Showing posts with label सरदार पटेल. Show all posts
Showing posts with label सरदार पटेल. Show all posts

Sunday, November 1, 2020

Real Maker of Modern India_Sardar Patel_आधुनिक भारत की एकता-अखण्डता के वास्तविक निर्माता


 


यह बात कम जानी है कि अगस्त 1947 में भारत की स्वतंत्रता से पूर्व ही सरदार वल्लभभाई पटेल ने देश को एकरूप देने में रियासतों-रजवाड़ों के राजा-महाराजाओं का अथाह सहयोग प्राप्त किया। यही कारण है कि भारतीय राज्य-व्यवस्था में उनका सबसे महत्वपूर्ण योगदान देशी राज्यों का अहिंसक ढंग से किया एकीकरण ही है। 


दो वर्ष से कुछ ही अधिक समय में पांच सौ अलग-अलग अटपटे देशीराज्यों के स्थान पर भारत में एक राजनीतिक प्रासाद खड़ा करने में सरदार ने जो भव्य सिद्वि प्राप्त की, उसके चिरस्थायी स्वरूप ने देश की एकता-अखण्डता के निर्माता की उदात्त उपाधि उन्हें दिलाई। 

यहां तक कि राजपूताने की रियासतों को आधुनिक राजस्थान के रूप में गठित करने में भी सरदार पटेल की निर्णायक भूमिका थी। आधुनिक राजस्थान-संघ की रचना कई चरणों में हुई। सबसे पहले वर्ष 1948 में मत्स्य-संघ बना, जिसमें अलवर, भरतपुर, धौलपुर और करौली के चार राज्य शामिल हुए। फिर उदयपुर, कोटा, बूंदी, डूंगरपुर, झालावाड़, प्रतापगढ़, बांसवाड़ा, किशनगढ़, शाहपुरा और टोंक की रियासतों का संघ बना। वर्ष 1949 में बीकानेर, जयपुर, जोधपुर और जैसलमेर के शासकों ने संघ में सम्मिलित होने का निर्णय किया। 

30 मार्च, 1949 को पटेल ने जयपुर में औचारिक रूप से संयुक्त राजस्थान का उद्घाटन किया। इस अवसर उन्होंने कहा कि जयपुर महाराजा साहब (सवाई मानसिंह द्वितीय) को जो राजप्रमुख का मान दिया गया है, उसके लिए मैं उनको मुबारकबाद देना चाहता हूं। आज तक तो यह जयपुर के सेवक थे। क्योंकि असल में हमारे हिन्दुस्तान की संस्कृति के अनुसार राजा राज्य का प्रधान तो जरूर है, लेकिन उससे भी ज्यादा वह प्रजा का सेवक हैं। तो आज तक यह जयपुर की प्रजा के सेवक थे, आज से यह सम्पूर्ण राजस्थान की प्रजा के सेवक बनते हैं। हमारे महा-राजप्रमुख (महाराणा उदयपुर) आज हाजिर नहीं हैं क्योंकि उनकी (महाराणा भूपाल सिंह) शारीरिक दशा हम जानते हैं। पर उनको हम कभी भूल नहीं सकते। राजपूताना का एकीकरण करने के लिए जितना कार्य और जितनी कोशिश राणा प्रताप ने की, उतनी और किसी ने नहीं की। उनका संकल्प परिपूर्ण करने का सौभाग्य आज हम लोगोें को प्राप्त हुआ है, इसलिए आज हमारे अभिमान का दिवस है। 

पटेल ने सुनहरे इतिहास को रेखांकित करते हुए कहा कि आप के राजपूताना का एक-एक पत्थर वीरता के इतिहास से भरा हुआ है, बलिदान के सुनहले कारनामों से भरा हुआ है। आप के राजपूताना की पुरानी कीर्ति आज भी हमारे दिल को अभिमान, हर्ष और उत्साह से भर देती है। आज से उसी राजस्थान को नई दुनिया के योग्य नया इतिहास बनाने का अवसर प्राप्त होता है, यह कितने सौभाग्य की बात है।


Sunday, September 20, 2020

Contribution of funds to rebuild Somnath Temple_Sardar Patel_सोमनाथ मंदिर के पुर्ननिर्माण के लिए धन देने की अपील_सरदार वल्लभभाई पटेल


 



मैं आपको आश्वस्त करता हूं कि यह कार्य धन के अभाव में प्रभावित नहीं होगा लेकिन सौराष्ट्र की जनता को उनकी क्षमता के अनुरूप अपना अंशदान देना चाहिए। 


-सरदार पटेल की गुजरात में सोमनाथ मंदिर के पुर्ननिर्माण के लिए धन देने की अपील 

(स्त्रोतः 25 जनवरी 1949, हिंदुस्तान टाइम्स, पेज 28, कलेक्टेड वर्क्स ऑफ सरदार वल्लभभाई पटेल, मुख्य संपादकः पी एन चोपड़ा)

Let me assure you did the work would not suffer for want of money but the people of Saurashtra must contribute your mite.

-Sardar Patel Sardar Patel‘s appeal for funds to rebuild Somnath temple 25 January 1949, Hindustan Times
(Source: Collected Work of Sardar Vallabhbhai Patel, Chief Editor: PN Chopra, page 28)


Saturday, August 4, 2018

Delhi at the time of partition 1947_बंटवारे के दौर की दिल्ली_1947

04082018, दैनिक जागरण 







स्वतंत्रता और विभाजन दोनों की घोषणा 15 अगस्त 1947 को एक साथ हुई। बंटवारे पर असीम कटुता तथा दुख का अनुभव किया गया। जैसे-जैसे पाकिस्तान से धकेले हुए आतंकित हिंदू-सिख दिल्ली में आने लगे वैसे-वैसे राजधानी में उदासी और डर का वातावरण बैठता गया।

प्रसिद्ध पत्रकार कुलदीप नैयर अपनी आत्मकथा, "एक जिन्दगी काफी नहीं" में उस समय का वर्णन करते हुए लिखते है कि 15 सितंबर को मैं दिल्ली पहुंचा तो शहर दंगों की चपेट में था। मुसलमान शहर से भाग रहे थे, उसी तरह जैसे हिन्दू और सिख पश्चिम पंजाब से भाग रहे थे। मुसलमान दिल्ली की गलियों में सुरक्षित नहीं थे, इसलिए उनमें से ज्यादा ने पुराने किले में शरण ले रखी थी। सरदार पटेल और संविधान परिषद के अध्यक्ष राजेन्द्र प्रसाद दोनों ने ही नेहरू के इस प्रस्ताव का विरोध किया था कि दिल्ली के कुछ रिहायशी इलाके मुसलमानों के लिए आरक्षित कर देने चाहिए।

अगस्त 1947 में देश के विभाजन के दौरान हुए रक्त-रंजित दंगों में दिल्ली के मुसलमानों पर भी संकट आया और वे बड़ी संख्या (लगभग दो लाख) में पाकिस्तान चले गये। मुस्लिम लीग का नेतृत्व भी यहां से विदा हुआ। ऐसे ही दिल्ली में 1951 में लगभग जिन पांच लाख हिंदू-सिख शरणार्थियों की गणना की गई थी उनमें से 95 प्रतिशत दिल्ली के शहरी क्षेत्रों में ही बस गए।

प्यारेलाल की पुस्तक "महात्मा गांधीःपूर्णाहुति" के अनुसार, जून के अंतिम भाग में और जुलाई भर गांधीजी राजधानी में रहे। गांधी के शब्दों में, मैं नेताओं के बुलाने पर दिल्ली आया था, लेकिन अगर मुझसे पूछा जाय कि मैंने यहां क्या सिद्व किया, तो मुझे कहना पडे़गा कि उपयोगी कुछ नहीं। गांधी को लगा कि ऐसी स्थिति में मेरा सच्चा स्थान राजधानी में नहीं, किन्तु उन आदमियों के साथ है, जो पलटन टूट जाने पर भी मरते दम तक लड़ते रहते हैं। स्वाधीनता दिवस पर गांधीजी रोज से एक घंटे पहले अर्थात् 2 बजे जाग गये। वह महादेव देसाई का पांचवां श्राद्व दिवस था, इसलिए उन्होंने-ऐसे अवसर पर अपनी प्रथा के अनुसार-प्रातःकालीन प्रार्थना के बाद उपवास रखकर और संपूर्ण गीता का पाठ करके यह दिन मनाया।

आजादी की खुशी में बंटवारे का दर्द का बयान करते हुए "तमस" के लेखक भीष्म साहनी अपनी आत्मकथा "आज के अतीत" में लिखते हैं, मैंने साथ-ही-साथ दिल्ली की सड़कों पर शरणार्थियों की भीड़ भी देखी। एक ओर जश्न का-सा समां, दूसरी ओर बेघर लोगों की बदहाली, पर कुल मिलाकर वातावरण में आजादी की लहर का अधिक प्रभाव था। वे सबसे पहले 1947 में देश को आजादी मिलने का गवाह बनने की ललक से दिल्ली आए थे। बकौल साहनी पिताजी से यह कहकर कि मैं सप्ताह भर में लौट आऊंगा, कि मैं दिल्ली में आजादी का जश्न देखने जा रहा हूँ जब लालकिले पर भारत का झंडा लहराया जाएगा। जबकि दिल्ली पहुंचने की देर थी कि पता चल गया कि लौट पाना असम्भव हो गया है, रेलगाड़ियों का आना-जाना बन्द हो गया था। सहसा ही मेरे लिए सारा चित्रपट बदल गया। मेरे लिए ही क्यों, हमारे परिवार के लिए।

भारत की पहली महिला मुख्यमंत्री (उत्तर प्रदेश) और प्रसिद्ध गांधीवादी सुचेता (मजूमदार) कृपलानी ने अपनी मधुरिम आवाज में संवैधानिक सभा में 14 अगस्त, 1947 की रात को एक विशेष सत्र के दौरान वंदे मातरम और जन-गण-मन गाया था। "गांधी बोध: गांधीवादियों के साथ फ्रेड जे ब्लूम का संवाद" पुस्तक में दिए एक साक्षात्कार में सुचेता के ही शब्दों में, विभाजन के उपरान्त जब शरणार्थी आ रहे थे, मैंने बहुत काम किया। वास्तव में, मैंने सरकार की ओर से उनकी देखरेख की जिम्मेदारी के लिए राजी होने के पूर्व ही पहल करते हुए शरणार्थियों को संगठित किया। सुचेता ने इसके लिए राजेन्द्र बाबू की अध्यक्षता में एक समिति बनाई। बकौल सुचेता, मैंने सभी चीजें व्यवस्थित की और मैं दिल्ली में सैंकड़ों शरणार्थियों की देखभाल कर रही थी। बाद में, हम दूसरे भागों में भी फैले। शिविरों का संचालन करते हुए दो मास उपरान्त मेरे पास देखरेख में तीस हजार से भी ज्यादा लोग थे।



Tuesday, June 14, 2016

Sardar Patel_Newspapar_सरदार पटेल-समाचार पत्र




जिस समाचार पत्र का जन्म स्वतंत्र भारत में होता है, उसे जन्म से ही तंदुरुस्त होना चाहिए। गुलामी की हालत में भारत को मुक्त करने का जो समय था, उस समय समाचार पत्र का जो धर्म था और उसे जो कार्य था, उसमें और आज के समय में और धर्म में जमीन-आसमान का फर्क है। एक जिम्मेदार पत्रकार की कलम जनता पर जबरदस्त असर डाल सकती है। जितना जनता की भलाई के लिए डाल सकती है, उतना बुराई के लिए भी डाल सकती है। 

-सरदार वल्लभभाई पटेल, 

(आज का धर्म, 11 अगस्त 1948)

सरदार श्री के विशिष्ट  और अनोखे पत्र-1 पुस्तक से 

First Indian Bicycle Lock_Godrej_1962_याद आया स्वदेशी साइकिल लाॅक_नलिन चौहान

कोविद-19 ने पूरी दुनिया को हिलाकर रख दिया है। इसका असर जीवन के हर पहलू पर पड़ा है। इस महामारी ने आवागमन के बुनियादी ढांचे को लेकर भी नए सिरे ...