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Sunday, April 15, 2018
Tuesday, January 10, 2017
History of Local Administration (MCD) in British Delhi_अंग्रेजों के दौर में ऐसे बनी एमसीडी
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सांध्य टाइम्स, 10/01/2017 |
दिल्ली के स्थानीय प्रशासन का इतिहास पुराना होने के साथ रोचक भी है। ईस्ट इंडिया कंपनी ने 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम को छल-बल से विफल तो कर दिया पर इसका परिणाम यह हुआ कि भारत के शासन सूत्र की बागडोर व्यापारिक कंपनी ईस्ट इंडिया के हाथ से निकलकर अंग्रेज सरकार के हाथ में चली गई। 1858 में दिल्ली को पंजाब सूबे में मिला दिया गया। इसका नतीजा यह हुआ कि दिल्ली, पंजाब के पांच डिवीजनों में से एक बन गई और इस डिवीजन में हिसार, रोहतक, गुडगांव, करनाल, अंबाला, शिमला और दिल्ली के जिले थे। पंजाब प्रांत के एक भाग के रूप में दिल्ली संभाग एक कमिश्नर के अधीन था, जिसका अपने सामान्य प्रशासनिक कार्यों के अतिरिक्त सिरमूर, काल्सिया, दुजाना, पटौदी और लोहारू की संरक्षित रियासतों पर भी नियंत्रण था।
1857 के बाद अंग्रेजों ने शाहजहांनाबाद की चारदीवारी से बाहर निकलकर राजधानी के सिविल लाइंस क्षेत्र को विकसित किया। दिल्ली म्युनिसिपल कमीशन को गठित करने का मूल उद्देश्य मुख्य रूप से सिविल लाइंस क्षेत्र (सत्ता का केंद्र होने के साथ जहां पर अंग्रेजों के आभिजात्य वर्ग के घर थेे) और कुछ हद तक चारदीवारी में बसे शहर को बेहतर नागरिक सुविधाएं प्रदान करना था।
एक नई अवधारणा लगने वाली इस बात को ही रेखांकित करते हुए 1823 में गवर्नर जनरल एमहर्स्ट ने एक बार कहा था कि "स्थानीय सुधारों के लिए शहर की जिम्मेदारी तय की जानी चाहिए और यहां तक कि इस खर्च हो पूरा करने के लिए प्रत्यक्ष कर भी लगाए जा सकते हैं। दिल्ली में इस बात का परिणाम यह हुआ कि शहर की देखभाल की जिम्मेदारियों के वहन के लिए एक समिति गठित की गई।"
1820 में फोर्टस्कूयर की बनाई एक विस्तृत रिपोर्ट ने इसके काम को आसान कर दिया। इस रिपोर्ट में दिल्ली में लागू सीमा शुल्क और शहरी करों को सूचीबद्ध किया गया था। लेकिन इससे पहले कि इस प्रयोग का पूरी तरह क्रियान्वयन हो पाता, चार्ल्स मेटकॉफ ने इस नगर पालिका को अपनी केन्द्रित नीति से समाप्त कर दिया। चार्ल्स ट्रेवेयन ने 1833 की अपनी रिपोर्ट में शहर के करों की आलोचना करते हुए इस बात को दिल्ली के एक व्यापार केंद्र के रूप न उभरने का जिम्मेदार बताया। इसी बात से भिवानी, रेवाड़ी और शाहदरा में बाजार पनपने में मदद मिली, जहां पर और दिल्ली की तरह शहरी-कर नहीं लगाए जाते थे। अंग्रेजों ने सबसे पहले शहरी करों को बंगाल और फिर उत्तर-पश्चिमी प्रांतों में ख़त्म किया।
दिल्ली के नागरिकों के लिए उस समय नागरिक प्रशासन का मतलब एक स्थान या कोई कार्यालय न होकर एक अकेले अधिकारी से था। पर वर्ष 1860 के दशक के बाद इस स्थिति में परिवर्तन आया। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि अंग्रेजों ने अपने को सिविल लाइंस तक सीमित या अलग न रखते हुए शाहजहांनाबाद की चारदीवारी में बसे पुराने शहर को भी रखा थां।
दिसंबर 1862 में पंजाब सरकार के नगर सुधार अधिनियम, 1850 को दिल्ली में अधिसूचित कर दिया गया। इस तारीख के बाद म्युनिसिपल प्रशासन का, जो अब पुरानी दिल्ली के नाम से प्रसिद्ध है, स्पष्ट और क्रमिक लिखित इतिहास मौजूद है। तब से दिल्ली में नगरपालिका व्यवस्था किसी न किसी रूप में रही। 1862 में ही दिल्ली जिले का दिल्ली, बल्लभगढ़ और सोनीपत तहसीलों में विभाजन हुआ।
उल्लेखनीय है कि 1862 में दिल्ली नगर पालिका केवल 2 वर्ग मील में रहने वाले 1.21 लाख निवासियों की जरूरतों को पूरा करने के लिए अस्तित्व में आई। नगर पालिका फरवरी, 1863 में अस्तित्व में आई जबकि उसकी पहली बैठक 23 अप्रैल, 1863 को आयोजित हुई। इस प्रशासन का नाम पहले देहली म्युनिसिपल कमीशन था जो कि बाद में देहली म्युनिसिपल कमेटी या दिल्ली नगर पालिका पड़ा। उल्लेखनीय है कि दिल्ली का नागरिक प्रशासन देश के समस्त नागरिक प्रशासनों में सबसे पुराना है। राजधानी में समय के साथ-साथ स्थानीय निकाय का विकास हुआ। और इसी का परिणाम है कि आज देश की राजधानी में चार स्थानीय निकाय करीब 1400 वर्ग किलोमीटर में फैले क्षेत्र की लगभग डेढ़ करोड़ की जनसंख्या को नागरिक सेवाएं प्रदान कर रहे हैं।
म्युनिसिपल कमिश्नर माधो प्रसाद अपनी पुस्तक (1921 में छपी) में लिखते हैं कि ऐसा प्रतीत होता है कि उस समय दिल्ली में पहले से ही एक तरह की नगर पालिका थी। दिल्ली के कमिश्नर को 26 अगस्त 1862 में लिखे एक पत्र में पूछा गया था कि क्या दिल्ली म्युनिसिपल कमेटी की कार्यवाही का किसी भी तरह से प्रचार किया गया और अगर प्रचार किया गया तो उसके लिए क्या तरीका अपनाया गया। डिप्टी कमिश्नर ने 15 सितंबर 1862 को दिए अपने उत्तर में इस बात का उल्लेख किया कि कार्यवाही के सारांश को एक भारतीय भाषा में 50 प्रतियां म्युनिसिपल फंड से पैसे लेकर छपवाई गई है।
वर्ष 1863 दिल्ली म्युनिसिपल कमीशन के इतिहास में एक मील का पत्थर है। इसी साल, पहली बार सार्वजनिक शौचालयों को बनाने के साथ साफ-सफाई की व्यवस्था कायम की गई। इतना ही नहीं, सदर बाजार में एक यूनानी दवाखाना खोला गया तथा नागरिकों के जन्म-मृत्यु के पंजीकरण का काम भी शुरू हुआ। 1867 में कोतवाली में एक आग बुझाने वाली गाड़ी के साथ अग्नि शमन सेवा का आरंभ हुआ।
दिल्ली में कुछ कुओं के पानी को आदमी के पीने लायक न पाए जाने के कारण 1869 में पानी मुहैया करवाने का प्रस्ताव लाया गया। जबकि पानी की गाड़ियों के माध्यम से पेयजल की आपूर्ति का काम 1871-1872 में शुरू हुआ। दिल्ली म्युनिसिपल कमीशन ने लालटेन और लैम्प पोस्ट से गलियों में रोशनी की व्यवस्था का आरंभ किया। वर्ष 1875 में पहली बार 1600 पौधे लगाए गए। इसी साल, सेवाओं का विकेन्द्रीकरण हुआ और सामुदायिक प्रतिनिधित्व प्रदान किया गया। साफ-सफाई की गतिविधियों की निगरानी के लिए इलाकाई व्यवस्था की शुरुआत की गई। हर इलाके की निगरानी एक तीन सदस्यीय समिति करती थी। तब नजफगढ़ और महरौली के पुराने शहर की नगरपालिकाएं थीं जबकि 1886 में इनको अधिसूचित क्षेत्र के रूप में गठित किया गया।
दिल्ली के आयुक्त (कमिश्नर) कर्नल जी.डब्ल्यू. हैमिल्टन इस म्युनिसिपल कमीशन के अध्यक्ष तथा डब्ल्यू॰ एच॰ मार्शल इसके अवैतनिक मानद सचिव थे। उस समय, इसके बारह अंग्रेज और सात भारतीय सदस्य थे। भारतीय सदस्यों में लाला चूनामल, लाल महेश दास, राव उम्मेद सिंह, लाला साहिब सिंह, दीवान इमानउल्ला खान, शेख महबूब बक्श और शेख विलायत हुसैन खान थे।
तब, इसके कुल कर्मचारियों में सुपरिटेंडेन्ट, नायब सुपरिटेंडेन्ट, जमादार, मुंशी, चपरासी और कर उगाने वाला कर्मचारी होते थे। कई बरसों तक म्युनिसिपल कमीशन में सेक्रेटरी ही प्रमुख अधिकारी होता था परंतु बाद में इस पद को इंजीनियर-सेक्रेटरी में बदल दिया गया। तब तक डिप्टी कमिश्नर ही इस कमेटी का प्रधान हुआ करता था और दिल्ली प्रांत के समस्त आवश्यक प्रशासनिक कार्यों की देखरेख करता था। यह सेक्रेटरी सफाई, स्वास्थ्य, अर्थ सम्बन्धी के अलावा जिला मेजिस्ट्रेट भी होता था। इस तरह से पूरा प्रशासन एक सूत्र में बंधा हुआ था और सारे मुख्य विषय निर्णय के लिए डिप्टी कमिश्नर के पास भेजे जाते थे। बाद में, डिप्टी कमिश्नर एच. सी. बीडन की अध्यक्षता में प्रशासन में कुछ अन्य स्वतन्त्र विभागों की स्थापना हुई।
दिल्ली जिला एक डिप्टी कमिश्नर के अधीन था। यह पदनाम मुख्य जिलाधिकारियों को गैर-रेगुलेशन प्रान्तों में मिला हुआ था। डिप्टी कमिश्नर की सहायता के लिए आठ सहायक अथवा अतिरिक्त सहायक कमिश्नर थे और प्रत्येक तहसील, तहसीलदार और नायब तहसीलदार के अधीन थी। ये अधिकारी राजस्व संबंधी काम भी देखते थे और न्यायिक कार्य भी। डिप्टी कमिश्नर पूरे जिले के लिए रजिस्ट्रार होता था और वह चार अलग-अलग शहरों में नियुक्त सब रजिस्ट्रारों के काम की देखरेख करता था। वह जिला बोर्ड और दिल्ली नगर पालिका-दोनों ही का पदेन अध्यक्ष होता था। दिल्ली, सोनीपत, बल्लभगढ़ और फरीदाबाद में नगर पालिकाएं होती थी और महरौली तथा नजफगढ़ में नोटिफाइड एरिया कमेटियां। एक जिला बोर्ड भी हुआ करता था।
जब दिसम्बर 1911 में अंग्रेजों के तीसरे दिल्ली दरबार में सम्राट ने दिल्ली को अपने साम्राज्य की राजधानी घोषित किया तब राजधानी के नागरिक प्रशासन में कोई विशेष परिवर्तन नहीं हुआ। 1912 में दिल्ली सूबा बना, जिसमें 773 गांव थे। शाहदरा 1916 में दिल्ली सूबे में मिलाए जाने एक अधिसूचित क्षेत्र था। दिल्ली का किला भी, जो पहले छावनी था, इसी श्रेणी में रखा गया। सिविल लाइन या सिविल स्टेशन और नई दिल्ली अपेक्षाकृत रूप में बाद में बने। इसमें सिविल लाइन को 1913 में अधिसूचित क्षेत्र घोषित किया गया। नई दिल्ली का गठन एक दूसरी श्रेणी की नगरपालिका के रूप में फरवरी 1916 में हुआ, जिसका मूल उद्देश्य उस बहुत बड़ी संख्या वाले मजदूरों की सफाई से संबंधित आवश्यकताओं को पूरा करना था, जो नई राजधानी के निर्माण में कार्यरत थे।
Saturday, January 7, 2017
History of local administration in British Delhi_दिल्ली के स्थानीय प्रशासन का आरंभिक ब्रिटिश इतिहास
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0701201, दैनिक जागरण |
दिल्ली के स्थानीय प्रशासन यानि नगरपालिका का इतिहास देश के समस्त नागरिक प्रशासनों में सबसे पुराना है। 1857 के पहले स्वतंत्रता संग्राम में भारतीयों की हार के बाद 1858 में दिल्ली में ईस्ट इंडिया कंपनी का राज ख़त्म हो गया। दिल्ली अंग्रेजी साम्राज्य का हिस्सा बन गई ।
दिल्ली को पंजाब सूबे में जोड़ दिया गया। दिल्ली, पंजाब के पांच डिवीजनों में से एक थी, जिसके तहत हिसार, रोहतक, गुडगांव, करनाल, अंबाला, शिमला और दिल्ली के जिले थे। 1862 में दिल्ली जिले का दिल्ली, बल्लभगढ़ और सोनीपत तहसीलों में विभाजन हुआ।
तब से नगरपालिका व्यवस्था किसी न किसी रूप में दिल्ली को मिली। 1862 में नगर सुधार अधिनियम, 1850 को पंजाब सरकार की एक अधिसूचना से नाम पर दिल्ली पर लागू किया गया और इस प्रशासन का नाम पहले देहली म्युनिसिपल कमीशन रखा गया। बाद में, यह देहली म्युनिसिपल कमेटी या दिल्ली नगर पालिका हुआ।
1863 में दिल्ली डिविजन के आयुक्त कर्नल जी.डब्ल्यू. हैमिल्टन की अध्यक्षता में दिल्ली म्यूनिसिपल कमेटी की पहली बैठक हुई। इस सभा में सात भारतीय और चार अंग्रेज सदस्यों थे।
इस तारीख के बाद राजधानी के म्युनिसिपल प्रशासन का स्पष्ट और क्रमिक रिकॉर्ड मिलता है। तब नजफगढ़ और महरौली के पुराने नगर की नगरपालिकाएं होती थीं, जिन्हें 1886 में अधिसूचित क्षेत्र के रूप में गठित किया गया।
दिल्ली के आयुक्त (कमिश्नर) कर्नल हैमिल्टन इस म्युनिसिपल कमीशन के अध्यक्ष तथा डब्ल्यू। एच. मार्शल इसके अवैतनिक सचिव थे। उस समय, इसके कुल कर्मचारियों में सुपरिटेंडेन्ट, नायब सुपरिटेंडेन्ट, जमादार, मुंशी, चपरासी और कर उगाने वाला कर्मचारी होते थे। कई बरसों तक म्युनिसिपल कमीशन में सेक्रेटरी ही प्रमुख अधिकारी होता था परंतु बाद में इस पद को इंजीनियर-सेक्रेटरी में बदल दिया गया।
1911 में तीसरे दिल्ली दरबार में अंग्रेज राजा किंग जॉर्ज ने दिल्ली को अंग्रेजी साम्राज्य की राजधानी बनाने की घोषणा की। इसके नतीजा 1912 में अलग से दिल्ली सूबे के गठन के रूप में सामने आया। इस सूबे में 773 गांव थे, जिसमें दिल्ली तहसील में 267, सोनीपत तहसील में 141 और बल्लभगढ़ तहसील में 265 गांव थे।
उस समय तक डिप्टी कमिश्नर ही इस कमेटी का प्रधान हुआ करता था और दिल्ली सूबे के समस्त आवश्यक प्रशासनिक कार्यों की देखरेख करता था। यह सेक्रेटरी सफाई, स्वास्थ्य, अर्थ सम्बन्धी के अलावा जिला मेजिस्ट्रेट भी होता था। इस तरह से पूरा प्रशासन एक सूत्र में बंधा हुआ था और सारे मुख्य विषय निर्णय के लिए डिप्टी कमिश्नर के पास भेजे जाते थे। बाद में, डिप्टी कमिश्नर एच. सी. बीडन की अध्यक्षता में प्रशासन में कुछ अन्य स्वतन्त्र विभागों की स्थापना हुई।
शाहदरा 1916 में दिल्ली सूबे में मिलाए जाने एक अधिसूचित क्षेत्र था। दिल्ली का किला भी, जो पहले छावनी था, इसी श्रेणी में रखा गया। सिविल लाइन और नई दिल्ली अपेक्षाकृत रूप में बाद में बने। इसमें सिविल लाइन को 1913 में अधिसूचित क्षेत्र घोषित किया गया।
नई दिल्ली का गठन एक दूसरी श्रेणी की नगरपालिका के रूप में फरवरी 1916 में हुआ। इस नगरपालिका को बनाने का मूल उद्देश्य नई राजधानी के निर्माण में कार्यरत असंख्य मजदूरों की सफाई से संबंधित आवश्यकताओं को पूरा करना था।
Friday, September 9, 2016
ऐतिहासिक दिल्ली की गवाह है, राजधानी की रिज_Delhi Ridge_age old witness of historic delhi
हाल में ही केन्द्रीय सूचना आयोग के दिल्ली के रिज क्षेत्र के सीमांकन में देरी के कारण अंधाधुंध अतिक्रमण और अतिक्रमण करने वालों के खिलाफ कार्रवाई पर रिपोर्ट सौंपने का निर्देश दिया। इतना ही नहीं, आयोग ने रिज क्षेत्र की सीमा चिन्हित करने में देरी से अतिक्रमण और मानचित्र सहित जानकारी मांगी है। इस तरह, एक बार फिर दिल्ली की रिज चर्चा में है। दुनिया की सबसे ऐतिहासिक राजधानियों में से एक दिल्ली का उल्लेख हिंदुओं के प्राचीन महाकाव्य महाभारत में मिलता है।
इस शहर की दो प्राकृतिक विशेषताओं-रिज और यमुना नदी ने इसे सदियों से शासकों के लिए एक सुरक्षित और मनपसंद जगह बनाया। यही कारण है कि दिल्ली की हरियाली के फेफड़े की रक्षा की लड़ाई बहुत पहले ही शुरू हो गई थी। दिल्ली में पहाड़ी का भाग, दिल्ली रिज तो कभी रिज के नाम से पुकारा जाता है जो कि कभी शहर की लगभग 15 प्रतिशत भूमि पर फैला हुआ था।
यह रिज एक भूवैज्ञानिक कारक है जिसकी विशेषता यह है कि वह कुछ दूरी तक लगातार चोटी की तरह उठान पर है। दिल्ली रिज भारत की सबसे पुराने पहाड़ अरावली पर्वत श्रृंखला का उत्तरी विस्तार है जो कि गुजरात से लेकर राजस्थान और हरियाणा से दिल्ली तक विस्तार लिए हुई है। दिल्ली रिज कुल 35 किलोमीटर की दूरी तक फैली हुई है जो कि भाटी माइंस से दक्षिण पूर्व में 700 साल पुराने तुगलकाबाद तक अलग-अलग दिशाओं में शाखाओं में विभाजित है और अंत में यमुना नदी के पश्चिमी तट पर वजीराबाद के पास उत्तरी छोर तक इसका फैलाव है।
दिल्ली के इतिहास में रिज ने एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है और यहां तक कि इसका अपना प्राग इतिहास भी है। दिल्ली रिज क्वार्टजाइट चट्टानों से बनी है, जिससे पाषाण युग वाले मानव अपने औजार बनाते थे। दरअसल, पुरातत्वविदों ने दिल्ली रिज में पाषाण युग के कारखानों की खोज की है जो कि व्यापक स्तर पर औजारों के उत्पादन का साक्ष्य है। पाषाण कालीन मानव की रिज के घने वन आच्छादित क्षेत्र में भी रहगुजर थी जो कि उन्हें भोजन (कंदमूल और पशु) तथा आश्रय प्रदान करती थी। इतना ही नहीं, वहाँ पर्याप्त जल भी था और यह तथ्य आज भी उतना ही प्रासंगिक है।
रिज अपनी स्थलाकृतिक विशेषता के कारण हजारों साल से मानव को इस क्षेत्र में बसने के लिए आकर्षित करती रही है। यही कारण है कि आठवीं सदी के लालकोट के किले, 12 वीं सदी की कुतुब मीनार, 17 वीं सदी का परकोटे वाला शहर शाहजहांनाबाद से 20 वीं सदी की लुटियन की नई दिल्ली तक राजधानी की ऐतिहासिक वास्तुकला रिज के भीतर और उसके आसपास पाई जाती है।
दिल्ली सात शहरों के उत्थान-पतन की गवाह रही है। इनमें मुख्य किला राय पिथौरा, लाल कोट, महरौली, सिरी, तुगलकाबाद, फिरोजाबाद और मुगल शहर शाहजहांनाबाद, जो कि अब पुरानी दिल्ली के नाम से जाना जाता है। उल्लेखनीय है कि अंग्रेजो ने शाहजहांनाबाद पर ही कब्जा किया था। मध्य काल में इन शहरों में से पहले चार पारिस्थितिक कारणों और पहाड़ियों की वजह से मिली सैन्य सुरक्षा के कारण सीधे तौर पर रिज में ही बने थे।
14 वीं सदी में, दिल्ली रिज का जंगल कांटेदार झाड़ियों से ढका था, जहां प्राकृतिक हरीतिमा कम थी। शिकार के बेहद शौकीन बादशाह फिरोज तुगलक ने रिज के चट्टानी दक्षिणी भाग को साफ करवाया जिस पर गयासुद्दीन तुगलक ने किलेदार शहर तुगलकाबाद किले का निर्माण करवाया। उत्तर मुगल कालीन दौर में शहर के यमुना नदी के तट की ओर ले बनने के कारण रिज पर बड़े पैमाने पर जंगलों की कटाई हुई। फिर भी इसने एक भूमिगत जल स्रोत के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और स्थानीय चरवाहे के लिए गोचर भूमि के रूप में कार्य किया।
दिल्ली के हालिया इतिहास में रिज की भूमिका संवेदनशील रही है। अंग्रेज शासन काल के दौरान रिज विभिन्न कारणों से असाधारण रूप से महत्वपूर्ण बन गई। पहली महत्वपूर्ण घटना वर्ष 1857 का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम था, जिसमें अंग्रेजों के विदेशी शासन के खिलाफ विद्रोह देखा गया। वैसे तो समूचा उत्तर भारत अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह में आगे था पर सर्वाधिक सरगर्मी दिल्ली में थी। ऐसा इसलिए था क्योंकि भारतीय विद्रोही सैनिक मुगल बादशाह, जो कि अंग्रेजों की कड़ी नजर में था, को केंद्रबिंदु मानकर चारों ओर से लामबंद हुए थे। अंग्रेज सैनिकों ने रिज की ऊंचाई का लाभ हासिल करने के हिसाब से उसके उत्तरी हिस्से में अपना मोर्चा कायम किया था। बाद में भारतीय आजादी के रणबांकुरों की शहादत के कारण रिज को एक पवित्र स्मारक का दर्जा मिला।
भारत में अंग्रेजी राज के वर्ष 1883-84 में प्रकाशित दिल्ली के गजेटियर में दिल्ली में बड़े स्तर पर जैव विविधता के होने की बात रिकॉर्ड में दर्ज है। अंग्रेज सरकार ने वर्ष 1913 में अधिसूचनाओं के माध्यम से एक मजबूत वैधानिक तंत्र बनाया था। भारतीय वन अधिनियम, 1878 के प्रावधानों के तहत दिल्ली के आठ गांवों की 796.25 हेक्टेअर भूमि को एक आरक्षित वन के रूप में अधिसूचित किया गया था। इसके बाद भी, दिल्ली में रिज को सुरक्षा प्रदान करने के उद्देश्य से कुछ और अधिसूचनाएं जारी की गईं।
19 वीं सदी में अंग्रेजों ने बड़े पैमाने पर रिज के जंगल का वनीकरण शुरू किया था। वर्ष 1807 का एक अंग्रेजकालीन नक्शा वर्तमान समय में रिज के बिखरे हुए जंगलों के विपरीत रिज के उत्तर से दक्षिण दिशा तक के निर्बाध विस्तार को प्रदर्शित करता है। वर्ष 1900 के आरंभ में, अंग्रेजों ने कुछ मुगल बाग़ों को सहेजने का काम शुरू किया। और जब उनकी शाही राजधानी कलकत्ता (अब कोलकाता) से दिल्ली स्थानांतरित हुई तब अंग्रेजों ने नए शहर के विकास पर ध्यान केंद्रित करते हुए प्रभावशाली इमारतें, चौड़ी और सुचारू सड़कों आदि बनवाईं जो कि आज भी ध्यान आकर्षित करती है।
अंग्रेजों ने नए शहर की एक उपयुक्त राजसी पृष्ठभूमि के रूप में रिज की कल्पना की। इस तरह, एक बार फिर से रिज पर ध्यान केंद्रित हो गया और वनीकरण का काम पूरे जोरों से शुरू हुआ। इसके पीछे मूल विचार नई शाही राजधानी को पत्ते के समुंदर के रूप में तैयार करने का था। इसी कारण विभिन्न विदेशी प्रजातियों के पौधों को रोपा गया जिसमें प्रोसोपिस जूलीफ्लोरा, मैक्सिको देश का पेड़, भी था जिसे अब भारत में विलायती कीकर के नाम से जाना जाता है। इसी विलायती कीकर की वजह से आज रिज में व्यापक रूप से एक ही प्रकार की वनस्पति की अधिकता हुई। इससे दिल्ली के हरित क्षेत्र में वृद्धि हुई पर यह पूरी तरह से एक सकारात्मक विकास नहीं था।
अंग्रेजों के दिल्ली रिज में किए गए वनीकरण से अंग्रेजी औपनिवेशिक वानिकी की प्रकृति और विशिष्टता का पता चलता है। रिज के पास के गांवों में रहने वाले हिंदुस्तानियों को विस्थापित कर दिया गया और ईंधन और चारे के लिए रिज पर निर्भर रहने वाले स्थानीय लोगों को बाड़ और सुरक्षाकर्मियों के सहारे उनके स्वाभाविक अधिकार से वंचित कर दिया गया। वर्ष 1913 में, अंग्रेज सरकार ने सेंट्रल रिज की प्राकृतिक संपदा को संरक्षित करने के लिए भारतीय वन कानून, 1878 के सातवें अधिनियम की धारा 4 को लागू करने का निर्णय लिया। दिल्ली के मुख्य आयुक्त ने आठ गांवों-दसघरा, खानपुर, शादीपुर, बंद शिकार खातून, अलीपुर पिलांजी, मालचा और नारहौला की 796॰25 हेक्टेअर भूमि को आरक्षित वन घोषित कर दिया। इस संबंध में, 6 दिसंबर 1913 को अधिसूचना निकालने के साथ वन बंदोबस्त अधिकारी के रूप में एक आईसीएस अधिकारी और अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट दिल्ली विन्सेंट कोनोली की नियुक्ति की गई। इस तरह, रिज पर अंग्रेजों के नियंत्रण को और अधिक कड़ा कर दिया गया।
वर्ष 1915 में एक बार फिर दिल्ली के मुख्य आयुक्त ने सात सितंबर 1915 को भारतीय वन अधिनियम, 1878 की सातवें अधिनियम की धारा 19 के तहत एक अधिसूचना जारी करते हुए पट्टी चंद्रावल गांव की भूमि के एक भाग को आरक्षित वन घोषित कर दिया। इन वनों का मालिकाना हक सीपीडब्ल्यूडी की अधिसूचित को दे दिया गया और समिति के सचिव को वन अधिकारी बना दिया गया।
लेकिन तेजी से शहरीकरण के कारण जमीन पर दबाव बढ़ा और 1920-30 के दौरान दिल्ली विश्वविद्यालय के पास रिज के एक बड़े हिस्से को बारूद से विस्फोट करके उड़ाया गया। यह काम आवासीय कालोनियों और व्यावसायिक परिसर सहित करोल बाग की नई कॉलोनी के लिए आने जाने का रास्ता बनाने की गरज से किया गया था। 16 सितंबर 1942 को दोबारा मुख्य आयुक्त की अधिसूचना को निरस्त करते हुए पट्टी चंद्रावल महल गांव की जमीन के एक हिस्से को बतौर आरक्षित वन घोषित किया गया। इस तरह, यह साफ पता चलता है कि अंग्रेजों ने शाही वानिकी का एक ऐसा मॉडल लागू किया, जिसकी छाया अभी भी आधुनिक पर्यावरण नीति में नजर आती है।
आजादी के बाद के वर्षों में, बढ़ती जनसंख्या के दबाव, संसाधन की अत्यधिक निकासी, प्राकृतिक दृश्यों वाले सार्वजनिक पार्कों के निर्माण, सार्वजनिक आवास, आधुनिक निर्माण के कचरे के निपटान आदि के कारण रिज को एक गंभीर खतरा पैदा होने के साथ उसकी क्षेत्रफल में कमी आई है। किसी समय अखंड इकाई वाली यह रिज अब पांच क्षेत्रों-उत्तरी रिज, मध्य रिज, दक्षिण मध्य रिज, दक्षिणी रिज और नानकपुरा दक्षिण मध्य में विभाजित है। इन सभी पांच क्षेत्रों का कुल क्षेत्रफल 7784 हेक्टेयर है जो कि पूरे शहर में अलग-अलग खंडों में फैला हुआ है।
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