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Monday, October 8, 2018
Monday, April 30, 2018
Cinema of Old Delhi_पुराने दौर की दिल्ली के सिनेमा
देश की आज़ादी से पहले ही पुरानी दिल्ली के इलाका बड़े स्तर पर वाणिज्यिक स्वरूप, जिसके लिए आज यह क्षेत्र प्रसिद्व है, के अलावा मसालों, कपड़ा, सूखे फल, जवाहरात और इलेक्ट्रॉनिक सामानों के थोक-खुदरा व्यापार का केंद्र था। इतना ही नहीं, उस समय शहर में आबादी की अच्छी खासी बसावट थी। सिविल लाइन के करीब कुलीन पड़ोस राजपुर रोड में फिल्म व्यापार से जुड़े अनेक लोग रहते थे। आज भी राजपुर रोड पर गए जमाने के मशहूर हिंदी अभिनेता राजेश खन्ना के परिवार के पुराने मकान, जिनमें से कुछ का नवीनीकरण हो चुका है, देखे जा सकते हैं।
तब पुरानी दिल्ली में लगभग सात-आठ सिनेमा घर थे। उन्हें लोग बायोस्कोप कहते थे। जबकि समाज के सर्वहारा तबके के सदस्य उन्हें मंडवा के नाम से पुकारते थे। किसी कारण विशेष से पुराने सिनेमा घरों में से शायद ही किसी को कभी उनके उसही नाम से जाना जाता था-रिट्ज, नाॅवल्टी या कुमार टॉकीज। इसकी बजाय, वे सभी सिनेमा घर, उस क्षेत्र विशेष की भौगोलिक स्थिति के नाम से जाने जाते थे जहां वे स्थित थे। इसी कारण से कुमार टॉकीज पत्थरवाला था और जगत मछलीवाला।
दूसरे विश्व युद्ध खासकर देश विभाजन के बाद पुरानी दिल्ली में सिनेमा दर्शकों की संख्या में वास्तविक बढ़ोत्तरी हुई। ऐसा बड़े पैमाने पर आबादी के महजबी आधार पर अदलाबदली के कारण हुआ। यह वह समय था जब मोती और कुमार थिएटर मोती टाॅकीज और कुमार टाॅकीज बने। यह सिलसिला पुरानी दिल्ली के चांदनी चौक और जामा मस्जिद के पुराने इलाकों से शुरू हुआ और धीरे-धीरे कनॉट प्लेस तक फैल गया।
उस दौर में मोती और जगत सिनेमाघरों में प्रभात टॉकीज, बॉम्बे टॉकीज और न्यू थिएटर की अच्छी हिंदी फिल्में लगती थी। जबकि 1950 के दशक में राज कपूर, बिमल रॉय, महबूब और गुरु दत्त जैसे प्रतिष्ठित फिल्म निर्माताओं की फिल्में लगना शुरू हुई। तक के जमाने में मोती अधिक आधुनिक माना जाता था, जहां समाज के सभी वर्गों के दर्शक आते थे। 1970 के मध्य तक यहां सुबह के शो में अंग्रेजी फिल्में दिखाई जाती थी। जबकि दूसरी तरफ, जगत के मछली बाजार और मुर्गा बाजार के नजदीक होने के कारण उसे पुराने शहर की गरीब बसावट वाली जनता के मनोरंजन केंद्र के रूप में देखा जाता था।
इन थिएटरों की अपनी स्थानीय दर्शकों की वफादार फौज थी। तब के प्रारंभिक दौर में सिनेमा हॉल अपने फिल्म व्यापार के लिए स्थानीय दर्शकों पर निर्भर थे। "दिल्ली फोर शोज, टाॅकीज आॅफ यसटरईयर किताब" में जिया उस सलाम बताते हैं कि जहां मुसलमान जामा मस्जिद के पास जगत में जाना पसंद करते थे तो वहीं हिंदुओं का पसंदीदा मोती था। रिट्ज और मिनर्वा में महिला दर्शकों की सुविधा के लिए अलग से बाॅक्स बने हुए थे, जहां बुर्कानशीन मुस्लिम महिलाएं, गैरों की नजरों से दूर सुकून से सिनेमा के जादू का आनंद लेती थी।
तब फिल्मों के विज्ञापन का प्रचार, पहियों वाली गाड़ी पर लगे होर्डिंग से होता था, जिसे दो आदमी धक्का देकर चांदनी चौक, खारी बावली, उर्दू बाजार, नई सड़क, दरीबा, मटिया महल और हौज काजी की व्यस्त सड़कों पर घूमते थे। "दिल्ली द फर्स्ट सिटी" पुस्तक में सतीश जैकब लिखते हैं कि उन दिनों में अज्ञातकुलशील एम.एफ. हुसैन एस्प्लानेड रोड पर फिल्म की होर्डिंग को उकेरते देखे जा सकते थे। उसी समय में ग्रामोफोन प्लेयर और रेडियो की शुरूआत हुई थी। तब सबसे पहले काले रंग की भारी डिस्क देखने वालों ने उसे तवा का नाम दिया और यही नाम उससे चिपक गया।
Saturday, March 10, 2018
Old Delhi Havelis of Kuchas_पुरानी दिल्ली के कूचों की हवेलियाँ
हवेली फारसी शब्द है। इसका अर्थ है पृथ्वी का एक टुकड़ा या खुला स्थान जो लश्कर यानी फौज के लिए निश्चित कर दिया गया हो। ऐसी जमीनों की आमदनी से सेना का खर्च चलाया जाता था। समय बीतने के साथ-साथ जमीन के किसी भी विस्तृत खंड को, जिस पर चारदीवारी खिंची हुई हो और कुछ कमरे या कोठरियां बनी हुई हों, लोग हवेली कहने लगे।
अपने नए अर्थ में हवेली एक आलीशान, लंबी-चौड़ी इमारत को कहते हैं जो एक मंजिल की और कई मंजिलों की हो सकती है। "दिल्ली जो एक शहर है" पुस्तक में महेश्वर दयाल लिखते हैं कि पुरानी दिल्ली में हवेली लोगों की रोजमर्रा की जिन्दगी, सभ्यता और रहन-सहन का एक अभिन्न अंग थी और इसके बिना उस समय के सामाजिक जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती।
हौज काजी चौक के पास, बाजार सीताराम को काटती हुए एक तंग गली है जो कि कूचा पाती राम कहलाती है। जहां पर अनेक हवेलियां या कोठियां हैं। ये हवेलियां, दिल्ली नगर निगम की विरासत इमारतों के लिए सूचीबद्ध 800 भवनों में शामिल है।
शाहजहांनाबाद के सुनहले दौर में परकोटे वाले शहर का यह हिस्सा हवेलियों से आबाद था। जहां कुलीन व्यक्तियों के घरों से लेकर नाचने वालियों के कोठे थे। इन कोठों में शहर के अभिजात वर्ग के लिए नाच-गाने और संगीत की बैठकें आयोजित होती थीं।
अधिकतर लखौरी ईंट से बनी इन हवेलियों का खास पहचान सजावटी दरवाजे, भव्य तीखे घुमावदार प्रवेश द्वार, झरोखे और नक्काशीदार बलुआ पत्थर के खंबे थे। इन हवेलियों के सामने वाले भाग को सजाने में रंग और शैली के संदर्भ में विविधता साफ देखी जा सकती है। इन हवेलियों में से एक के मुख्य प्रवेश द्वार के ऊपर एक बेहद नक्काशीदार मोर बना हुआ है, जो शायद मुगल बादशाह शाहजहां के तख़्त-ए-ताऊस (मयूर सिंहासन) से प्रभावित प्रतीत होता है।
1915 में लाला कन्हैया लाल ने कूचा पाती राम में पहली हवेली, हवेली राम कुटिया बनाई थी। इस दो मंजिला हवेली के भूतल में बाहर की तरफ निकली दो खिड़कियां और सजावटी बलुआ पत्थर के खंबों वाले तोरण तथा फूलदार नक्काशी हैं। अब एक निजी स्वामित्व वाली इस हवेली के भीतर एक बड़ा आंगन है, जिसके चारों ओर कमरे बने हैं।
हवेली राम कुटिया के ठीक सामने बनी हवेली कूचा पाती राम, जिसके नाम पर ही गली है, का निर्माण बीसवीं सदी के आरंभ में हुआ था। इस दो-मंजिला हवेली के सामने वाले भाग एक सुंदर नक्काशीदार बलुआ पत्थर से बना है, जिसमें बाहर की ओर निकला बलुआ पत्थर का छज्जा, नक्काशीदार स्तंभ, जंगला और दरवाजे हैं। इसकी एक अन्य विशिष्टता दरवाजों पर बनी मानवीय आकृतियां हैं।
कूचा पाती राम में हवेली राम कुटिया के पास 505 नंबर में एक हवेली है। उपरोक्त प्रकार से ही बनी इस हवेली का सबसे महत्त्वपूर्ण विशेषता, हवेली की बाहरी तरफ और भूतल पर व्यापक ढंग से पत्थर पर की गई नक्काशी है। इसी तरह, कूचा पाती राम की 908 नंबर हवेली में, दो मंजिला घर, एक मीटर ऊंचे चबूतरे पर बना है, जिसमें एक नुकीले मेहराबदार दरवाजे से घुसना पड़ता है। लखौरी ईंट और बलुआ पत्थर से बनी इस हवेली में ऊपरी मंजिल पर ठेठ बलुआ पत्थर से ताके बनी है। इस हवेली का नक्शा भी दूसरी हवेलियों के समान है, जहां एक मुख्य आंगन के चारों ओर कमरे बने होते हैं।
उस दौर में जैन और हिंदू समुदायों ने यहां कई मंदिर भी बनाए थे। 1655-65 में कूचा पाती राम के इमली मोहल्ला में एक मंदिर बना था, जिसका नाम उसके निर्माता कन्नौजी राय के नाम पर ही रखा गया। अब इसके एक निजी निवास का हिस्सा होने के कारण केवल पूर्व अनुमति के साथ ही यहाँ भीतर प्रवेश किया जा सकता है।
Saturday, October 7, 2017
wall of old city of delhi_पुरानी दिल्ली की दीवार_फसील
मुगल बादशाह शाहजहां ने 1639 में दिल्ली में एक नया शहर बसाने का फैसला किया। नतीजन लाल किला और शाहजहानाबाद दस साल में बनकर पूरा हुआ। सात मील के दायरे में फैले हुए इस नए शहर की तीन तरफ एक मोटी और मजबूत दीवार बनी थी। महेश्वर दयाल की पुस्तक "दिल्ली जो एक शहर है" के अनुसार, शाहजहानाबाद की दीवार 1650 में पत्थर और मिट्टी की बनाई गई थी, जिस पर तब पचास हजार रूपए का खर्चा आया। यह 1664 गज चौड़ी और नौ गज ऊंची थी और इसमें तीस फुट ऊंचे सत्ताईस बुर्ज थे।
1857 देश की आजादी की पहली लड़ाई में बादशाह बहादुर शाह जफर की हार के बाद दिल्ली अंग्रेजों के गुस्से और तबाही का शिकार बनी। फरवरी 1858 में अंग्रेज सैनिक अधिकारियों ने शहर की दीवार को ध्वस्त करने का आदेश दिया। तत्कालीन कमिश्नर जाॅन लॉरेंस इस को पूरी तरह एक गलत फैसला मानता था। उसने दिल्ली में सात मील लंबी दीवार को उड़ाने के लिए अपर्याप्त बारूद होने की बात कही। फिर आदेश को पूरा करने के लिए मजदूरों ने एक-एक करके हाथ से दीवार के पत्थरों को हटाया। यह एक तरह से जानबूझकर देरी के लिए अपनाई रणनीति हो सकती है, क्योंकि वर्ष के अंत में सुप्रीम गर्वनमेंट ने उसकी बातों को स्वीकार कर लिया और दीवार को कायम रखने का फैसला किया।
जबकि पश्चिम और उत्तर दिशा की दीवार के विपरीत दक्षिण-पश्चिमी तरफ की दीवार, असलियत में एक रूकावट थी तथा 1820 के दशक में इसके कुछ हिस्सों को ध्वस्त कर दिया गया।
मार्च 1859 में "दिल्ली गजट" ने यह खबर छापी कि महल के अंदर गोला-बारूद से उड़ाने का काम हो रहा है। लाॅर्ड कैनिंग ने इसके एक साल बाद वास्तुकला या ऐतिहासिक महत्व की पुरानी इमारतों को संरक्षित किए जाने का आदेश जारी किया पर तब तक काफी देर हो चुकी थी। 1861 में रेलवे लाइन बिछाने के हिसाब से शहर की दीवार में बने काबुली गेट और लाहौरी गेट के बीच शहर की दीवार को तोड़ दिया गया।
फिर अंग्रेजों ने भारतीय शहरों की प्रकृति, भारतीयों के दोबारा आजादी की लड़ाई छेड़ने के भय और शहरों में नए निर्माण की जगह बनाने के लिए पुराने शहर के केंद्रों को खत्म करने की बातों का ध्यान करते हुए नए शहरों की योजना बनाई।
1872 में दिल्ली को एक सुंदर शहर बनाने की चाहत रखने वाला अंग्रेज कमीश्नर कर्नल क्रेक्रॉफ्ट पुराने शहर की दीवार को अराजकतावाद की निशानी मानता था। 1881 में नगर पालिका ने लाहौरी दरवाजे की दोनों ओर रास्ते बनाते हुए दिल्ली गेट को नष्ट करने का इरादा बनाया। तत्कालीन अंग्रेज कमांडर-इन-चीफ ने इस पर आपत्ति व्यक्त की क्योंकि वह कश्मीरी गेट और उससे सटी दीवारों को ऐतिहासिक महत्व की वजह से बचाना चाहता था।
1911 में अंग्रेजों के अपनी राजधानी को कलकत्ता से दिल्ली लाने के साथ ही एडवर्ड लुटियन को शाहजहांनाबाद के बाहर नई दिल्ली बनाने का दायित्व सौंपा गया। वह (लुटियन) तो वायसराय भवन से लेकर जामिया मस्जिद तक एक सीधी सड़क निकालना चाहता था, जो पुरानी दिल्ली की दीवार और बाजारों से होते हुई गुजरती। लेकिन उसकी इस योजना को अंग्रेज राजा की स्वीकृति नहीं मिलने के कारण ऐसा नहीं हो सका।
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