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Saturday, May 25, 2019
Today's city and cinema through Delhi_आज का शहर और सिनेमा वाया दिल्ली
उल्लेखनीय है कि दिल्ली पर्यटन ने वर्ष 2018 में एक कैलेंडर छापा था, जिसमें राजधानी के लोकप्रिय सिनेमाई शूटिंग स्थलों को प्रदर्शित किया गया था। इस कैलेंडर में इंडिया गेट, जंतर मंतर, हुमायूं मकबरा, निजामुदीन दरगाह, कुतुब मीनार, जामा मस्जिद, अग्रसेन की बावली, लालकिला, नाॅर्थ ब्लाॅक, ग्यारह मूर्ति, गुरूद्वारा बंगला साहिब और कनाट प्लेस के रंगीन चित्रों सहित इन स्थानों पर फिल्माई गई फिल्मों क्रमशः बैंड बाजा बारात, अब होगा धरना अनलिमिटेड, कुर्बान, राॅकस्टार, फना, बजरंगी भाईजान, सुल्तान, दिल्ली 6, पीके, चांदनी, विक्की डोनर, बेवकूफियां का वर्णन था। इतना ही नहीं, दिल्ली पर्यटन ने दिल्ली में फिल्म शूटिंग के लिए एक मैन्यूल भी बनाया है। जिसमें राजधानी की 31 प्रकार के स्थानों का विवरण देते हुए यहां फिल्म बनाने के फायदों और सुविधाओं का विवरण है। शायद इसी का परिणाम था कि पिछले साल प्रदर्शित दो फिल्में "सुई धागाः मेड इन इंडिया" और "जलेबीः द ऐवरलास्टिंग टेल ऑफ लव" में दिल्ली की उल्लेखनीय उपस्थिति थी। इन फिल्मों में राजधानी के कुछ अनछुए पहलुओं पर रोशनी डाली गई।शाहजहांनाबाद के समय के बसे चांदनी चौक के छोटे-छोटे बाजारों, जो कि कटरा कहलाते हैं, की खास बात यह है, वहां मिलने वाले विशेष उत्पाद। फतेहपुरी का बाजार कपड़ों के लिए लोकप्रिय है, जहां के कटरे विभिन्न वस्त्रों की बिक्री के लिए जाने जाते हैं। यहां कपड़े की खरीद थोक में होती है। चांदनी चौक में सूती से लेकर जॉर्जेट, शिफॉन, और महीन कपड़ा मिलता है। जबकि किनारी बाजार अपने कपड़ों के लेस सहित दूसरे सजावटी सामान के लिए मशहूर है। यहां जरी और किनारी की सामग्री और डिजाइन बहुतायत मात्रा में उपलब्ध है।
वही, दिल्ली के रहने वाले पुष्पदीप भारद्धाज निर्देशित और वरुण मित्र और रिया चक्रवर्ती अभिनीत "जलेबी" फिल्म, जो कि एक प्रेम कहानी है, में पुरानी दिल्ली के दशकों पुराने कबूतरबाजी के शौक को दिखाया गया है। इसमें वरुण ने पुरानी दिल्ली की गलियों से सैलानियों को परिचित करवाने वाले एक व्यक्ति देव की भूमिका निभाई है। देव के मुख्य किरदार के बहाने राजधानी के खान-पान और गलियों के इतिहास को एक लड़की के प्यार भरी कहानी से पिरोते हुए पर्यटन के खांचे के इतर एक दूसरी ही दिल्ली को दिखाने की कोशिश है। वह बात अलग है कि यह फिल्म रेल के डिब्बे की खिड़की से युगल जोड़े के आलिंगन की तस्वीर के पोस्टर को लेकर भी चर्चा में रही थी। रिया चक्रवर्ती ने फिल्म की पुरानी दिल्ली में शूटिंग के दौरान जोश में इतनी जलेबियां खाई कि वह बाद में बीमार हो गईं।
लेखक-निर्देशक शरत कटारिया की वरुण धवन और अनुष्का शर्मा अभिनीत फिल्म सुई धागा की शूटिंग गाजियाबाद जिले के मोदी नगर में हुई। वही राजधानी में कपड़े के थोक बाजार चांदनी चौक सहित कनाॅट प्लेस से सटे शंकर मार्किट में भी इसके दृश्य फिल्माए गए। उल्लेखनीय है कि इस फिल्म में वरुण ने मौजी नामक एक दर्जी और उसकी पत्नी ममता के किरदार में अनुष्का ने एक कढ़ाई करने वाली महिला की भूमिका की है। इस फिल्म के लिए निर्माता ने शंकर मार्किट में एक दुकान किराए ली थी और फिल्म की कहानी के अनुरूप दुकान के भीतर लकड़ी का काम करवाया था। इतना ही नहीं, शूटिंग के लिहाज से दुकान के बाहर गलियारों के कुछ खंभों की भी दोबारा पुताई की गईं।
उल्लेखनीय है कि दिल्ली के सबसे पुराने बाजारों में से एक चांदनी चौक कढ़ाई में काम आने वाली विभिन्न प्रकार के कच्चे माल का सबसे अच्छा ठिकाना है। जो कि दूसरे शहरों में आसानी से उपलब्ध नहीं हो पाता है। चांदनी चौक में मिलने वाले सामान में जरी, चिकन और रेशम की साड़ियाँ भी शामिल हैं। इस फिल्म की कहानी के मुख्य पात्रों के दर्जी होने और इस व्यवसाय से जुड़े होने के कारण फिल्म की शूटिंग के लिए चांदनी चौक से बेहतर कोई विकल्प संभव ही नहीं था।
Monday, September 17, 2018
cinema of delhi_दिल्ली का सिनेमा
दिल्ली में हुए तीसरे अंग्रेजी दरबार (वर्ष 1911) में ब्रिटिश भारत की राजधानी कलकत्ता से दिल्ली होने की बात तय हुई। इसके साथ ही नई राजधानी के निर्माण और प्रबंधन के लिए अंग्रेज अफसर, बाबू और सैनिक दिल्ली पहुंचने लगे। राजधानी में इस नए अंग्रेजी समाज के मनोरंजन के लिए थिएटर बने। मूक फिल्मों के उस दौर में थिएटरों में विशेष रूप से अंग्रेज दर्शकों के लिए हाॅलीवुड फिल्में दिखाई जाती थी।
यह बात कम जानी है कि 1925 में दिल्ली के वकीलों, जज सहित दूसरे पेशेवरों ने बाॅम्बे टाकीज के हिमांशु राॅय को बुद्ध के जीवन पर आधारित "लाइट आॅफ एशिया" फिल्म के निर्माण में पैसे से सहायता की थी। इसी काम के लिए ग्रेट ईस्टर्न फिल्म नामक एक बैकिंग काॅरपोरेशन बनाया। उल्लेखनीय है कि यह काॅरपोरेशन जर्मनी के इमेल्का स्टुडियो के साथ "लाइट आॅफ एशिया" का सह निर्माता था। एडविन अर्नोल्ड की कविता “द लाइट ऑफ एशिया” से प्रेरित और निरंजन पाल की पटकथा वाली इस फिल्म में गौतम बुद्व की भूमिका हिमांशु रॉय ने निभाई थी। जर्मन निर्माता पीटर ओस्टरमावेर और सह निर्देशक फ्रैंज ऑस्टीन वाली यह पहली बहुप्रचारित भारतीय फिल्म थी जो कि मध्य यूरोप में सफल रही।
हिंदी की पहली बोलती फिल्म "आलम आरा" का प्रदर्शन 1931 में हुआ। राजधानी में यह "एक्सेलसियर" में दिखाई गई। सवाक फिल्मों के साथ ही यहां सिनेमाई दर्शकों में इजाफा हुआ तो दिल्ली उत्तरी भारत के एक महत्वपूर्ण फिल्म वितरण केंद्र के रूप में स्थापित हुई। गानों और संवादों वाली सवाक फिल्मों की दौर के साथ थिएटरों में नियमित रूप से श्वेत-श्याम फिल्मों के शो होने लगे।
तब जमाने की बदलती चाल के साथ नाम भी बदले। यही कारण था कि अब दिल्ली में सिनेमाहाॅलों को टॉकीज कहा जाने लगा। इसी चलन के मारे कई हॉलों ने अपने नाम के आगे टाॅकीज लगा लिया जैसे मोती टॉकीज, कुमार टॉकीज, रॉबिन टॉकीज। एक तरह से कहा जा सकता है कि आज के मल्टीप्लेक्स की तर्ज पर उस समय किसी भी थिएटर के नाम के आगे टाकीज होना फैशनेबल और आधुनिकता की निशानी था।
दिल्ली में सबसे पुराने सिनेमा हॉल चांदनी चौक में थे, जो कि 1920-30 के दशक तक पुराने थे। नए सिनेमाहाॅल कनॉट प्लेस में बने थे। जबकि चांदनी चौक और कनाट प्लेस में पहाड़गंज के दो ऐतिहासिक हाॅल थे-इंपीरियल और खन्ना। खन्ना की उम्र तो पुरानी दिल्ली के टॉकीज से भी पुरानी है। तब भी हरेक हॉल की अपनी वफादार दर्शकों की भीड़ थी। एक ओर मुस्लिम समुदाय जामा मस्जिद के पास जगत को पसंद करता था हिंदू दर्शक चांदनी चौक के मोती के मुरीद थे।
सवाक फिल्मों में भाग्य चमकाने के लिए युवा कलाकारों के दिल्ली घराने के उस्तादों तालीम लेने की रफ्तार बढ़ी। तानरस खां ने दिल्ली घराने को स्थापित किया था। यह घराना ख्यालों की कलापूर्ण बंदिशों, तानों का निराले ढंग और द्रुतलय में बोल तानों का प्रयोग के लिए मशहूर था। मल्लिका पुखराज भी तीस के दशक में गायन सीखने राजधानी आई। उस दौर की तीन प्रसिद्व गजल गाने वाली मल्लिका पुखराज, फरीदा खानम और इकबाल बानो दिल्ली घराने की ही थी। जो कि देश के बंटवारे के बाद में पाकिस्तान चली गयी।
तब की सवाक हिंदी फिल्मों के संवाद उर्दू में होते थे तो गाने फिल्म के हिट होने का आधार। तब ऐतिहासिक फिल्मों के चलन के कारण फिल्म निर्माताओं में दिल्ली की पुरानी इमारतों और ऐतिहासिक स्मारकों को लेकर खासा लगाव था। यह बात उस दौर में ऐतिहासिक दिल्ली के कथानकों पर आधारित "हुमायूं", "शाहजहां", "बाबर", "चांदनी चौक", "नई दिल्ली", "रजिया सुल्तान", "मिर्जा गालिब" और "1857" नामक फिल्मों से साबित होती है।
Monday, April 30, 2018
Cinema of Old Delhi_पुराने दौर की दिल्ली के सिनेमा
देश की आज़ादी से पहले ही पुरानी दिल्ली के इलाका बड़े स्तर पर वाणिज्यिक स्वरूप, जिसके लिए आज यह क्षेत्र प्रसिद्व है, के अलावा मसालों, कपड़ा, सूखे फल, जवाहरात और इलेक्ट्रॉनिक सामानों के थोक-खुदरा व्यापार का केंद्र था। इतना ही नहीं, उस समय शहर में आबादी की अच्छी खासी बसावट थी। सिविल लाइन के करीब कुलीन पड़ोस राजपुर रोड में फिल्म व्यापार से जुड़े अनेक लोग रहते थे। आज भी राजपुर रोड पर गए जमाने के मशहूर हिंदी अभिनेता राजेश खन्ना के परिवार के पुराने मकान, जिनमें से कुछ का नवीनीकरण हो चुका है, देखे जा सकते हैं।
तब पुरानी दिल्ली में लगभग सात-आठ सिनेमा घर थे। उन्हें लोग बायोस्कोप कहते थे। जबकि समाज के सर्वहारा तबके के सदस्य उन्हें मंडवा के नाम से पुकारते थे। किसी कारण विशेष से पुराने सिनेमा घरों में से शायद ही किसी को कभी उनके उसही नाम से जाना जाता था-रिट्ज, नाॅवल्टी या कुमार टॉकीज। इसकी बजाय, वे सभी सिनेमा घर, उस क्षेत्र विशेष की भौगोलिक स्थिति के नाम से जाने जाते थे जहां वे स्थित थे। इसी कारण से कुमार टॉकीज पत्थरवाला था और जगत मछलीवाला।
दूसरे विश्व युद्ध खासकर देश विभाजन के बाद पुरानी दिल्ली में सिनेमा दर्शकों की संख्या में वास्तविक बढ़ोत्तरी हुई। ऐसा बड़े पैमाने पर आबादी के महजबी आधार पर अदलाबदली के कारण हुआ। यह वह समय था जब मोती और कुमार थिएटर मोती टाॅकीज और कुमार टाॅकीज बने। यह सिलसिला पुरानी दिल्ली के चांदनी चौक और जामा मस्जिद के पुराने इलाकों से शुरू हुआ और धीरे-धीरे कनॉट प्लेस तक फैल गया।
उस दौर में मोती और जगत सिनेमाघरों में प्रभात टॉकीज, बॉम्बे टॉकीज और न्यू थिएटर की अच्छी हिंदी फिल्में लगती थी। जबकि 1950 के दशक में राज कपूर, बिमल रॉय, महबूब और गुरु दत्त जैसे प्रतिष्ठित फिल्म निर्माताओं की फिल्में लगना शुरू हुई। तक के जमाने में मोती अधिक आधुनिक माना जाता था, जहां समाज के सभी वर्गों के दर्शक आते थे। 1970 के मध्य तक यहां सुबह के शो में अंग्रेजी फिल्में दिखाई जाती थी। जबकि दूसरी तरफ, जगत के मछली बाजार और मुर्गा बाजार के नजदीक होने के कारण उसे पुराने शहर की गरीब बसावट वाली जनता के मनोरंजन केंद्र के रूप में देखा जाता था।
इन थिएटरों की अपनी स्थानीय दर्शकों की वफादार फौज थी। तब के प्रारंभिक दौर में सिनेमा हॉल अपने फिल्म व्यापार के लिए स्थानीय दर्शकों पर निर्भर थे। "दिल्ली फोर शोज, टाॅकीज आॅफ यसटरईयर किताब" में जिया उस सलाम बताते हैं कि जहां मुसलमान जामा मस्जिद के पास जगत में जाना पसंद करते थे तो वहीं हिंदुओं का पसंदीदा मोती था। रिट्ज और मिनर्वा में महिला दर्शकों की सुविधा के लिए अलग से बाॅक्स बने हुए थे, जहां बुर्कानशीन मुस्लिम महिलाएं, गैरों की नजरों से दूर सुकून से सिनेमा के जादू का आनंद लेती थी।
तब फिल्मों के विज्ञापन का प्रचार, पहियों वाली गाड़ी पर लगे होर्डिंग से होता था, जिसे दो आदमी धक्का देकर चांदनी चौक, खारी बावली, उर्दू बाजार, नई सड़क, दरीबा, मटिया महल और हौज काजी की व्यस्त सड़कों पर घूमते थे। "दिल्ली द फर्स्ट सिटी" पुस्तक में सतीश जैकब लिखते हैं कि उन दिनों में अज्ञातकुलशील एम.एफ. हुसैन एस्प्लानेड रोड पर फिल्म की होर्डिंग को उकेरते देखे जा सकते थे। उसी समय में ग्रामोफोन प्लेयर और रेडियो की शुरूआत हुई थी। तब सबसे पहले काले रंग की भारी डिस्क देखने वालों ने उसे तवा का नाम दिया और यही नाम उससे चिपक गया।
Sunday, December 11, 2016
Cinematic History of Delhi
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10/12/2016, दैनिक जागरण |
दिल्ली में सिनेमा का इतिहास
दिल्ली और सिनेमा का संबंध सन् 1911 में अंग्रेज राजा जॉर्ज पंचम के अपनी राजधानी को कलकत्ता से दिल्ली स्थानांतरित करने की घोषणा जितना ही पुराना है। अंग्रेजों की राजधानी बनने के बाद नई दिल्ली में मूक फिल्मों के दौर (1913-31) में थिएटर बने, जहां पर खासतौर पर अंग्रेज दर्शकों लिए हॉलीवुड फिल्में दिखाई जाने लगी।
सन् 1925 के करीब बॉम्बे टाकीज के संस्थापक हिमांशु रॉय ने पहली बार विदेशी दर्शकों के लिए गौतम बुद्ध के जीवन पर “लाइट ऑफ एशिया” नामक फिल्म बनाने की कोशिश की। उन्होंने दो साल तक फिल्म के लिए जरूरी पैसों को जुटाने के प्रयास में अंग्रेज सरकार, भारतीय राजाओं से लेकर मंदिरों तक संपर्क किया पर नतीजे में कुछ हासिल नहीं हुआ।
आखिरकार दिल्ली के वकील, जज और दूसरे पेशेवरों ने फिल्म निर्माण में मदद के लिए ग्रेट ईस्टर्न फिल्म कार्पोरेशन नामक एक बैकिंग कार्पोरेशन बनाया। इस कार्पोरेशन ने जर्मनी के इमेल्का स्टुडियो के साथ मिलकर फिल्म का सह निर्माण किया। एडविन अर्नोल्ड की कविता “द लाइट ऑफ एशिया” की कविता से प्रेरित और निरंजन पाल की पटकथा वाली इस फिल्म में गौतम बुद्व की भूमिका हिमांशु रॉय ने निभाई।
वर्ष 1931 में हिंदी की पहली बोलती फिल्म “आलम आरा” प्रदर्शित हुई। दिल्ली में इसका प्रदर्शन एक्सेलसियर थिएटर में हुआ। इसके साथ ही दिल्ली में सिनेमा के दर्शकों की संख्या बढ़ी तो वहीं दिल्ली उत्तर भारत में फिल्मों के एक महत्वपूर्ण वितरण केंद्र के रूप में उभरी।
भारत से मूक फिल्मों की विदाई और गानों और संवादों से युक्त श्वेत-श्याम फिल्मों की दौर के साथ अधिकतर थिएटरों ने नियमित रूप से फिल्में दिखाना शुरू कर दिया। दिल्ली में तेजी से बढ़े हॉलों को टॉकीज कहा जाता था, और कई हॉलों अपने नाम के आगे टॉकीज लगा लिया। जैसे मोती टॉकीज, कुमार टॉकीज, रॉबिन टॉकीज। तब किसी भी थिएटर के नाम के आगे टाकीज होना फ़ैशनेबल और आधुनिकता की निशानी था।
सन् 1932 में हिंदी की प्रथम साप्ताहिक फिल्मी पत्रिका “रंगभूमि” का प्रकाशन पुरानी दिल्ली के कूचा घासीराम से हुआ। इसके प्रकाशक, त्रिभुवन नारायण बहल, संपादक नोतन चंद और लेखराम थे। जबकि सन् 1934 में ऋषभचरण जैन ने दिल्ली से “चित्रपट” नामक एक फिल्म पत्र निकला। तब इसका वार्षिक चंदा सात रूपए तथा एक प्रति का मूल्य दो आने था। जैन की प्रेमचंद, जैनेंद्र कुमार तथा चतुरसेन शास्त्री जैसे हिंदी के प्रसिद्व कथा-लेखकों से मैत्री होने के कारण चित्रपट में अनेक प्रसिद्व लेखकों की रचनाएं छपती थीं।
भारत में बोलती फिल्मों के निर्माण में तेजी आने के साथ ही अपनी किस्मत आजमाने के इरादे से युवा कलाकार संगीत के प्रसिद्ध दिल्ली घराने के उस्तादों से सीखने के लिए राजधानी आने लगे। मुगल सल्तनत के पतन के बाद तानरस खां ने दिल्ली घराने को स्थापित किया। ख्यालों की कलापूर्ण बंदिशे, तानों का निराला ढंग और द्रुतलय में बोल तानों का प्रयोग इस घराने की विशेषताएं हैं। यह अनायास नहीं है कि मल्लिका पुखराज, फरीदा खानम और इकबाल बानो तीनों पाकिस्तानी गजल गायिकाएं दिल्ली घराने से ही संबंध रखती है।
हिंदी फिल्मों के उस दौर में संवाद उर्दू में ही होते थे तो गाने फिल्म का एक महत्वपूर्ण हिस्सा होते थे। उस समय ऐतिहासिक फिल्मों की लोकप्रियता की वजह से निर्माता दिल्ली की मुगलकालीन भवनों और स्मारकों के प्रति खींचे चले आते थे। शायद इसी वजह से ऐतिहासिक दिल्ली से जुड़ी "चांदनी चौक", "नई दिल्ली", "हुमायूं", "शाहजहां", "बाबर", "रजिया सुल्तान", "मिर्जा गालिब" और "1857" के नाम से फिल्मे बनीं।
Friday, October 2, 2015
Delhi_Film connection_दिल्ली और हिन्दी फिल्मों का संबंध

देश में आरंभ से ही हिंदी फिल्मों का दूसरा मतलब बंबई और अब मुंबई रहा है और इसका सबसे बड़ा प्रमाण हाॅलीवुड की नकल पर बालीवुड का नाम रहा है। ऐतिहासिक कारणों से हिंदी फिल्मों के निर्माण से लेकर कथानक तक में बंबई का वर्चस्व रहा। सन् 1947 में देश को आजादी मिलने के बाद राजनीतिक गतिविधियों का केंद्र बनने की वजह से फिल्मकारों का ध्यान दिल्ली की ओर खींचा।
1950 के दशक के उत्तरार्ध से फिल्म निर्माताओं ने मुंबई के विकल्प के रूप में दिल्ली की ओर ध्यान देना शुरू कर दिया था और समय के साथ यह संबंध और मजबूत हुआ है और तब से लेकर अब तक छह दशकों में व्यावहारिक रूप से दिल्ली एक वैकल्पिक स्थान के रूप में उभरकर सामने आई है। तब से आकर्षण का यह सिलसिला आज तक न केवल कायम है बल्कि पहले से मजबूत हुआ है।
50 के दशक में लोकप्रिय हिंदी सिनेमा ने बंबई की स्थानीयता की छाया से निकलते हुए अब दिल्ली दूर नहीं (1957), जौहर महमूद इन गोवा (1965), लव इन टोक्यो (1966) और एन इवनिंग इन पेरिस (1967) जैसी फिल्में बनाईं।
सन् 1957 में बनी विजय आनंद की ”नौ दो ग्यारह“, दिल्ली से जुड़ी शुरूआती फिल्मों में से एक थी। इस फिल्म में किशोर कुमार का गाया और देवानंद पर फिल्माया गाना ”हम है राही प्यार के“ में राजधानी के पुराना किला रोड, राजपथ और इंडिया गेट दिखता है। इस गाने को मजरूह सुल्तानपुरी ने लिखा था और संगीत दिया था सचिन देव बर्मन ने।
इसी साल राज कपूर की बनाई फिल्म ”अब दिल्ली दूर नहीं“ रिलीज हुई, जिसकी कहानी भी दिल्ली शहर से जुड़ी हुई थी। इस फिल्म में एक नौजवान दिल्ली जाकर प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से मिलकर हत्या के आरोपी अपने निर्दोष पिता को छुड़वाने के लिए हस्तक्षेप का आग्रह करने का इरादा करता है। सन् 1963 में विजय आनंद ने ”तेरे घर के सामने“ फिल्म बनाई। इस फिल्म में देवानंद एक भवन वास्तुकार की भूमिका में थे, जिसे अनजाने में अपने पिता के कट्टर प्रतिद्वंद्वी की बेटी (नूतन) से प्यार हो जाता है। पूरी तरह दिल्ली में फिल्माई गई इस फिल्म का गाना ”एक घर बनाऊंगा, तेरे घर के सामने“ में राजधानी के आरंभिक फैलाव की झलक देखने को मिलती है, जब दक्षिणी दिल्ली में डिफेंस काॅलोनी बस रही थी। इसी फिल्म का एक और मशहूर गाने दिल का भंवर करें पुकार का तो फिल्मांकन ही दिल्ली की प्रसिद्व कुतुब मीनार के परिसर में हुआ था। इस फिल्म से राजधानी में हिंदी फिल्मों के गानोें के फिल्मांकन ने मानो गति पकड़ ली और शायद इसी का नतीजा था कि यश चोपड़ा ने अपनी फिल्मों ”वक्त“ (1965) और बाद में ”त्रिशूल“ (1977) के गानों को दिल्ली में फिल्माया।
”तेरे घर के सामने“ की तरह नासिर हुसैन की फिल्म ”फिर वही दिल लाया हूं“ (1963) का कुछ हिस्सा भी दिल्ली में फिल्माया गया था। इस समय तक फिल्म निर्माताओं को दिल्ली भाने लगी थी और फिल्म के कुछ हिस्से या गाने के लिए एक विकल्प से अधिक राजधानी पूरी एक कहानी के लिए मुफीद बनने लगी थी। ऐसे ही 1970 के दशक में आई फिल्म ”रोटी, कपड़ा और मकान“ (1974) में दिल्ली का मुखर उपस्थिति स्पष्ट थी।
दिलचस्प बात यह है कि हिंदी फिल्मों में शूटिंग के लिए एक लोकप्रिय स्थान के रूप में दिल्ली को नए सिरे से स्थापित करने का काम अपने बड़े बजट की फिल्मों विदेशी स्थानों में शूटिंग करने के लिए मशहूर यश चोपड़ा ने किया। यश चोपड़ा की निर्देशित त्रिशूल में फिल्म में भूमि-भवन निर्माता आर के गुप्ता (संजीव कुमार) और उसके परित्यक्त-नाजायज बेटे विजय (अमिताभ बच्चन) की कहानी में राजधानी का फैलता शहरी जनजीवन और सटे हुए उपनगरों जैसे फरीदाबाद और गुड़गांव के उभरने की बात पृष्ठभूमि में साफ झलकती है। फिल्म की बाप-बेटों के आपसी और पारिवारिक संघर्ष की कहानी के साथ लोधी गार्डन, गोल्फ क्लब, जिमखाना, सरकारी कार्यालयों, प्रगति मैदान और अशोक होटल का जुड़ाव सहज रूप से स्थानिकता को एक प्रमाणिकता प्रदान करता है। इसी तरह, यश चोपड़ा की एक और यादगार फिल्म ”सिलसिला“ (1980) में अमिताभ बच्चन, रेखा जया भादुड़ी और जया भादुड़ी के प्रेम-विवाह के त्रिकोण की झंझावात वाली कहानी में तब के सरकारी कुतुब होटल और लोधी गार्डन की दृश्यों में दिल्ली की उपस्थिति साफ नजर आती है।
सईं परांजपे की फिल्म ”चश्मे बद्दूर“ (1981) में दिल्ली की बुनावट की छाप ऐसी थी कि वह दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्रों (फारुख शेख, राकेश बेदी, रवि बासवानी), बरसाती की जिंदगी, पड़ोस में रहने वाली लड़की मिस चमको यानी दीप्ति नवल सहित दिल अजीज लल्लन मियां पान वाले सईद जाफरी से लेकर राजधानी की तब की सड़कों पर मोटर साइकिल सवारी का दौड़ाना हो या पुराना किला की झील में नौका विहार सब उसमे गहरे से रंगे नजर आते हैं। इन सबमें महत्वपूर्ण बात यह है कि इस फिल्म में पहली बार दिल्ली के सिनेमाई चित्रण के हस्ताक्षर माने जाने वाले इंडिया गेट से राजपथ के रास्ते से इतर का जीवन दिखता है। इतना लंबा समय बीत जाने के बाद भी फिल्मांकन और सहज पटकथा लेखन वाली यह फिल्म आज भी बेजोड़ है।
80 के दशक में आई ”नई दिल्ली टाइम्स“ जैसी फिल्म (1986) देश की राजधानी में एक हत्या के मामले में कुछ नेताओं और पत्रकारों की मिलीभगत की पेचीदगी को उजागर करती थी।
पिछले डेढ़ दशक में दिल्ली पर आधारित फिल्मों की संख्या में आशातीत वृद्धि हुई है और सबसे बड़ी बात यह है कि इन फिल्मों में से अधिकतर न केवल दिल्ली से जुड़ी हुई है बल्कि अपनी कहानी में शहर की बुनावट को एक अभिन्न अंग के रूप में उपयोग करती हुई आगे बढ़ती है, जिससे दिल्ली का सम्मोहन और अधिक मारक हो जाता है। दिल्ली ने फिल्मों के लिए भू-आकृतियों में परिवर्तन के साथ उसके दृश्यात्मक विवेचना का भी स्वरूप बदला है।
90 के दशक के बाद से ही फिल्म की शूटिंग के लिए एक स्थान के रूप में दिल्ली का महत्व साफ तौर पर बढ़ा है। यह बात दिल्ली को केवल फिल्म की शूटिंग के लिए एक स्थान से बढ़कर कथानक में पिरोने का काम करने वाली चंद फिल्मों 1947-अर्थ (1998), दिल से (1998), सरफरोश (1999), मानसून वेडिंग (2001), यादें (2001), मुझे कुछ कहना है (2001), फना (2006), खोसला का घोसला (2006), ओए लकी! लकी ओए! (2008), देव डी (2009), लव आज कल (2009), दिल्ली-6 (2009), पीपली लाइव, (2010), बैंड बाजा बारात (2010), दो दूनी चार (2010), आयशा (2010 ), रॉकस्टार (2011), नो वन कील्ड जेसिका (2011), विकी डोनर (2012), रांझणा (2013) और तनु वेड्स मनु रिटर्नंस (2015) से साफ होता है। इतना ही नहीं फिल्म लक्ष्य (2004) में कहानी के पात्रों का पुरानी दिल्ली, यमुना पार की दिल्ली या लुटियंस दिल्ली के पुराने और घिसे पिटे दृश्यों से इतर जाकर अपनी संवाद अदायगी में इंडिया इंटरनेशनल सेंटर का नाम लेना और फिल्म का दिल्ली छावनी के सैन्य अस्पताल में खत्म होने के दृश्य के फिल्मांकन से लेकर डेल्ही बेली (2011) और फुकरे (2013) की प्रति संस्कृति को विषय बनाया गया है।
फिल्म निर्माताओं की नई पीढ़ी में भी दिल्ली का सदाबहार आकर्षण बरकरार है। अतुल सभरवाल की फिल्म औरंगजेब (2013) में कहानी गुड़गांव और भू-माफिया पर केंद्रित है तो नवदीप सिंह की एनएच-10 (2015) एक सनसनीखेज थ्रिलर है जो कि गुड़गांव से सटे क्षेत्रों में प्रचलित कथित जातिवादी सम्मान-इज्जत को बचाने के लिए की जाने वाली हत्याओं, जिसमें खाप पंचायतों के वर्चस्व की लड़ाई की अपनी भूमिका है, के अपराध की जड़ों को खंगालने का काम करती है। जबकि वर्ष 2008 में नोएडा में हुए आरूषि-हेमराज के दोहरी हत्याकांड की पड़ताल पर आधारित मेघना गुलजार की प्रस्तावित फिल्म नोएडा जिसका नाम अब बदलकर तलवार रख दिया गया है, अब सिनेमाघरों में प्रदर्शन के लिए तैयार है।
Thursday, October 16, 2014
Delhi and Cinema (दिल्ली और सिनेमा का अटूट रिश्ता)
दिल्ली से सिनेमा का संबंध मूक फिल्मों के दौर जितना पुराना है। सन् 1911 में अंग्रेजों के अपनी राजधानी को कलकत्ता से दिल्ली स्थानांतरित करने के साथ ही यहाँ अनेक सिनेमाघर खुलें जो कि दिल्ली में बढ़ती अंग्रेजों की आबादी के लिए हाॅलीवुड की फिल्में दिखाते थे।उसके बाद भारतीय फिल्मों की षुरूआत के साथ यहां फिल्मी दर्शकों का एक बाजार तैयार था। ऐसे में, दिल्ली उत्तर भारत में इन फिल्मों का एक बड़े वितरण केंद्र के रूप में उभरी।सन् 1925 के करीब बाॅम्बे टाकीज के संस्थापक हिमांशु राॅय ने अंतरराष्ट्रीय बाजार के लिए गौतम बुद्ध के जीवन पर आधारित "लाइट आॅफ एशिया" नामक फिल्म के निर्माण का अपना अभिनव प्रयास शुरू किया।
हिमांशु राॅय ने इस फिल्म के लिए आवश्यक वित्तीय साधन जुटाने के लिए दो साल कड़ी मेहनत की और इस दौरान अंग्रेज सरकार, भारतीय राजे रजवाड़ों से लेकर मंदिर के ट्रस्टों तक को संपर्क किया पर उन्हें अपेक्षित सफलता नहीं मिली। अंत में, दिल्ली के स्थानीय वकीलों, जजों और अन्य पेशेवरों ने राॅय की फिल्म परियोजना के लिए धन जुटाने के उद्देश्य से एक बैकिंग काॅरपोरेशन की स्थापना की।
देश में फिल्मों के प्रादुर्भाव के साथ ही नवोदित युवा कलाकार प्रसिद्ध दिल्ली घराने के उस्तादों (शिक्षकों) से संगीत और नृत्य सीखने के लिहाज से दिल्ली आने लगे। तीस के दशक के आरंभ में मल्लिका पुखराज नृत्य सीखने दिल्ली आई। उल्लेखनीय है कि उस दौर की हिंदी फिल्मों में संवाद के स्तर पर उर्दू का ही बोलबाला था और गीत हर फिल्म का अभिन्न और महत्वपूर्ण हिस्सा होते थे।
लंबे समय तक फिल्मी दुनिया में ऐतिहासिक फिल्मों का दबदबा होने के कारण "मुगल भारत" एक पसंदीदा विषय था और दिल्ली में शानदार मुगलिया इमारतों और स्मारकों के कारण फिल्म निर्माता दिल्ली में फिल्म के दृश्यों के फिल्मांकन के लिए आकर्षित रहते थे। हाल यह था कि दिल्ली के ऐतिहासिक मुख्य बाजार "चांदनी चौक" और "नई दिल्ली" के नाम ही फिल्मों का निर्माण हुआ। इसी तरह, ऐतिहासिक शहर दिल्ली से जुड़ी अन्य फिल्में भी बनीं, जिनमें 'हुमायूं', 'शाहजहां', 'बाबर', 'रजिया सुल्तान', 'मिर्जा गालिब' और '1857' प्रमुख हैं।
इतना ही नहीं, दिल्ली ने फिल्मी दुनिया को युवा प्रतिभावान कलाकार भी दिए। इनमें सर्वप्रमुख, शमशाद बेगम की बेटी नसीम बानो थी। सन् 1920 से लेकर 30 के दशक तक दिल्ली के मनोरंजन जगत में गायिका नसीम बानो का एकछत्र साम्राज्य था। ऐतिहासिक फिल्मों के सर्वकालिक निर्माता-निर्देशक सोहराब मोदी की क्लासिक फिल्म 'पुकार' में नूरजहां की यादगार भूमिका निभाने के साथ ही निहायत खूबसूरत और दिलकश नसीम बानो एक चमकता सितारा बन गई। इसी तरह से, 1940 के दशक के सितारा अभिनेता मोतीलाल भी दिल्ली के रहने वाले थे, जिन्होंने फिल्मी दुनिया में शोहरत की बुंलदियों को छुआ। सदाबहार पार्श्व गायक मुकेश भी दिल्ली के ही बाशिंदे थे, जिनके गाए सदाबहार गीत आज भी आम जनता की जुबान पर हैें।हिंदी फिल्म दुनिया, संगीत के क्षेत्र में भी दिल्ली की ऋणी है। कव्वाली के जन्मदाता अमीर खुसरो की कर्मभूमि भी दिल्ली ही थी। दिल्ली संगीत घराने की देन ठुमरी, दादरा और गजल भी हिंदी फिल्मों का अटूट हिस्सा बनी।दिल्ली के दरबारियों के यहां आयोजित होने वाले मुजरा कार्यक्रमों के सजीव किस्सो ने अनेक फिल्म निर्माताओं को प्रसिद्ध गायकों और नृतकों के जीवन पर आधारित फिल्मों के निर्माण के लिए प्रेरित किया। इसी का नतीजा था कि फिल्मों में लोकप्रिय मुजरा दृश्यों को समाहित किया गया, जिसमें नृतकियां अपने शानदार लिबास, मधुर गायन और सम्मोहक नृत्य से देखने वालों को मंत्रमुग्ध कर देती थी।
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