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Saturday, December 8, 2018

Dhaka village of British Raj_दिल्ली में अंग्रेजी राज का गवाह ढका गांव

08122018_दैनिक जागरण 

दिल्ली विधानसभा से किंग्सवे कैंप चौराहे से दाई तरफ मुड़ने पर रास्ता, वर्ष 1911 में अंग्रेज भारत में हुए तीसरे दिल्ली दरबार के स्मारक की तरफ जाता है। उल्लेखनीय है कि 12 दिसंबर 1911 को दिल्ली में हुए दरबार में अंग्रेज सम्राट जार्ज पंचम ने घोषणा की कि देश की राजधानी कलकत्ता से दिल्ली हो गई है। शहर के उत्तर में पुरानी सिविल लाइन में अस्थायी भवनों का निर्माण किया गया और वाइसराय को रिज के दूसरी ओर के भवन में ठहराया गया, जहां 1857 में घेरा डालने वाली अंग्रेज सेना ने एक बार शिविर लगाया था। आज यहां परमानंद कॉलोनी के रूप में एक भरी-पूरी आबादी बस गई है, जहां मकान-दुकान से लेकर सदाबहार बाजार हैं। यह बानगी सरसरी तौर पर देखने में बेहद अच्छी लगती है पर इसके मूल में कम व्यक्तियों की ही दृष्टि जाती है। और वह है एक छोटा-सा गांव जो कि आज भी अपने मूल नाम ढका के साथ महानगरीय चकाचौंध में अपना अस्तित्व बनाए हुए है।


1920 के दशक में ढका गांव भी, देश के दूसरे हजारों गांवों की तरह एक गांव था। जो कि इम्पीरियल सेक्रेटेरियट के कनिष्ठ कर्मचारियों, छोटा साहब लोग, के टेंट वाली बसावट के नजदीक होने के बावजूद अपने स्वरूप को बनाए हुए था। उल्लेखनीय है कि नई दिल्ली के बनने से पहले अंग्रेज कर्मचारी इसी क्षेत्र में रहे थे। तब यहां के खुले खेतों में बबूल के पेड़ और कांटेदारें नागकनी की मेडे होती थीं।

“दिल्ली तेरा इतिहास निराला” पुस्तक में वेद प्रकाश गुप्ता ने दिल्ली सर्कल के ढका गांव के विषय में विस्तार से लिखा है। पुस्तक के अनुसार, “अरसा तखमीनन 70 साल हुआ कि पहले रकबा देह हजा वीरान पड़ा था और मालकान मौजा वजीराबाद उसमें मवेशी चराते थे। जनबा मिस्टर वजीर साहब बहादुर ने मससियान ठाकर दास व धनी व छज्जन व किशना हर चार मारूसियान हम मालकान को खेरखवाही व खिदमतगुजारी (सेवकाई) कि वो हमेश साहब के साथ रहते थे, हक बिसवेदारी बीस बिसवा रकबा हजा बसीसनाथ 287 बीघे 11 बिस्बे हकीयत सरकार मवाफ हस्व तफसील जेल, ठाकुर दास को साढ़े 7 बिस्वे धन्नी को ढाई बीसवा छज्जन को पांच बिस्बे, किशना को पांच बिस्वे देकर अमल करा दिया। जनाब मिस्टर वजीर साहब बहादुर ने हर चार मारूसियान मजकूर को रकबा देह हजा का दिया था, को उस वक्त एक टीला बन्द रकबा देह हजा में बाका था और नीज उस पर दरखत ढाक कसरत से थे वो दरखत मारूसियान ने काट कर उस पर बसर्फ लागत खुद आबादी तैयार करी। बासवव maujudमौजुदगी दरखतान ढाक के नाम से ढाका आबाद मौसूम हुआ। मगर बबायस कसरत गलत इस्तेमाली ढका मारूफ (मशहूर) हो गया जब से आबादी कभी वीरान नहीं हुई और सिवाए आबादी देह और कोई खेड़ा कुनाह के रकबा देह हजा में नहीं है।”

अंग्रेजी पत्रकार राज चटर्जी अपनी पुस्तक “द बॉक्सवाला एंड द मिडलमैन” में संकलित “द इबोनी बॉक्स” नामक लेख (1965 में स्टेटसमैन में प्रकाशित) में लिखते हैं कि यह (ढका गांव) करीब 300 निवासियों, जिसमें जाट, गुर्जर और जाटव थे, का एक गांव था। यहां पर केवल एक मुस्लिम जलालुद्दीन का परिवार था जो कि पेशे से बुनकर था। तब गांववालों की निगाह में पटवारी या लंबरदार से अधिक महत्वपूर्ण व्यक्ति 70 साल का जाट किसान प्रताप सिंह था। वह सबसे ज्यादा जोत वाली जमीन के साथ पूरे गांव में एकलौते पक्के मकान का मालिक था। 

प्रताप सिंह के पास एक दस्तावेज था, जिसमें लिखा था कि यह बताया जाता है कि ढका गांव के जमीदार शमशेर सिंह ने मुझे और मेरे दो बच्चों को रिज पर अंग्रेज छावनी में पहुंचने तक शरण देने के साथ भोजन दिया। एजिलाबेथ कोर्टनी, 89 वीं नेटिव इन्फैन्ट्री के कैप्टन जॉन कोर्टनी की पत्नी, जून 1857। उल्लेखनीय है कि शमशेर सिंह, प्रताप सिंह के पिता थे और यह चिट्ठी परिवार की सबसे मूल्यवान थाती थी।

Saturday, May 26, 2018

Wells_Traditional water sources of Delhi in british raj_अंग्रेजी राज में कुओं की अथ कथा

दैनिक जागरण 26/05/2018


नगरों में नल से पानी हमारे घरों में क्या पहुंचा, हम उसके स्रोतों का महत्व ही बिसरा बैठे हैं। यदि आज कुओं से पानी खींचना पड़े तो मालूम हो जाए कि पनघट की डगर कितनी कठिन है। अब तो महानगरों में कुएं दिखाना भी अध्ययन का भाग हो गया है क्योंकि कुएं अब दीखते ही कहां हैं, राज-समाज ने यह मानकर कुओं का मुंह बंद कर दिया है कि उसमें गिरने का खतरा है। खैर कुओं की अपनी व्यथा है तो उनकी अथ-कथा भी है। 


1912 तक दिल्ली पंजाब सूबे का केवल एक जिला थी और दो अन्य तहसीलें, सोनीपत और वल्लभगढ़, जो अब हरियाणा राज्य की हिस्सा है। चकबंदी के वर्षों (1872-75) में पंजाब जिले में कुल 8841 कुएं थे, जिनमें दिल्ली में 2,256, सोनीपत में 4797 और वल्लभगढ़ में 1,788 कुंए थे। अंग्रेजी राज के दिल्ली के गजेटियर (1883-84) के अनुसार, ''पंजाब सूबे के सभी जिलों में दिल्ली खेती के लिए सिंचाई योग्य क्षेत्र के मामले में अव्वल थी। अकाल आयोग को दिए गए आंकड़ों के हिसाब से कुल 37 सिंचाई योग्य क्षेत्रों में से 15 कुंओं से सिंचित होते थे। जबकि चार सिंचाई योग्य क्षेत्रों में झील पर बने बंध से और अठारह सिंचाई योग्य क्षेत्रों में नहरों के पानी से सिंचाई की जाती थी।"

उस दौर में मुख्य रूप से चार तरह के कुओं का प्रयोग होता था। पहला, चिनाई वाला कुंआ ईंट, पत्थर और गारे से बना होता था, जिसे बरसों-बरस के उपयोग के हिसाब से बनाया जाता था। ऐसे कुएं लंबे समय तक पानी देने के काम आते थे। दूसरे, मजबूती के हिसाब से बनने वाले शुष्क चिनाई वाले कुंए थे जो कि मुख्य रूप से पहाड़ी इलाकों में होते थे, जहां आस-पास चट्टान के होने के कारण कुएं को बनाने में पत्थरों का उपयोग सस्ता पड़ता था। तीसरे, लकड़ी के कुएं थे। ऐसे कुओं की चारोें ओर बैलगाड़ी के पहिए के समान लकड़ी के नौ इंच से दो फीट लंबे घुमावदार टुकड़े लगे होते थे जो कि अधिक गहरे न होने पर भी बरसों पानी देते थे। खादर इलाके के गांवों में इनकी संख्या अधिक थीं। चौथे, सिंचाई और टिकाऊपन के हिसाब से उपयोगी झार का कुंआ था जो कि जमीन में खुदा एक खड्डा भर होता था।
तब सिंचाई-पेयजल के लिए दो तरह के कुएं होते थे। पहला रस्सी-और-मशक यानी चड़स वाला और दूसरा रहट वाला कुआं। आज सिंचाई के जिस साधन को चड़स के नाम से पहचाना जाता है, वह मूल रूप से चमड़े का होता था। बैलों के बल के सहारे कुएं से जल को पात्र (चड़स) में भरकर ऊपर उठाया जाता और खाली कर पानी को इच्छित स्थान पर पहुंचाया जाता था। भ्रमणी (भूण) व ताकलिया (बेलनाकार चरखी) से लैस कुएं पर ही इसे संचालित किया जाता था। जबकि रहट खेतों की सिंचाई के लिए कुएँ से पानी निकालने का एक प्रकार का गोलाकार पहिए रूपी यंत्र होता था और जिस पर मिट्टी के हाँड़ियों की माला पड़ी रहती है। इसी पहिए के घूमने से कुंए में नीचे से हाँड़ियों में भरकर पानी ऊपर आता था।


दिल्ली के गजेटियर (1912) के अनुसार, "दिल्ली में होने वाली कुल सिंचित क्षेत्र में 57 प्रतिशत में सिंचाई के कृत्रिम साधनों से, 19 प्रतिशत में कुओं से, 18 प्रतिशत में नहरों से, और 20 प्रतिशत में बंध से होती थी।" 1860 तक, शहर में 1,000 कुएं होने बात दर्ज थी, जिनमें लगभग 600 निजी स्वामित्व और 400 सार्वजनिक उपयोग में थे। उर्दू शायर मिर्जा गालिब ने 1860-61 में एक खत में लिखा कि अगर कुएं गायब हो गए और ताजा पानी मोती की तरह दुर्लभ हो जाएगा तो यह शहर कर्बला की तरह एक वीराने में बदल जाएगा।


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