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Sunday, November 6, 2016

दिल्ली की देहरी_1_पांडवों का इंद्रप्रस्थ यानि पहली दिल्ली_First Delhi of Indraprastha_Pandavas


पांडवों का इंद्रप्रस्थ यानि पहली दिल्ली


दिल्ली का इतिहास, उसकी अब तक की बसावटों की तरह ही अविछिन्न है । उल्लेखनीय है कि पुराने किले का स्थान दिल्ली का मूल नगर इंद्रप्रस्थ माना जाता है। हिन्दू साहित्य के अनुसार, यह किला पांडवों की राजधानी इंद्रप्रस्थ के स्थल पर है। पांडवों ने ईसापूर्व से 1400 वर्ष सबसे पहले दिल्ली को अपनी राजधानी इन्द्रप्रस्थ के रूप में बसाया था।


पूर्व-ऐतिहासिक काल में जिस स्थल पर इंद्रप्रस्थ बसा हुआ था, उसके ऊंचे टीले पर १६ वीं शताब्दी में पुराना किला बनाया गया। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने इस किले की कई स्तरों पर खुदाई की है। खुदाई में प्राचीन भूरे रंग से चित्रित मिट्टी के विशिष्ट बर्तनों के अवशेष मिले हैं, जो महाभारत काल के हैं। यहाँ उत्खनन से पता चला कि लगभग 1,000 ईसा पूर्व के काल में यहां मानवीय बसावट थी और ये लोग विशिष्ट प्रकार के बर्तनों और सलेटी रंग की चीजों का इस्तेमाल किया करते थे। यहाँ खुदाई में मिले बर्तनों के अवशेषों के आधार पर पुरातत्वविदों की मान्यता बनी कि यही स्थल पांडवों की राजधानी होगा। यह ध्यान देने वाली बात है कि देश में दूसरे महाभारतकालीन स्थानों पर भी उत्खनन में ऐसे ही बर्तनों के अवशेष मिले हैं।


वर्ष 1955 में पुराने किले के दक्षिण पूर्वी भाग में हुई पुरातात्त्विक खुदाई में कुछ मिट्टी के पात्रों के टुकड़े पाए गए जो कि महाभारतकालीन पुरा वस्तुओं से मेल खाते थे। इससे पुराने किला क्षेत्र के इन्द्रप्रस्थ होने की बात की पुष्टि हुई। पुराने किले की पूर्वी दीवार के पास 1969-1973 के काल में दोबारा खुदाई की गई। उस दौरान यहाँ पुरातात्विक खनन में मिले मृदभांड, टेराकोटा (पकी मिटटी की) की यक्ष यक्षियों की छोटी प्रतिमाएँ, लिपि वाली मुद्राएँ किले के संग्रहालय में रखी गई हैं।


महाभारत के प्रसंग के अनुसार, श्री कृष्ण ने पांडवों शांति-समझौते के रूप में कौरवों के समक्ष केवल पांच गांवों की मांग रखी थी। इन सभी गांवों के नामों के अंत में "पत" आता था जो संस्कृत के "प्रस्थ" का हिंदी साम्य है। ये 'पत' वाले गांव थे-इंदरपत, बागपत, तिलपत, सोनीपत और पानीपत। यह जानकर अचरज होगा कि दक्षिण दिल्ली की ओखला नहर के पूर्वी किनारे से लगभग २२ किलोमीटर दूर तिलपत गांव है। इन सभी उत्खनन स्थलों से महाभारत कालीन भूरे रंग के बर्तन मिले हैं।


यह भी एक कम जाना तथ्य है कि इंद्रप्रस्थ के अपभ्रंश इंद्रपत के नाम का एक गांव वर्तमान शताब्दी के प्रारंभ तक दिल्ली के पुराना किला में स्थित था। अंग्रेजों की राजधानी नई दिल्ली का निर्माण करने के दौरान अन्य गांवों के साथ उसे भी हटा दिया गया था। सैयद अहमद खान ने अपनी 'आसारुस्सनादीद' शीर्षक पुस्तक में इंदरपत के मशहूर मैदानों (जिसके एक हिस्से को अब इंद्रप्रस्थ एस्टेट के रूप में स्मारक का दर्जा दे दिया गया है) का नाम दिया है।


वर्ष 1911 में अंग्रेजों के कलकत्ता से बदलकर दिल्ली को नई राजधानी बनाने के निर्णय पर तत्कालीन वाइसरॉय लॉर्ड हार्डिंग ने लिखा था, "दिल्ली अभी भी एक मायावी नाम है। हिंदुओं के दिलोदिमाग में यह नाम बहुत सारे ऐसे पवित्र प्रतीकों और किंवदंतियों से जुड़ा हुआ है जो इतिहास के प्रारंभ बिंदु से भी पुराने हैं। दिल्ली के मैदानों में ही पांडव राजकुमारों ने कौरवों के साथ एक भीषण युद्व लड़ा था जिससे अंततः महाभारत की रचना हुई। और यमुना तट पर ही पांडवों ने प्रसिद्ध यज्ञ किया था जिसमें उनकी ताजपोशी हुई थी। पुराना किला आज भी उसी जगह आबाद है जहां उन्होंने इस शहर की बुनियाद डाली थी और इसे इंद्रप्रस्थ का नाम दिया था। यह आधुनिक दिल्ली शहर के दक्षिणी दरवाजे से बमुश्किल पांच किलोमीटर दूर पड़ता है।"

(5 नवम्बर, 2016, दैनिक जागरण)

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