 नवंबर, 1919 को आयोजित प्रथम अखिल भारतीय खिलाफत आंदोलन में उपस्थित हुए। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि हिन्दू-मुसलमानों के पारस्परिक सहयोग से केवल खिलाफत ही पैदा न की जाए, अपितु अन्य शिकायतों को भी दूर किया जाये। उन्होंने सम्मेलन में पहली बार असहयोग आंदोलन की अपनी योजना और क्रिया विधि प्रस्तावित की। अंग्रेजी वस्तुओं का बहिष्कार करने, अंग्रेज सरकार से असहयोग करने और विदेशी लोगों को भारतीय लोगों की शिकायतों के प्रति प्रबुद्ध करने के लिए इंग्लैंड (और यदि आवश्यक हो तो अमेरिका) में प्रतिनिधि भेजने के प्रस्ताव पारित किए गए। यह उल्लेख दिलचस्प है कि पहले सत्याग्रह की योजना सुशील रूद्र के दिल्ली स्थित घर में गांधी के ठहराव के दौरान बनाई गयी।
गाँधी के नेतृत्व में दिल्ली खिलाफत आंदोलन का महत्वपूर्ण केन्द्र बन गयी। दिल्ली में असहयोग आंदोलन में शामिल होने के कारण हकीम अजमल खां को छोड़कर कांग्रेस के सभी प्रमुख नेता डाक्टर अंसारी, शंकर लाल, आसफ अली, देशबन्धु गुप्ता को जेल में डाल दिया गया। दिल्ली में 11 और 15 जुलाई के बीच हिन्दू और मुसलमानों में भयंकर संघर्ष हुआ, जिसके फलस्वरूप बहुत से व्यक्ति घायल हुए। सांप्रदायिक उन्माद के प्रति दुखी होकर गांधी ने 21 दिन का उपवास (18 सिंतबर) "आत्मशुद्धि" ( उन्होंने इसे यही संज्ञा दी) के उद्देश्य से किया। अंग्रेज़ पादरी और स्टीफंस कॉलेज में शिक्षक सी. एफ. एन्ड्रयूज ने "यंग इंडिया" के अपने संपादकीय में उल्लेख किया है, दिल्ली में रिज के नीचे, शहर से काफी दूर दिलखुश भवन में गांधी अपना उपवास रख रहे थे। वही, दोनों समुदायों के बीच सदभाव लाने के लिए गांधी की अध्यक्षता में अखिल भारतीय पंचायत की स्थापना की गई।
वर्ष 1930 में गांधी के नेतृत्व में देश में असहयोग आंदोलन आरंभ हुआ। इस आंदोलन की शुरूआत औपचारिक रूप से गांधी ने 12 मार्च 1930 को डांडी की ओर कूच करके नमक का कानून तोड़ने की दृष्टि से की। 5 मई 1930 को गांधी के बंदी बनाए जाने की खबर के बाद दिल्ली में हड़ताल होने के साथ सभी दुकानें बंद हो गईं। कश्मीरी गेट स्थित जिला मजिस्ट्रेट के दफ्तर तक एक जुलूस निकाला गया जहां लाल रंग के कपड़े पहने हुए महिला स्वयंसेविकाओं ने दीवानी और फौजदारी अदालत, खजाने तथा पुलिस कार्यालयों का घेराव किया। देवदास गांधी, लाला शंकर लाल, देशबंधु गुप्त तथा चमन लाल सहित बहुत से लोगों ने गिरफ्तारियां दी। वर्ष 1931 में सविनय अवज्ञा आंदोलन पूरे जोरों पर था।
यह निर्णायक समय था जब इस आंदोलन को राष्ट्रवादी बढ़ावा मिल रहा था। उसी समय अचानक दिल्ली शांतिवार्ता का केन्द्र बन गई थी। अंग्रेज वाइसराय लार्ड इर्विन तथा गांधी के बीच लंबी बातचीत चली तथा सरकार व कांग्रेस के बीच 5 मार्च 1931 को 15 दिन की लगातार बातचीत के बाद "गांधी-इर्विन पैक्ट" नामक एक समझौता हुआ। इसके कुछ दिनों बाद जब 23 मार्च को लाहौर में भगत सिंह सहित उनके दो साथियों को फांसी लगाई गई तो न केवल दिल्ली, बल्कि सारा देश शोक में डूब गया। दिल्ली में पूर्ण रूप से हड़ताल रही। 18 अप्रैल को लार्ड इर्विन के दिल्ली से रवाना होते ही गांधी-इर्विन पैक्ट का उल्लंघन होना शुरू हो गया। लार्ड इर्विन ने जिन बातों से सहमति प्रकट की थी उनको उसके बाद आने वाले नए वाइसराय लार्ड विलिंगडन ने अस्वीकार कर दिया। इतना ही नहीं, गांधी और सरदार पटेल को 4 जनवरी 1932 को गिरफ्तार कर लिया गया।
दूसरे महायुद्ध के शुरू होने पर 15 सितंबर, 1939 को दिल्ली में कांग्रेस की कार्यकारिणी समिति की बैठक हुई। गांधी की सलाह पर कार्यकारिणी समिति ने अंग्रेजी सरकार से भारत को स्वतंत्र घोषित करने की प्रार्थना की। यूरोप में फ्रांस के पतन बाद जब 3 जुलाई 1940 को दिल्ली में दोबारा कार्यकारिणी समिति की बैठक हुई तब भी यह मांग रखी गई। भारत में अंग्रेजी शासन के विरुद्ध गांधी के नेतृत्व में सांकेतिक विरोध के रूप में वैयक्तिक सत्याग्रह आरंभ किया गया।
आंदोलन में एक स्थिति ऐसी भी आई थी जब गांधी ने अपेक्षा की, कि जो सत्याग्रही गिरफ्तार नहीं किए गए थे उन्हें युद्ध विरोधी प्रचार करते हुए दिल्ली की ओर पैदल प्रस्थान करना चाहिए। भारत में स्थिति खराब होते देख ब्रिटिश कैबिनेट के प्रस्तावों के साथ 23 मार्च 1942 को स्टेफोर्ड क्रिप्स दिल्ली आए। 27 मार्च को गांधी की उनसे बातचीत हुई और समझौते की उम्मीद के साथ वे 4 अप्रैल को दिल्ली से वापिस लौट गए। मौलाना आजाद की अध्यक्षता में दिल्ली में कार्यकारिणी समिति की एक बैठक हुई, जिसमें अंग्रेजों के प्रस्तावों को अस्वीकार कर दिया गया।
भारत का वाइसराय बनने के बाद लार्ड माउन्टबेटन (24 मार्च 1947) ने गांधी सहित सभी प्रमुख राजनीतिक नेताओं, जिसमें मुहम्मद अली जिन्ना भी शामिल थे, की कठिन भारतीय समस्या का हल खोजने के लिए दिल्ली बुलाया। 3 जून की योजना अनिच्छा से स्वीकार कर ली गई। माउन्टबेटन ने एक प्रसारण में कहा कि जोर जबरदस्ती का विकल्प केवल बंटवारा है। स्वतंत्रता और विभाजन दोनों की घोषणा 15 अगस्त 1947 को एक साथ हुई।
भारत-विभाजन के कारण हुए विस्थापन और दंगों की भीषणता से दिल्ली भी अछूती नहीं रही। ऐसे में गांधी 9 सितंबर 1947 को दिल्ली आए। गांधी ने कश्मीर में पाकिस्तान के हमले के बावजूद भारत सरकार को पाकिस्तान की बकाया राशि का भुगतान करने के लिए कहा। अन्ततः उन्होंने आमरण अनशन तब तक जारी रखने का निर्णय लिया जब तक दिल्ली में सांप्रदायिक तनाव समाप्त नहीं हो जाता। 13 जनवरी, 1948 को उन्होंने सामुदायिक सौहार्द की पुनः स्थापना के लिए अनशन, उनका 15 वां, प्रारम्भ किया। 18 जनवरी को डाक्टर राजेन्द्र प्रसाद के नेतृत्व में सौ नेता बिरला भवन गए, जहां गांधी ठहरे हुए थे तथा उन्हें राजधानी में सांप्रदायिक शांति स्थापित करने का वचन दिया। दो सप्ताह से भी कम समय में राजधानी में सामान्य अवस्था की दोबारा स्थापना हो गई। अतः अनशन समाप्त हो गया। परंतु केवल 12 दिन के पश्चात् ही गांधी की हत्या हो गई।
लेखक प्यारेलाल ने अपनी पुस्तक "महात्मा गांधी-अंतिम चरण" में गांधी की शव यात्रा के बारे में लिखते हैं कि राजा जार्ज पंचम की प्रतिमा के आधार तक जनता आस पड़ोस के तालाबों को बड़ी मेहनत से पार करके पहुंची थी। जैसे ही जुलूस गुजरने लगा वे जुलूस का दृश्य भली प्रकार से देखने के लिए, पत्थर की छतरी को सहारा देने वाले खम्भों पर लटक गए, 150 फुट ऊंचे युद्व स्मारक की चोटी पर बैठे हुए दिखाई दिए, बत्ती के अथवा टेलीफोन के खम्भों पर तथा रास्ते के दोनों ओर लगे हुए वृक्षों की शाखाओं पर बैठ गए। दूर से समस्त केंद्रीय मार्ग (सेंट्रल विस्टा) मानवता का लगभग निश्चल सा विशाल जनसमुद्र दिखाई पड़ता था।
गांधी के पीछे थे, राजधानी के नागरिक
दिल्ली में स्वतंत्रता संग्राम के चरित्र की विशेषता यह रही कि राजधानी की शहरी और ग्रामीण आबादी दोनों ने कंधे से कंधा मिलाकर आजादी की लड़ाई में भाग लिया। महरौली और नरेला में स्थित खादी आश्रमों, बवाना की चौपाल और बदरपुर में गांधी खैराती अस्पताल कुछ ऐसे केंद्र थे, जिन्होंने स्वतंत्रता संग्राम के संदेश को फैलाने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। दिल्ली में आजादी की लड़ाई में हिंदू-मुस्लिम एकजुटता एक और खास बात थी। भारतीय मुसलमानों के खिलाफत आंदोलन को गांधी के आह्वान कारण हिंदुओं का पूरा समर्थन मिला।
यह गांधी के नेतृत्व का ही करिश्मा था कि अंग्रेजों के खिलाफ आंदोलन में दिल्ली की महिलाओं की हिस्सेदारी उल्लेखनीय थी। सत्यवती, पार्वती देवी डिडवानिया, अरुणा आसफ अली, वेद कुमारी, बृज रानी, मेमो बाई दिल्ली की कुछ ऐसी प्रमुख महिलाएं थीं, जिन्होंने आगे बढ़कर आंदोलन में भाग लिया। इन महिलाओं ने व्यापक रूप से विदेशी वस्तुओं की बिक्री के खिलाफ आंदोलन में दुकानों की पिकेटिंग में भाग लिया।
इस दौरान शिक्षक और छात्रों भी स्वतंत्रता संघर्ष में गांधी के प्रभाव से अछूते नहीं थे। सेंट स्टीफन कॉलेज के प्रिंसिपल सुशील रुद्र सहित हिंदू कॉलेज के शिक्षक आजादी की लड़ाई में हरावल दस्ता थे। सेंट स्टीफन, रामजस, हिंदू, इंद्रप्रस्थ गर्ल्स कॉलेज के छात्र-छात्राओं ने आंदोलन में पूरी सक्रियता से भाग लिया।
गांधी ने दिल्ली में स्वतंत्रता आंदोलन को बहुत महत्व दिया और वास्तव में वे व्यक्तिगत रूप से यहां उपस्थित होकर उसे गति देने के इच्छुक थे। यही कारण है कि उन्होंने स्थानीय नेताओं जैसे हकीम अजमल खान, बहिन सत्यवती, देश बंधु गुप्ता, आसफ अली और डॉ मुख्तार अहमद अंसारी को काफी प्रोत्साहित किया। इस अवधि में वे अधिकतर रूद्र (सेंट स्टीफन कॉलेज), मोहम्मद अली, डॉ अंसारी के निवास और बिरला हाउस में रहे और लगातार वायसराय हाउस आते-जाते रहें।
बॉक्स
तिथि एवं वर्ष |
दिल्ली में गांधी के कार्यक्रम का विवरण
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13-04-1915
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गांधी दिल्ली में पहली बार वर्ष 1915 में आए। इस प्रवास के दौरान गांधी ने 13 अप्रैल को कश्मीरी गेट स्थित सेंट स्टीफंस कॉलेज में छात्रों को संबोधित किया था।
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01-11-1918
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पटौदी हाउस में दिल्ली के नागरिकों की सार्वजनिक बैठक में भाग लिया।
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23-11-1919
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गांधी ने पहले अखिल भारतीय खिलाफत सम्मेलन में भाग लिया और खिलाफत सहित दूसरी शिकायतों के निवारण के लिए एक संयुक्त हिंदू-मुस्लिम आंदोलन की वकालत की।
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30-11-1919
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गांधी ने प्रिंसेस पार्क में रोलेट एक्ट के खिलाफ आयोजित बैठक को संबोधित किया।
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15-9-1924
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गांधी ने हिंदुस्तान टाइम्स समाचार पत्र का उद्घाटन किया।
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17-9-1924 से
8-10-1924 |
गांधी ने मौलाना मोहम्मद अली के निवास पर दिल्ली में आत्म शुद्धि के उपाय के रूप में 21 दिन का उपवास रखा।
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1-3-1925
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गांधी ने रायसीना हॉस्टल में हिंदू-मुस्लिम एकता पर सर्वदलीय सम्मेलन समिति की उप-समिति की बैठक की अध्यक्षता की।
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19-2-1929
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गांधी ने विठ्ठलभाई पटेल की पार्टी में वायसराय सहित भाग लिया।
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1-11-1929
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गांधी ने दिल्ली पहुंचकर संयुक्त वक्तव्य के मसौदे तैयार करने के लिए विट्ठलभाई पटेल के घर पर नेताओं की बैठक में शामिल हुए। गांधी ने इस बात को रेखांकित किया कि शर्तों को पूरा किए बिना अंग्रेज वायसराय का प्रस्ताव अस्वीकार्य है।
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2-11-1929
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गांधी ने टाउन हॉल में भाषण दिया। कांग्रेस समिति, मजदूर सभा ने उन्हें अपने विचारों से अवगत करवाया और नागरिकों ने उन्हें धनराशि भेंट की।
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17-2-1931
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गांधी रेल से गाजियाबाद पहुंचे। वे शाहदरा में सुबह की सैर के बाद डॉ अंसारी के घर पहुंचे। वहां पार्क में एकत्र लोगों से बातचीत की। अंग्रेज वायसराय से मिलने से पहले वी. एस शास्त्री, तेजबहादुर सप्रू और एम. आर. जयकर से भेंट की।
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25-2-1931
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गांधी ने हिंदू कालेज में छात्रों और शिक्षकों को संबोधित किया।
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26-2-1931
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गांधी ने शीशगंज गुरुद्वारा में संगत को भाषण दिया।
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5-3-1931
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वायसराय हाउस में लॉर्ड इरविन और गांधी ने अस्थायी समझौते पर हस्ताक्षर किए जिसकी आधिकारिक घोषणा शाम 5 बजे की गई।
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10-12-1933
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गांधी ने हरिजन क्वार्टरों, खादी भंडार और जामिया मिलिया इस्लामिया का दौरा किया।
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13-12-1933
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गांधी सुबह अलीपुर गए और जनसभा को संबोधित किया।
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2-1-1935
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गांधी ने हरिजन सेवक संघ के नए संविधान के बारे में चर्चा की। दिल्ली में हरिजन कॉलोनी का शिलान्यास किया। नरेला में हरिजन सम्मेलन का उद्घाटन किया।
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12-1-1935
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दिल्ली में मवेशी प्रजनन फार्म का दौरा किया।
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15-1-1935
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दिल्ली में माॅडर्न हाई स्कूल का दौरा किया।
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19-1-1935
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जामिया मिल्लिया में एक भाषण कार्यक्रम की अध्यक्षता की और सांसियों की बस्ती में सांसी समाज के लोगों से बातचीत की।
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23-1-1935
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गांधी ने अपनी पत्नी कस्तूरबा गांधी, डॉ जाकिर हुसैन, कृष्णन नायर के साथ दिल्ली के गांवों का तीन दिवसीय दौरा शुरू किया। इस दौरे में नरेला और बाकनेर भी गए।
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24-1-1935
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गाँधी ने थुड, सुलतानपुर और बवाना नामक गांवों का दौरा किया।
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25-1-1935
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गाँधी ने हुमांयूपुर, मुनिरका और रामताल का दौरा किया।
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27-1-1935
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गाँधी ने दिल्ली में विधायकों को संबोधित किया।
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15-03-1939
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गाँधी ने दिल्ली जेल में कैदियों को भूख हड़ताल समाप्त करने का अनुरोध किया।
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18-03-1939
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गाँधी ने लक्ष्मी नारायण मंदिर के शुभारंभ के अवसर पर भाषण दिया।
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27-07-1939
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गाँधी ने हरिजन काॅलोनी में हरिजन औद्योगिक गृह के पहले दीक्षांत समारोह के कार्यक्रम की अध्यक्षता की और छात्रों को प्रमाणपत्र वितरित किए।
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01-11-1939
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गाँधी ने जिन्ना के आवास में उनसे बातचीत की।
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02-11-1939
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गाँधी ने हरिजन निवास में प्रार्थना कक्ष के उद्घाटन समारोह में भाषण दिया।
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सितंबर, 1947
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गाँधी ने सांप्रदायिक दंगों को रोकने के लिए दिल्ली और उसके आसपास के इलाकों का दौरा किया। पाकिस्तान से आए हिंदू और सिख विस्थापितों के शरणार्थी शिविरों का भी प्रवास।
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13-1-1948
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गाँधी ने दिल्ली में सांप्रदायिक एकता के लिए बिरला हाउस, तीस जनवरी मार्ग पर पांच दिन का उपवास रखा।
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27-01-1948
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गांधी ने महरौली स्थित ख्वाजा कुतुबउद्दीन बख्तियार की दरगाह का प्रवास किया और उपस्थित जनसमुदाय को संबोधित किया।
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30-01-1948
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नाथूराम गोड़से ने 78 वर्षीय गांधी की बिरला हाउस में हत्या कर दी।
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Saturday, December 14, 2019
Delhi burnt under Ahmed shah Abdali Durrani Attacks_अब्दाली के कत्लेआम का शिकार हुई थी दिल्ली
हिंदुस्तान की पश्चिमी सरहदों की तरफ से विदेशी अफगान आक्रांता अहमदशाह अब्दाली के हमले शुरू हुए, जिसका सिलसिला सन् 1748 से शुरू होकर लगभग बीस साल तक जारी रहा। इन लगातार हमलों से और हिन्दुस्तान के अन्दर परस्पर गृहयुद्धों से दिल्ली ऐसी तबाह और बरबाद हुई कि फिर डेेढ़-दो सौ बरस तक आबाद न हो सकी। यह बात कम जानी है कि अब्दाली ने कुल आठ बार हिंदुस्तान पर आक्रमण किया। पहला हमला वर्ष 1748 के आरंभ में किया। उसके बाद तो मानो हमलों की झड़ी लग गई।
प्रसिद्ध साहित्यकार हजारी प्रसाद द्विवेदी अपने निबंध "स्वतन्त्रता संघर्ष इतिहास" में लिखते हैं कि तब देश विभिन्न राज्यों में बंट गया था और उनमें काफी प्रतिद्धंदिता और टकराव था। इस टकराव ने किसी हद तक साम्प्रदायिकता का रूप धारण जरूर किया, जब मराठाओं ने हिन्दू पादशाही का नारा लगाया और शाह वलीउल्लाह ने मराठा काफिरों को दिल्ली से मार भगाने के लिए अफगानिस्तान के अब्दाली को आमन्त्रित किया। अब्दाली के सैनिकों ने जब दिल्ली लूटनी शुरू की तब उन्होंने हिन्दू और मुसलमान दोनों को बुरी तरह सताया, दोनों पर अत्याचार किये, यहां तक कि शाह वलीउल्लाह को भी घर छोड़कर दूसरी जगह जाना पड़ा। यहां तक कि अब्दाली के अत्याचारों से परेशान होकर दिल्ली छोड़ने वाले लोगों में मियां नजीर भी थे। उस समय उनकी आयु 22-23 वर्ष थी।
सन् 1756-57 में मराठा सेनापति रघुनाथ राव की अनुपस्थिति में अब्दाली ने न केवल दिल्ली को लूटा बल्कि अपनी लूटपाट का दायरा मथुरा, गोकुल और वृंदावन तक फैला दिया। मुगल बादशाह आलमगीर के शासनकाल के दूसरे वर्ष में अब्दाली ने दूसरी बार सिन्धु नदी को पार किया। मुग़ल वजीर गाजीउद्दीन ने नरेला में अब्दाली के सन्मुख अपना आत्म-समर्पण कर दिया।
दिल्ली आने पर उसको डटकर लूटा गया, उसे एक करोड़ रुपया देना पड़ा और अपना वजीर पद छोड़ना पड़ा। अब्दाली दिल्ली के तख्त (29 जनवरी 1757) पर बैठ गया तथा उसने अपने नाम के सिक्के चलवाए। मराठों की गैर-हाजिरी में इमाद-उल-मुल्क को अब्दाली से समझौता करना पड़ा, जो नजीबुद्दौला को मीर बक्शी और व्यवहारतः दिल्ली दरबार में अपना प्रतिनिधि बना कर लौटा गया। अब्दाली को जिस एक मात्र प्रतिरोध का सामना करना पड़ा वह था जाट राजा का प्रतिरोध, जो डीग और भरतपुर के अपने शक्तिशाली किलों में दृढ़ता से डटा रहा।
कितने ही हंगामें दिल्ली में उर्दू के मशहूर शायर मीर तकी मीर की आंखों के सामने हुए और कितनी ही बार मौज-ए-खून उनके सर से गुजर गयी। अब्दाली के पहले आक्रमण के समय वर्ष 1748 मीर रिआयत खां के साथ लाहौर में मौजूद थे और पानीपत की तीसरी लड़ाई वर्ष 1761 के भी दर्शक थे। दिल्ली में इस विदेशी विजेता और देश के अन्तर गृहयुद्ध करनेवालों ने लूटमार मचाई। इसमें मीर का घर भी बरबाद हुआ। इस युग के माली नुकसानों और नैतिक पतन की भयानक तस्वीरें, मीर की शायरी और आपबीती "जिक्र-ए-मीर" में सुरक्षित हैं।
"जिक्र-ए-मीर" में अब्दाली की फौजों के हाथों दिल्ली की यह तस्वीर है-बंदा अपनी इज्जत थामे शहर में बैठा रहा। शाम के बाद मुनादी हुई कि बादशाह ने अमान दे दी है। रिआया को चाहिए कि परेशान न हो मगर जब घड़ी भर रात गुजरी तो गारतगरों ने जुल्म-ओ-सितम ढाना शुरु किए। शहर को आग लगा दी। सुबह को, जो कयामत की सुबह थी, तमाम शाही फौज और रोहिल्ले टूट पड़े और कत्ल व गारत में लग गए। मैं कि फकीर था अब और ज्यादा दरिद्र हो गया, सड़क के किनारे जो मकान रखता था वह भी ढहकर बराबर हो गया।
पानीपत में विजय प्राप्त करने के उपरान्त अब्दाली ने विजयोल्लास के साथ दिल्ली में प्रवेश किया तथा उसने सूरजमल के विरुद्व अभियान करने के सम्बन्ध में विचार किया क्योंकि उसने मराठाओं को शरण दी थी। दिल्ली से शाह के प्रस्थान के पांच दिन पूर्व समाचार प्राप्त हुआ कि सूरजमल ने अकबराबाद (आगरा) के किलेदार को किला खाली करने पर विवश कर दिया है, और किले में प्रवेश पा चुका है। अब्दाली की संतुष्टि के लिए उसने (सूरजमल) उसे एक लाख रुपया दिया तथा पांच लाख रुपया बाद में देने का वादा किया, जो कभी नहीं दिए गए। वर्षा ऋतु आ पहुंची थी तथा पृष्ठभाग में सिखों ने अपना सिर उठाना आरम्भ कर दिया, अब्दाली हठी जाट से इतना भर पाकर प्रसन्न था। 21 मई 1761 को वह शालीमार बाग (दिल्ली के बाहर) से अपने देश के लिए रवाना हुआ।
Saturday, November 16, 2019
Delhi Visit of Swiss Traveler Antoine Louis Henry Polier_स्विस यात्री पोलियर की दिल्ली
Saturday, August 24, 2019
First Public works in Delhi by Britishers_दिल्ली में पहले अंग्रेजी सार्वजनिक निर्माण कार्य का इतिहास
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24082019, दैनिक जागरण |
अंग्रेजों की दिल्ली में दो कालखंड ऐसे थे जब यहां सर्वाधिक सार्वजनिक निर्माण कार्य हुए। इनमें पहला दौर 1860-80 तक और फिर दूसरा 1912 के बाद कलकत्ता से दिल्ली में अस्थायी तथा शाही राजधानी के बनने-बसने का दौर था। पहले दौर में, अंग्रेजी सैन्य आवश्यकताओं के साथ व्यावसायिक और नागरिक प्रशासन की जरूरतों को पूरा करने के हिसाब से सार्वजनिक निर्माण कार्य हुए।
दिल्ली में रेलवे पटरी शहर के बाहर से बिछाने की बजाय भीतर से बिछाई गई। ऐसा करने में अंग्रेजों के मन में 1857 में भारतीयों के आजादी की पहली लड़ाई की बात ध्यान में थी। अंग्रेजों के दिमाग में दोबारा ऐसी परिस्थिति के पैदा होने पर अपनी सुरक्षा की बात सर्वोपरि थी। सलीमगढ़ और लाल किला में अंग्रेज सेना की उपस्थिति के बाद सैनिक दृष्टि से रेल पटरी के शहर को इन दो किलों में बांटने की बात अधिक लाभदायक थी। जबकि अंग्रेज़ों ने रेल को लेकर तैयार मूल योजना में रेलवे के यमुना नदी के पूर्वी किनारे पर बसे गाजियाबाद तक ही आने की बात सोची थी।
1860 में फोर्ट विलियम (कलकत्ता स्थित किला, जहां से पूरे भारत में अंग्रेजी राज चलता था) ने दिल्ली की हिंदू आबादी को नई सड़कों के बनने से होने वाली परेशानी से अपनी हमदर्दी जताई। इसका कारण यह था कि ये सड़कें शहर की सबसे अधिक आबादी वाले हिस्सों में बनाई गई थी। वह बात अलग है कि हिंदुओं के कष्ट को दूर करने के लिए कोई उपाय नहीं किया गया। भारत में अंग्रेज सरकार और प्रांतीय सरकार के विभागों के रेलवे लाइन के साथ में 100 फीट चौड़ी क्वींस रोड और हैमिल्टन रोड के बनने से सैकडों लोग विस्थापित हुए।
दिल्ली में रेलवे स्टेशन (आज का पुराना दिल्ली स्टेशन) के बनने के बाद टाउन हाल बना। यह विक्टोरिया दौर की अंग्रेज़ों के नागरिक निर्माण की सोच का स्वाभाविक परिणाम था। टाउन हाल का कुल क्षेत्रफल तत्कालीन नगर पालिका के कार्यालय से दोगुना था। उस इमारत में बाद में, चैम्बर ऑफ़ कामर्स, एक लिटरेरी सोसाइटी और एक संग्रहालय का भी प्रावधान किया गया। अंग्रेज़ों की इन सारी कोशिशों के मूल में स्थानीय व्यक्तियों की सोच को विकसित करना था, जिससे देसी नागरिकों और यूरोपीयों लोगों के बीच आदान प्रदान को बढ़ावा मिल सकें। तत्कालीन अंग्रेज कमीश्नर कूपर टाउन हाल के भीतर कोतवाली बनवाना चाहता था, जिससे पंजाब के न्यायिक आयुक्त ने अस्वीकृत कर दिया। दिल्ली की जनता ने अस्वीकृति के इस निर्णय का तहेदिल से स्वागत किया।
टाउन हाल की योजना आजादी की पहली लड़ाई से पहले बनी और 1860-5 की अवधि में इसका निर्माण हुआ। इसे पहले लारेंस इंस्टिट्यूट का नाम दिया गया और इसके निर्माण में प्रांतीय सरकार के अलावा अंग्रेजों के वफादार हिंदू-मुस्लिम व्यक्तियों से दान में मिले पैसों का उपयोग हुआ। जब यह इमारत बन कर तैयार हो गई तो अंग्रेजों के वफादार इसे नगरपालिका के इस्तेमाल के लिए लेना चाहते थे।
इन वफादारों ने अपनी मांग को बतौर "दिल्ली के लोग" के रूपक के हिसाब से पेश किया। वर्ष 1866 में नगरपालिका ने विशेष प्रयास करते हुए 135457 रूपए में यह इमारत खरीद ली। एक लाइब्रेरी और एक यूरोपीय क्लब की अलग से व्यवस्था रखी गई।
तत्कालीन अखबार "मुफसिल" ने इस घटना के बारे में लिखा, भारतीयों और यूरोपीय नागरिकों में यह भावना है कि सरकार को कुल दो लाख रूपए की लागत में से शिक्षा विभाग के दस हजार रूपए लौटाकर इस इमारत से उनका बोरिया बिस्तर बांध देना चाहिए। भारतीय नागरिकों की भावना न केवल इमारत से जुड़ी है बल्कि वे यहां पर लगाने के हिसाब से दिल्ली के इतिहास में हुए नामचीन व्यक्तियों के आदमकद चित्रों को भी जुटा रहे हैं।
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