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Thursday, October 15, 2020

Check on chinese propoganda_1962_1962_लगाई थी, चीन के दुष्प्रचार पर लगाम




भारत सरकार ने आज के दिन 58 वर्ष पूर्व चीन से संबंधित आठ पुस्तकें, एक पर्चा और एक मानचित्र को गैर कानूनी घोषित कर दिया था।

15 अक्तूबर 1962 को ऐसा निर्णय इसलिए लिया गया क्योंकि ये सभी "भारत की क्षेत्रीय अखंडता और सीमाओं को संदिग्ध बनाते हुए देश की रक्षा और सुरक्षा के हितों के प्रति पूर्वाग्रहपूर्ण होने की संभावना उत्पन्न" करते थे।


इन प्रकाशनों में 'सिंपल ज्योग्राफी ऑफ़ चाइना', 'ग्लिमसेंज ऑफ़ चाइना', 'चीन-भारत सीमा प्रश्न के दस्तावेज', 'वेन सर्फस् स्टूड अप इन तिब्बत', 'विदर इंडिया-चाइन रिलेशन्स?', 'चित्रों में चीन के मुख्य पर्यटन नगर', 'चीन की राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था की पहली पंचवर्षीय योजना', 'अपसर्ज आफ चाइना', 'विक्टरी फार द फाइव प्रिंसिपल्स' और शिकागो की कंपनी ए. जे. नैस्ट्रोम के प्रकाशित मानचित्र शामिल थे। तब आपराधिक कानून अधिनियम, 1961 के तहत जारी आदेश के विषय में सभी राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों को इन प्रकाशनों के बारे में सूचित किया गया। भारत सरकार ने इन प्रकाशनों की समस्त प्रतियों सहित इनके पुर्नमुद्रित, अनुदित और चुनींदा अंशों के दस्तावेजों को भी जब्त कर लिया।


चीन के पेकिंग विदेशी भाषा प्रेस से प्रकाशित 'सिंपल ज्योग्राफी ऑफ़ चाइना' पुस्तक में मुद्रित मानचित्रों में पूर्वी लद्दाख के बड़े हिस्से (अक्साई चिन), पंजाब और उत्तर प्रदेश के भागों सहित समूचे नेफा (आज का अरूणाचल प्रदेश) को चीन के हिस्से के रूप में प्रदर्शित किया गया था। वर्ष 1958 में छपी 'ग्लिम्पसेज ऑफ चाइना' में, जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तर प्रदेश के हिस्सों सहित समूचे नेफा को चीन का भाग दिखाया गया था। जबकि वर्ष 1960 में प्रकाशित 'चीन-भारत सीमा के सवाल पर दस्तावेज' में भी इन इलाकों को गलत तरीके से चीन का भाग चित्रित किया गया था। अना लुइस स्ट्राग की लिखी 'वेन सर्फस् स्टूड अप इन तिब्बत' पुस्तक में पूर्वी लद्दाख के विशाल भाग सहित पूरे नेफा को चीन का हिस्सा बताया गया था। मैकमोहन लाइन को भारत की वैध अंतरराष्ट्रीय सीमा के रूप में संदिग्ध बताने की नीयत से आंकड़ों के साथ हेराफेरी की गई थी। जबकि कोलंबो से छपी 'विदर इंडिया-चाइन रिलेशन्स?' पुस्तक में जम्मू-कश्मीर के चीन अधिकृत भाग को परंपरागत रूप से चीन का हिस्सा और मैकमोहन लाइन को अवैध बताया गया था। 


उल्लेखनीय है कि वर्ष 1914 के शिमला समझौते के तहत तत्कालीन ब्रिटिश विदेश सचिव-मुख्य वार्ताकार हेनरी मैकमोहन के अंग्रेज भारत के उत्तर पूर्वी क्षेत्र और तिब्बत के मध्य तय सीमांकन रेखा ही मैकमोहन रेखा मानी जाती है। इसकी कानूनी वैधता को लेकर चीन को गलत आपत्ति जताता रहा है।  

'चित्रों में चीन के मुख्य पर्यटन नगर' और 'चीन की राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था की पहली पंचवर्षीय योजना' शीर्षक वाली पुस्तकों में भी जम्मू-कश्मीर सहित समूचे नेफा को चीन का भाग प्रदर्शित किया गया था। हेवलेट जानसन की 'अपसर्ज आफ चाइना' (1961) के दो मानचित्रों में नेफा और चीन का हिस्सा और जम्मू-कश्मीर को भारत का भाग न बताने के कारण प्रतिबंधित किया गया। 'विक्टरी फार द फाइव प्रिंसिपल्स' शीर्षक वाले पर्चे में भी ऐसे ही गलत ढंग से नेफा और जम्मू-कश्मीर को और वर्ल्ड वाॅल मैप में समूचे नेफा को चीन का भाग प्रदर्शित किया गया था।


Saturday, October 19, 2019

Age old Indo_Soviet relationship_समय की धारा पर भारत-सोवियत संबंध

दैनिक जागरण, 19102019








यह एक कम जाना तथ्य है कि हिंदुस्तान ने आजादी मिलने के पहले ही सोवियत संघ के साथ राजनयिक संबंध कायम कर लिए थे। जबकि पहला सोवियत राजनयिक स्वतंत्र भारत में ही दिल्ली पहुंचा था। 13 अप्रैल 1947 को दोनों देशों के मध्य राजनियक संबंध स्थापित हुए थे। जबकि  नंवबर 1947 में दिल्ली पहुंचने वाले पहले सोवियत राजनयिक पावेल येर्जिन (1919-1992) थे। ऐसे में, यर्जिन के सामने सबसे बड़ी चुनौती तत्कालीन भारत सरकार की सहायता से सोवियत दूतावास के लिए एक उपयुक्त स्थान की तलाश था। यर्जिन के दिल्ली पहुंचने के अगले दिन ही प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने उन्हें मिलने के लिए आमंत्रित किया। इस बैठक में नेहरू ने सोवियत राजनयिक को बताया कि भारत सरकार ने सोवियत संघ के दूतावास के लिए त्रावणकोर हाउस का चयन किया।


उसके शीघ्र बाद ही किरील नोविकोव (1905-1983) को भारत में सोवियत राजदूत नियुक्त किया गया। इससे पहले, वर्ष 1939 में नोविकोव को सोवियत विदेश मंत्रालय में नियुक्त थे। वे लंदन स्थित सोवियत दूतावास में डीसीएम बने। जबकि वर्ष 1945 में हुए प्रसिद्ध याल्टा सम्मेलन के वे मुख्य आयोजक थे। लिवाडिया पैलेस (क्रीमिया) में इस आयोजन को समर्पित संग्रहालय में उनकी राजनयिक पोषाक प्रदर्शित है।

दिसंबर 1947 में दिल्ली पहुंचे नोविकोव को यह जानकर बेहद खुशी हुई कि त्रावणकोर हाउस सरीखी शानदार इमारत सोवियत दूतावास होगी। वर्ष 1953 तक नोविकोव भारत में तैनात रहे। वर्ष 1960 में सोवियत संघ दूतावास त्रावणकोर हाउस से स्थानांतरित होकर चाणक्यपुरी में एक नई इमारत में पहुंच गया। जबकि 1960-1964 यानि चार साल की अवधि में त्रावणकोर हाउस में सोवियत सेंटर फॉर साइंस एंड कल्चर बना रहा।

7 सितंबर 1946 को एक रेडियो प्रसारण में अंतरिम सरकार के उपाध्यक्ष के रूप में नेहरू ने सोवियत नागरिकों को भारत की शुभकामनाएं देते हुए इस बात की घोषणा कि “वे एशिया में हमारे पड़ोसी हैं और अनिवार्य रूप से हमें मिलकर अनेक साझा कार्यों का बीड़ा उठाना होगा और एक दूसरे के साथ मिलकर बहुत कुछ करना होगा। सोवियत नेताओं ने भी ऐसी भावनाओं के साथ पूरी तरह अपनी सम्मति जताई। इसका ही परिणाम था कि 13 अप्रैल 1947 को दोनों देशों ने राजनयिक संबंध स्थापित करने के निर्णय की घोषणा की। तब अंग्रेजों से भारतीय नेतृत्व के हाथों में सत्ता हस्तांतरण की वार्ता को लेकर अपनी आशंकाओं के बावजूद सोवियत संघ ने स्वतंत्रता पूर्व भारत के साथ राजनयिक संबंध स्थापित करने का फैसला लिया। एक तरह से, यह भारत में सोवियत संघ की गहरी रूचि का प्रतीक था। जो कि दोनों देशों के भविश्य के द्विपक्षीय संबंधों के विकास के लिए एक शुभंकर साबित हुआ।

15 अगस्त, 1947 को भारत की आजादी के बाद कुछ समय के लिए, भारत-सोवियत संबंधों में वह पहले वाली गर्मजोशी नहीं रही। यहां तक कि दोनों देशों में कुछ दूरियां भी बढ़ी। फिर भी उस समय संयुक्त राष्ट्र में भारत और सोवियत संघ उपनिवेशवाद और नस्लवाद के मुद्दों पर एकमत और साथ थे। उदाहरण के लिए, सोवियत संघ ने दक्षिण अफ्रीका में भारतीय मूल के लोगों की दुर्दशा और इंडोनेशियाई निवासियों के स्वतंत्रता संघर्ष की ओर ध्यान आकर्षित करने के भारत की कोशिशों का पुरजोर समर्थन किया। उसके शीघ्र बाद भारत की पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना को मान्यता और कोरियाई युद्ध की समाप्ति के लिए निरंतर प्रयासों ने सोवियत नेताओं को इस बात का भरोसा हुआ कि भारत पश्चिमी शक्तियों के दबावों को दरकिनार करते हुए वैश्विक मामलों में एक स्वतंत्र मार्ग का पक्षधर है। इससे भारत-सोवियत संबंधों में प्रगाढ़ता बढ़ी।

सोवियत संघ ने अब कश्मीर मुद्दे पर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की चर्चा में सक्रिय रुचि लेना शुरू किया और पूरी मजबूती से भारतीय पक्ष के समर्थन में खड़ा रहा। वर्ष 1952 में सुरक्षा परिषद में सोवियत प्रतिनिधि के भाषणों से यह बात साबित होती है। दिसंबर 1953 में पहले भारत-सोवियत व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर हुए। यह दोनों देशों के बीच व्यापार के विस्तार की एक महत्वाकांक्षी, पंचवर्षीय योजना पर आधारित था। जिससे भारत को कुछ ऐसे फायदे थे जो कि आमतौर पर पश्चिमी देशों के साथ होने वाले समान व्यापारिक समझौतों में नहीं होते थे। जैसे, दोनों देशों के बीच भारतीय रुपए में व्यापार होने की बात थी। इतना ही नहीं, आपसी व्यापार को बढ़ाने के अलावा भुगतान संतुलन को भी बनाए रखने के प्रयास किए गए। इस दौरान, परस्पर सांस्कृतिक संपर्क के बढ़ने का परिणाम दोनों देशों में विविध क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करने वाले व्यक्तियों की आपसी यात्राओं के रूप में सामने आया। 



Saturday, April 1, 2017

अंग्रेजी राज और देसी रियासतों का संबंध_British Empire and princely states

दैनिक जागरण 01042017


जब एड्विंस लुटियन और हरबर्ट बेकर ने अंग्रेजों की नयी राजधानी नई दिल्ली के डिजाइन करने पर काम शुरू किया, उस समय ब्रितानी भारत में करीब 600 रजवाड़े-रियासतें थीं। इन रियासतों के शासक दिखाने के लिए तो भारतीय राजा-महाराजा थे पर असली ताकत दरबारों में मौजूद अंग्रेज रेजिडेंट के हाथ में थी। अंग्रेज सरकार के इन प्रतिनिधियों के बिना रियासतों में कुछ नहीं होता था।


इन राजाओं को अंग्रेजी राज का स्वामिभक्त बनाए रखने के लिहाज से भारत सरकार अधिनियम 1919 को शाही स्वीकृति देने के बाद 23 दिसंबर 1919 को अंग्रेज सम्राट जॉर्ज पंचम ने चैंबर ऑफ प्रिंसेस की स्थापना की घोषणा की। इस नरेन्द्र मंडल के नाम से भी जाना जाता था। 8 फरवरी 1921 को दिल्ली में चैंबर की पहली बैठक हुई। इस अवसर पर लालकिले के 'दीवान-ए-आम' में आयोजित उद्घाटन समारोह में 'ड्यूक-ऑफ़-कनाट' ने अंग्रेज राजा के प्रतिनिधि के रूप में भाग लिया।

चैंबर ऑफ प्रिंसेस की आंरभिक बैठक में देसी रियासतों के 120 राजप्रमुख सदस्य थे। इनमें से 108 राजा अति महत्वपूर्ण राज्यों के थे जो स्वयं ही सदस्य थे। जबकि शेष 12 सीटों के लिए अन्य 127 रियासतों में से प्रतिनिधित्व था। जबकि 327 छोटी रियासतों का चैंबर में कोई प्रतिनिधित्व नहीं था। 



चैंबर ऑफ़ प्रिंसेस का मुख्य काम रियासतों-रजवाड़ों से जुड़े विभिन्न मामलों पर अंग्रेज वाइसराय को सलाह देना था। तत्कालीन वायसराय ने चैंबर के गठन के अवसर पर कहा था कि इसका मुख्य कार्य राज्यों को प्रभावित करने वाले या रजवाड़ों के समान विषय सहित ब्रितानी हुकूमत की भलाई के लिए जरूरी मामलों पर चर्चा करना है। वैसे भी, अंग्रेज सरकार ने प्रिंसेस के चैंबर की भूमिका कार्यकारी न रखकर सलाहकार के रूप में तय की थी। 



किसी समय में विभिन्न रियासतों के सुंदर वेशभूषाओं में सजे-धजे शासकों के भरा रहने वाले हॉल का उपयोग अब संसद में सांसदों के अध्ययन कक्ष के रूप में होता है। हर साल फरवरी या मार्च में चैंबर ऑफ प्रिंसेस की बैठक कांउसिल हाउस (आज का संसद भवन) के निर्दिष्ट हॉल में होती थी। बैठक के दौरान अपने दिल्ली प्रवास में राजा-महाराजा अपने राजधानी स्थित महलों में राजपरिवारों के सदस्यों और बड़े संख्या में नौकर-चाकरों के साथ ठहरते थे। इस दौरान सामाजिक जमावड़ों के साथ राजाओं के आपस में छोटे समूहों वाली पार्टियां धूमधाम और पूरे उत्साह के साथ आयोजित की जाती थी। राजा-महाराजा अंग्रेज वायसराय से भेंट करते थे तो इसी तर्ज पर वायसराय अपने यहां या दिल्ली जिमखाना क्लब में राजपरिवारों के लिए पार्टी देता था। ऐसी पार्टियों में खानदानी बावर्चियों का बनाया विशेष भोजन और पेय परोसे जाते थे। शाम को होने वाली पार्टियों में राजपरिवारों के सदस्य और सरकारी उच्च अधिकारी मेहमान होते थे। 



चैंबर ऑफ प्रिंसेस के गठन का एक सीधा परिणाम अंग्रेजों की नई राजधानी में राजा-महाराजाओं को स्थान देने के रूप में आया। आखिर चैंबर की बैठकों में हिस्सा लेने के लिए राजधानी आने पर दिल्ली में ठहरने के लिए जगह की जरूरत थी। इस जरुरत का परिणाम था, प्रिंसेस पार्क। आज के इंडिया गेट के आस-पास के क्षेत्र में महत्वपूर्ण रजवाड़ों के शासकों को महल बनाने के लिए आठ एकड़ आकार के 36 भूखंड पट्टे पर दिए गए। इस तरह, हैदराबाद, बड़ौदा,बीकानेर, पटियाला और जयपुर रियासतों को इंडिया गेट की छतरी के किंग्स वे (अब राजपथ) के चारों ओर स्थान आवंटित हुए। जबकि उनसे कम महत्व रखने वाले जैसलमेर, त्रावणकोर, धौलपुर और फरीदकोट के शासकों को केंद्रीय षट्भुज (सेंट्रल हैक्सागन) से निकलने वाली सड़कों पर निर्माण के लिए भूमि दी गई।


इसके बावजूद, लुटियन की दिल्ली के अनुरूप डिजाइन होने की शर्त भी थी। इसके लिए रजवाड़ों को अपने महलों के नक्शों को अंग्रेज सरकार से स्वीकृत करवाना पड़ता था। देश की आजादी के बाद देसी रियासतों के भारतीय संघ में विलय के साथ ही राजा-महाराजाओं के सभी महल भारत सरकार की संपत्ति बन गए। इनमें से अधिकांश पर अभी भी सरकार का स्वामित्व है, जहां केंद्रीय सरकर के विभिन्न विभागों के कार्यालय हैं जैसे धौलपुर हाउस में संघलोक सेवा आयोग का कार्यालय है जो कि देश के भावी प्रशासकों यानी आइएएस के चयन का कार्य करता है।



देश की आजादी तक कायम रहे चैंबर ऑफ प्रिंसेस (1921-1947) के चार चांसलर यानी प्रमुख हुए। ये बीकानेर के महाराज गंगा सिंह, महाराजा पटियाला सरदार भूपिंदर सिंह, नवानगर के महाराज रंजीतसिंहजी और नवानगर के ही महाराज दिग्विजयसिंहजी तथा भोपाल के नवाब हमदुल्लाह खान थे।



Saturday, June 25, 2016

India_Water_देश का जल




लियोनार्डो-द-विंसी ने एक बार कहा था ‘जल प्रकृति का वाहक है।’

पृथ्वी की 3/4 सतह पर पानी होने के बावजूद केवल एक प्रतिशत पानी पीने योग्य है तथा इसका बड़ा हिस्सा पहले ही दूषित हो चुका है। इसके साथ ही, नदियां सूख रही हैं तथा भूजल का अधिक दोहन हो रहा है। जहां पानी है, वहीं जीवन है तथा जहां पानी नहीं है, वहां जीवन नहीं है।



भारत में जल लोगों में श्रद्धा जगाता है। इसे ‘वरुण’ नामक देवता का अवतार माना गया है, जिन्हें जल के सभी स्वरूपों के देवता के रूप में पूजा जाता है। भारत में दुनिया की सतरह प्रतिशत जनता रहती है परंतु, यहां विश्व का केवल चार प्रतिशत पानी उपलब्ध है।

देश के अधिकांश हिस्सों में नियमित रूप से पानी को लेकर हालात चिंता का विषय है। ऐसे में पानी का संरक्षण, संतुलित वितरण तथा प्रयुक्त जल का फिर से उपयोग पर अनिवार्य रूप से ध्यान दिये जाने की जरूरत है।

हमें इसके लिए जल की उपलब्धता में क्षेत्रीय असंतुलन को दूर करने की दिशा में प्रयास करने होंगे। इतना ही नहीं, शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों के बीच जल के बंटवारे में समानता लानी होगी। आज समय की मांग है कि जल संरक्षण को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाने की जरूरत है।
आज एक भारी चुनौती रूप ले चुकी जल सुरक्षा की समस्या के भविष्य में और बढ़ने के आसार है। ऐसे समय में जब हम घटते जल संसाधनों तथा जल की बढ़ती मांग से जूझ रहे हैं, जल संरक्षण से ही लाभ हो सकता है। आज ‘जल को बचाना ही जीवन बचाना है’ नामक कहावत पहले से कहीं अधिक सटीक बैठती है।

देश की राष्ट्रीय जल नीति 2012 में जल संसाधनों के उपयोग में सुधार की जरूरत को स्वीकार किया गया था। जबकि इससे पहले जल का उपयोग और उसके प्रबंधन पर ध्यान दिए बिना उपलब्ध जल की मात्रा बढ़ाने पर ध्यान दिया गया। इसलिए अब ‘जल संसाधन विकास’ से 'जल संसाधन प्रबंधन’ की दिशा में बदलाव किया जाना जरूरी हो गया है।


जलवायु परिवर्तन का खतरा वास्तविक और सामयिक है। जल प्रवाह में बदलाव, भूमिगत जल में कमी, बाढ़ और सूखे की घटनाओं के बढ़ने और समुद्र के किनारों पर खारेपानी के घुसने के कारण जलवायु परिवर्तन का जल संसाधनों पर भारी दुष्प्रभाव पड़ने की आशंका है। इस चुनौती का सामना जल प्रबंधन और संरक्षण से ही किया जा सकता है। 2011 में देश में राष्ट्रीय जल मिशन के तहत जल संरक्षण, जल की बर्बादी में कमी लाने और समतापूर्ण वितरण का काम शुरू किया गया था।

भारत में खेती में सबसे अधिक पानी का उपयोग होता है। तेजी से हुए शहरीकरण और शहरों में पानी की मांग ने पानी को गाँव से शहरी नागरिकों की ओर भेजने के लिए मजबूर कर दिया है, जिससे गाँव और शहर में होड़ पैदा हुई है। जल संसाधनों में बदलाव न होने के कारण भविष्य में पानी के उपयोग को लेकर गाँव और शहर में प्रतिस्पर्धा के बढ़ने की संभावना है। इस परिस्थिति के समाधान के लिए दोनों के बीच पानी के उचित बंटवारे की जरूरत है।


हमारे देश में कृषि के लिए जल की सबसे ज्यादा मांग है। सबको अन्न उपलब्ध करवाने के लिए खेती में उचित जल प्रबंधन आवश्यक है। हमें अपनी सिंचाई प्रणाली में जल के उचित प्रयोग को प्रोत्साहन, उपयोग किए गए पानी को संशोधित करके दोबारा उपयोग में लाने के प्रयासों को बढ़ाना होगा।

देश में घटते भूजल के स्तर को रोकने के लिए सही प्रौद्योगिकी का प्रयोग करना होगा। मौजूदा ग्रामीण विकास योजनाओं के साथ जोड़कर वर्षा जल संचयन को लोकप्रिय बनाना होगा। साथ ही मिट्टी में नमी बढ़ाना, नदी-तालाबों के किनारे पेडों की कटाई में कमी लाना और पानी की उत्पादकता में सुधार की दिशा में कोशिश करनी होगी।

उपयोग योग्य जल एक दुर्लभ वस्तु है। इसको देखते हुए पानी की कीमत इस तरह रखनी होगी कि समाज में पानी की बचत के लिए प्रोत्साहन और बर्बादी के लिए दंड की व्यवस्था की भावना हो।

आधुनिक विकास के हिसाब से पूरी दुनिया में सुरक्षित पीने के पानी की व्यवस्था एक गंभीर पहल बन चुकी है। मनुष्यों की काफी बड़ी जनसंख्या की, इस बुनियादी जरूरत तक पहुंच नहीं हो पाई है। सुरक्षित पेयजल तक गरीबों की पहुंच को सुनिश्चित करने के लिए बाजार, प्रौद्योगिकी और सरकार को काफी प्रयास करने होंगे। देश में सुरक्षित पेयजल की सामूहिक खपत को बढ़ावा देने के लिए वित्तीय संस्थानों की भी मदद लेनी होगी।

भारत में पानी को लेकर मौजूदा कानूनी ढांचा इस जटिल जल परिस्थिति से निबटने के लिए असमान तथा अपर्याप्त है। पानी को लेकर सरकारी नीतियों और नियमों को स्पष्ट और सारगर्भित बनाने की भी जरूरत है। तभी भारत में मुंह बाएँ खड़ा पानी का संकट को कम किया जा सकता है।

महात्मा गांधी का कहना था, ‘धरती मां के पास हमारी जरूरत पूरा करने के लिए पर्याप्त है परंतु लालच के लिए नहीं।’ वह एक ऐसा हिंद स्वराज स्थापित करना चाहते थे जो ‘लालच से जरूरत की ओर’ के सिद्धांतों पर आधारित हो। आज प्रकृति पर विजय से हटकर प्रकृति से सहयोग पर आधारित सोच होने की जरूरत है।



Monday, October 12, 2015

Collective Memory of the country_देश और मीडिया की लोक स्मृति


काली-करतूतों वाले सफेदपोश चेहरे। 

देश और मीडिया की लोक स्मृति के लिए!

वर्ष 1999 में भारत पर जिहादी भावना को लेकर पीठ-पीछे छुरा भोंकने वाले कुकृत्य यानि पाकिस्तानी सेना आक्रमण के कुटिल योजनाकार जनरल परवेज़ मुशर्रफ के विदेश मंत्री खुर्शीद महमूद कसूरी थे। इतना ही नहीं, मुशर्रफ-कसूरी की जुगलबंदी की निगहबानी में ही वर्ष 2008 में 26/11 को मुंबई में बम विस्फोट के रूप में पाकिस्तानी जिहादी हमले को अंजाम दिया गया था।



Wednesday, March 19, 2014

Colour of Grief (दुख का रंग)



दंगों में प्रभावित गुजराती मुसलमानों की पीड़ा से सदैव द्रवित होने वाले व्यक्तियों, संगठनों और दलों को इस्लामी जेहादियों की कट्टरता के शिकार तथा अपने देश में ही शरणार्थी कश्मीरी पंडितों का संताप क्यों नहीं दिखता ?
वैसे रक्त का रंग तो दोनों का लाल ही है पर एक के लिए खून जोर मारता है और दूसरे के लिए पानी हो जाता है, यह स्थान दोष है या इतिहास बोध की कमी या फिर रतौंधी रोग?
भला दुख का भी कोई रंग होता है?

चित्र: मंजीत बावा (टू-लिव ) 

Tuesday, August 20, 2013

India Airforce Response to Chinese Intrusions_चीनी चुनौती को भारतीय हवाई जवाब







चीनी चुनौती के भारतीय हवाई जवाब ने किया सबको लाजवाब

भारतीय वायुसेना ने पहली बार लद्दाख के पांच हज़ार पैंसठ मीटर की ऊंचाई वाले दौलत बेग़ ओल्डी वायु पट्टी (एयरबेस) पर सी-130जे सुपर हरक्यूलिस विमान 'गजराज' को उतारा। गाज़ियाबाद से उड़ान भरने वाला वायुसेना का दुनिया के सबसे बड़ा फौजी मालवाहक विमान क़रीब सात बज़े दुनिया के सबसे ऊंचे रनवे यानि लद्दाख में दौलत बेग़ ओल्डी वायु पट्टी पर उतरा। पहली बार गजराज की वायु पट्टी पर उतरने की तस्वीरें और वीडियो मीडिया के लिए जारी किए गए।
16,614 फीट की ऊंचाई पर स्थित दौलत बेग ओल्डी इलाके में भारतीय वायुसेना के सबसे बड़े विमान हरक्यूलिस उतारना विश्व रिकार्ड के समान है। उल्लेखनीय है कि भारत ने पहली बार चीनी सीमा के पास हरक्यूलिस विमान को उतारा है। सामरिक दृष्टि से भारत के लिए यह अहम सफलता है क्योंकि दौलत बेग पट्टी की ऊंचाई काफी ज्यादा है।
करीब 43 साल पहले भारत ने 1962 की चीन की लड़ाई और 1965 में पाकिस्तान से युद्ध के समय यहां पर अपने विमान उतारे थे। उसके बाद बंद कर दी गई वायु पट्टी के भारत के इस्तेमाल पर चीन को हमेशा ऐतराज़ रहा है। भारतीय वायुसेना ने 2008 में AN-32 विमान उतारकर इसे फिर से चालू किया था।
यह चीन से लगने वाली वायु पट्टी वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) के क़रीब है।
इस विमान की खासियत है कि इसे उतरने के लिए अधिक रनवे की जरूरत नहीं होती और यह खराब मौसम में उड़ान भरने के साथ उतर सकता है। ऐसे पहाड़ी इलाके में फौजी मालवाहक विमान का उतरना काफी महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे वायुसेना के सैनिक टकराव की स्थिति में थलसेना की मदद के लिए एयरब्रिज बनाने की क्षमता सिद्ध हो गयी है ।
गौरतलब है कि चीन ने पिछले दिनों इसी इलाके में कई बार सीमा का उल्लंघन करने के कारण दोनों देशों के बीच तल्खी बढ़ गई थी. इस साल 15 अप्रैल को चीनी सेना के करीब 50 वाहन लैस होकर डीबीओ सेक्टर में वास्तविक नियंत्रण रेखा के पार भारतीय सीमा के 19 किलोमीटर अंदर तक घुस आई थी और पांच टेंट गाड़ दिए थे। चीन ने हाल ही में देपसांग घाटी में घुसपैठ की थी जिसके बाद से सीमा पर तनाव का माहौल बन गया था।
चीनी घुसपैठ की इन घटनाओं के बाद से भारत ने सीमा पर विशेष सतर्कता बढ़ा दी है।
इस कदम से भारत ने चीन को स्पष्ट कर दिया है वह किसी भी तरह के चीनी दुस्साहस का करारा जवाब दे सकता है। गौरतलब है कि 1962 में चीन के हमले के समय भारत ने अपनी वायुसेना का इस्तेमाल नहीं किया था, जिसके लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की कड़ी आलोचना भी हुई।
भारतीय वायु सेना ने अपनी विशेष अभियानों की क्षमता में इजाफा करने के लिए 2011 में अमेरिका निर्मित सी-130जे सुपर हरक्‍यूलिस विमान को अपने परिवहन बेड़े में शामिल किया था। भारत ने वर्ष 2008 में अमेरिका से 950 मिलियन डॉलर की कीमत वाले ऐसे छह विमानों की आपूर्ति करने का आदेश दिया था।अमेरिकी विमान निर्माता कंपनी लाकहीड मार्टिन ने भारत के लिए सी-130-जे सुपर हरक्यूलिस विमान बनाए है । इस श्रेणी के छह विमानों को पहले ही राजधानी दिल्ली के निकट हिंडन वायु ठिकाने पर तैनात किया जा चुका है और इनकी जिम्मेदारी भारतीय वायु सेना के नव गठित 77 स्क्वाड्रन पर है । 
अब तक का सबसे आधुनिक विमान कहा जाने वाला यह विमान इंफ्रारेड डिटेक्शन सेट [आईडीएस] से लैस होने के चलते कम ऊंचाई पर उड़ने के साथ अंधेरे में भी नीचे उतर सकता है, हवा से सामान गिरा सकता है  । प्रतिकूल वातावरण में उड़ान भरने के दौरान भी सुरक्षित रहने के लिए इसमें स्वसुरक्षा तंत्र लगाया गया है। लंबे समय तक अभियानों को अंजाम देने की क्षमता हासिल करने के लिए इसमें उड़ान के दौरान ही ईधन भरने की क्षमता के लिए भी उपकरण हैं। गौरतलब है कि भारत ने ऐसे छह विमानों का आर्डर दिया था। भारतीय वायु सेना को दिए गए सी-130-जे सुपर हरक्यूलिस अमेरिकी वायु सेना के पास मौजूद सी-130-जे का ही दूसरा प्रकार हैं। भारत सी-130-जे का बेड़ा रखने वाले अमेरिका, आस्ट्रेलिया, कनाडा, डेनमार्क, इटली, नार्वे और ब्रिटेन के बाद आठवा देश है । इन विमानों में से तीन ने इस बार गणतंत्र दिवस पर आसमान में उड़ान भी भरी थी । 

Sunday, June 9, 2013

Amartya Sen-Indian Science Congress: Nalanda


Nalanda was violently destroyed in an Afghan attack, led by the ruthless conqueror, Bakhtiyar Khilji, in 1193, shortly after the beginning of Oxford University and shortly before the initiation of Cambridge. Nalanda university, an internationally renowned centre of higher education in India, which was established in the early fifth century, was ending its continuous existence of more than seven hundred years as Oxford and Cambridge were being founded, and even compared with the oldest European university, Bologna, Nalanda was more than six hundred years old, when Bologna was born. Had it not been destroyed and had it managed to survive to our time, Nalanda would be, by a long margin, the oldest university in the world. Another distinguished university, which did not stay in existence continuously either, viz. Al-Azhar University in Cairo, with which Nalanda is often compared, was established at a time, 970 AD, when Nalanda was already more than five hundred years old.

Source: (‘Nalanda stood for the passion of propagating knowledge, understanding': Amartya Sen's keynote address at the 98th Indian Science Congress in Chennai on January 4, 2011)

First Indian Bicycle Lock_Godrej_1962_याद आया स्वदेशी साइकिल लाॅक_नलिन चौहान

कोविद-19 ने पूरी दुनिया को हिलाकर रख दिया है। इसका असर जीवन के हर पहलू पर पड़ा है। इस महामारी ने आवागमन के बुनियादी ढांचे को लेकर भी नए सिरे ...