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Friday, August 26, 2016

Sorrow_Human state of mind_क्योंकि सपना है अभी भी_धर्मवीर भारती



जीवन में यदाकदा स्वपन, दु:स्वपन साबित होते हैं पर इससे सपने देखने की इच्छा समाप्त नहीं होनी चाहिए। आखिर जीवन है तो सपना है। दूसरे अर्थ में देखें या हिन्दी के प्रसिद्ध संपादक (धर्मयुग पत्रिका) और सम्मानित कवि धर्मवीर भारती के शब्दों (क्योंकि सपना है अभी भी शीर्षक कविता) में कहे तो, 

"ढाल छूटे, कवच टूटे हुए मुझको

फिर तड़प कर याद आता है कि

सब कुछ खो गया है - दिशाएं, पहचान, कुंडल,कवच

लेकिन शेष हूँ मैं, युद्धरत् मैं, तुम्हारा मैं

तुम्हारा अपना अभी भी

 

इसलिए, तलवार टूटी, अश्व घायल

कोहरे डूबी दिशाएं

कौन दुश्मन, कौन अपने लोग, सब कुछ धूंध धूमिल 

किन्तु कायम युद्ध का संकल्प है अपना अभी भी

... क्योंकि सपना है अभी भी!"

Sunday, March 23, 2014

Double standards of Communists-Dharmvir Bharati (धर्मवीर भारती-कम्युनिस्ट दोमुंही नीति)



यह कहना अधिक उचित होगा कि मार्क्सवाद नहीं बल्कि भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी और उसकी राजनीति हमें भारतीय जनता की आशाओं, आकांक्षाओं और संघर्षो से दूर, स्टालिन और मोलोतोव की विदेश नीतियों की मानसिक गुलामी लगने लगी थी।
1942 में जब सारा देश अंग्रेजों के खिलाफ उठ खड़ा हुआ था उस समय ये लोग अंग्रेजों को रूसियों का साथी मानकर अंग्रेज सरकार को जनान्दोलन दबाने में मदद कर रहे थे। वे जनता की बात करते थे पर किस काल्पनिक जनता की, यह हमारी समझ में नहीं आता था। हमारी गली मुहल्ले की जो जनता थी उसका दर्द हम जानते थे।
और शायद इसीलिए हम मार्क्स की मूल स्थापना कि "गरीब अमीर की नाबराबरी मिटनी चाहिए" इससे सहमत थे, पर ये भारतीय कम्युनिस्ट जो बेसिर पैर की जनवादी राजनीति और जनवादी साहित्य नीति बघार रहे थे, वह हमारे लिए अड्डेबाजी में मजाक का विषय बन गयी थी।
उन्होंने उसी समय एक ओर सत्ता और प्रतिष्ठान का संरक्षण स्वीकार करने और दूसरी ओर जनसंघर्ष की बातें करने की जो दोमुंही नीति अपनायी थी उसका दुष्प्रभाव अभी तक स्पष्ट लक्षित होता था।
-धर्मवीर भारती (धर्मवीर भारती की साहित्य साधना)

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