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Saturday, July 21, 2018

Culprit of 1962 War





Hope the book Devil's Advocate: The Untold Story also carries the Devil' role in 1962 war!


Pran Nath Thapar, Father of Karan Thapar, was Ex-COAS during 1961-62 when Indo-Sino War happened where he shamelessly (along with VK Menon) made country lose  to China. He quit unceremoniously after the war.

Monday, December 19, 2016

Sangeet Natak Academy_Seminar on Cinema_संगीत नाटक अकादेमी और सिनेमा पर सेमीनार

दैनिक जागरण, १७ दिसंबर २०१६ 




आज यह बात जानकर किसी को भी अचरज होगा कि संगीत नाटक अकादेमी ने सन् 1955 में दिल्ली में पहली बार फिल्म पर एक राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया था। यह एक कम-जाना तथ्य है कि अकादेमी की स्थापना के समय यह कल्पना की गई थी कि वह सिनेमा की विधा को भी आगे बढ़ाने का काम करेगी। फिल्म के भी नाटक का ही एक विस्तार होने की लोकप्रिय अवधारणा और परम्परागत भारतीय रंगमंच तथा लोकप्रिय सिनेमा का विश्लेषण भी इसी बात की पुष्टि करता है।

इस तरह, अकादेमी ने वर्ष 1955 में इसी विचार को लेकर सिनेमा-संगोष्ठी आयोजित की। यही नहीं वर्ष 1961 तक अकादेमी ने फिल्मों में निर्देशन, अभिनय, पटकथा, संगीत और गीत के लिए पुरस्कार भी दिए।

जब इस फिल्म संगोष्ठी का आयोजन किया तो अकादेमी के पहले अध्यक्ष पी. वी. राजामन्नार ने फिल्म को एक भिन्न रूप और स्वतंत्र कला व्यक्तित्व वाली विधा बताया। इस संगोष्ठी की योजना और संचालन पूरी तरह फिल्म जगत के प्रसिद्ध कलाकारों और दूसरे पेशेवरों के हाथ में था। भारतीय सिनेमा की पहली अभिनेत्री देविका रानी रोरिक इस संगोष्ठी की संयुक्त-कार्यकारी निदेशक थी तो वरिष्ठ रंगमंचीय कलाकार-फिल्म अभिनेता पृथ्वीराज कपूर उनके सह-संयुक्त निदेशक, संगोष्ठी के निदेशक बी.एन. सरकार और प्रवर समिति के अध्यक्ष नित्यानंद कानूनगो थे।

इस मौके पर तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने हिंदी में दिए अपने भाषण में कहा कि "कुछ दिनों से मैं देख रहा हूँ कि दिल्ली में चारों तरफ इस बात की चर्चा है कि यहां एक फिल्म सेमिनार होने वाला है। उसके इन्तजाम करने वालों की अपनी शख्सियत से और इसके मजमून से इसकी दिल्ली में काफी चर्चा होती रही है। हर एक आदमी जानता है कि सिनेमा आजकल की दुनिया में एक खास चीज है जिसका असर उसपर काफी है। इसलिए हमें इसमें दिलचस्पी लेनी है और इस सेमीनार का यहां होना एक माकूल बात है। अच्छी बात है कि लोग इस काम से खास तौर से ताल्लुक रखत हैं वे आपस में मिलें, सलाह और मशवरा करें। क्योंकि इसी तरह पेचीदा सवालों पर रोशनी पड़ती है। जाहिर है कि जैसे फिल्म इन्डस्ट्री को इसमें दिलचस्पी है उसी तरह यहां की हुकूमत को भी काफी दिलचस्पी है और जिस चीज में करोड़ों आदमियों को दिलचस्पी हो उसमें यकीनन गवर्मेन्ट को दिलचस्पी होनी चाहिए।"

इस जमावड़े में अनेक साहित्यकारों, फिल्म संगीतकारों और सिनेमा के फोटोग्राफरों ने भी हिस्सा लिया। इस संगोष्ठी की शुरुआत पंकज मल्लिक ने अपनी सुरमई आवाज में वेदों के एक गीत से की। नेहरू ने इस संगोष्ठी में शामिल कलाकारों के सम्मान में अपने सरकारी निवास पर एक रात्रि भोज दिया। इस संगोष्ठी के आयोजन से पूर्व भारत सरकार ने सर्वश्रेष्ठ फिल्म के लिए राष्ट्रीय सम्मान की स्थापना कर दी थी। इस अखिल भारतीय सांस्कृतिक प्रतियोगिता में सभी भारतीय भाषाओं की फिल्मों ने हिस्सा लिया।

देश के प्रधानमंत्री ने 27 फरवरी 1955 को दिल्ली में नेशनल फिजिकल लेबोट्ररी के सभागार में इस संगोष्ठी का उद्घाटन किया था। इस अवसर पर उपराष्ट्रपति सर्वापल्ली राधाकृष्णन, उनकी बेटी इंदिरा गांधी, कमलादेवी चट्टोपाध्याय भी उपस्थित थे।

इसमें संगोष्ठी में बंबई, कलकत्ता और मद्रास की फिल्मी दुनिया की तत्कालीन सभी नामचीन हस्तियां शामिल हुई। जिसमें अनिंद्रा चौधरी, बी. सान्याल, पंकज मल्लिक, वी. शांताराम, नरगिस, दुर्गा खोटे, राज कपूर, किशोर साहू, विमल राय, अनिल बिस्बास, ख्वाजा अहमद अब्बास, दिलीप कुमार, वासन जैमिनी प्रमुख थे। दिल्ली के प्रतिनिधिमंडल में उदयशंकर, आर रंजन, कवि नरेंद्र शर्मा, जगत नारायण, एम भवनानी और जगत प्रसाद झालानी थे।

पहला पुरस्कार, विमल राॅय को उनकी फिल्म "दो बीघा जमीन" के लिए प्राप्त हुआ। संगीत नाटक अकादेमी ने इस फिल्म संगोष्ठी की रपट को फिल्म सेमीनार रिपोर्ट, 1955 के नाम से प्रकाशित किया था।



Wednesday, June 3, 2015

यादों के झरोखे में रीगल_Regal Cinema of Delhi


नयी दिल्ली कनॉट प्लेस में अधिकतर थिएटर 30 के दशक में बनें, जिनमें से अनेक जैसे रीगल, प्लाज़ा ओडियन और रिवोली प्लाज़ा आज भी लोकप्रिय व्यावसायिक सिनेमाघर के रूप में मौजूद हैं। बहराल, पुरानी दिल्ली में तो पहले से ही अनेक सिनेमाघर थे, पर रीगल नई दिल्ली का पहला सिनेमाघर था जो कि वर्ष 1931 में बना। रीगल थियेटर, कनॉट प्लेस में बनी सबसे पहली इमारत थी। जब यह सिनेमाघर खोला गया था तब इस क्षेत्र का व्यावसायिक रूप से इतना विकास नहीं हुआ था और रीगल को खुलते ही तत्काल सफलता नहीं मिली थी।

अंग्रेजी के प्रसिद्ध लेखक खुशवंत सिंह “सेलिब्रेटिंग दिल्ली” पुस्तक में बताते है कि उनके पिता (सरदार शोभा सिंह) नए शहर में एक सिनेमा-रीगल का निर्माण करने वाले पहले व्यक्ति थे। शुरू में उन्होंने खुद सिनेमाघर को चलाने की कोशिश की। मुझे याद है कि कई बार सिनेमाघर में केवल दस दर्शक होते थे और उन्हें दर्शकों को टिकट के उनके पैसे वापस लेने के लिए गुहार करनी पड़ती थी, जिससे उन्हें फिल्म को दिखाने पर पैसा बर्बाद नहीं करना पड़े। उस दौर में, पुरानी दिल्ली वालों खासकर चव्वनीवालों ने इसे पसंद नहीं किया क्योंकि वे खुले में बनी नई दिल्ली को एक भूतों की बस्ती मानते थे।

रीगल का डिजाइन नई दिल्ली के वास्तुकार एडविन लुटियंस के दल के साथी वॉल्टर स्काइज़ जॉर्ज ने तैयार किया था। रीगल की इमारत मॉल के प्रारूप की तरह दिखती है। मूल रूप से विक्टोरियन वास्तुकला से प्रेरित रीगल सिनेमाघर में मुगल प्रभाव, पाइट्रा द्यूरा सजावट में नज़र आता है। हैरानी की बात यह है कि यहाँ किया गया फूलों का रूपांकन, सफदरजंग मकबरे के समान है। रीगल एक ऐसा सिनेमाघर था जिसमें नाटक और फिल्में दोनों दिखाए जाते थे। इसका स्थापत्य-बाक्स, ग्रीन रूम, विंग्स आदि इसके इतिहास का पता देते हैं।

इस इमारत में एक ही छत के नीचे रीगल सिनेमा हॉल, दुकानें, और रेस्तरां मौजूद थे। रीगल का स्वरूप रंगमंच और सिनेमा को ध्यान में रखकर तैयार किया गया था और इसमें स्टेंडर्ड नामक एक रेस्तरां भी था जो बाद में गेलॉर्ड बन गया। पहले रीगल में फिल्म देखना एक सांस्कृतिक कर्म माना जाता था। उस समय फिल्म देखने का मतलब तक के डेविकोस और आज के स्टैंडर्ड रेस्तरां तथा गेलार्ड में भोजन करना भी होता था।


सरदार खुशवंत सिंह के शब्दों में, एक बार प्रसिद्व नर्तक उदय शंकर ने उनसे (सरदार शोभा सिंह) संपर्क किया था। मशहूर नर्तक उदय शंकर अपने यूरोप के दौरे से लौटे थे और उनके नृत्य कार्यक्रमों की वहां के अखबारों में काफी तारीफ हुई थी। वे कुछ रातों के लिए रीगल सिनेमा को अपने नृत्य कार्यक्रमों के लिए किराए पर लेना चाहते थे। मेरे पिता ने उनसे पूछा किस लिए? उनका कहना था कि मैं नृत्य करना चाहता हूँ। मेरे पिता के विचार में पुरुषों के नृत्य का विचार केवल हिजड़ों के घुम-घुमकर हाथ से ताली बजाने तक ही सीमित था। उदय शंकर ने किराए के पैसे का अग्रिम में भुगतान करने के कारण मेरे पिता सहमत हो गए। वे उत्सुकतावश वहां यह देखने चले गए कि इस आदमी के नृत्य को देखने के लिए कौन आता है। उन्होंने देखा कि सिनेमाघर में जाने के लिए डिनर जैकेट पहने अंग्रेज पुरूषों और महिलाओं की कारों की कतार लगी हुई है। यह देखकर वे भी नृत्य देखने के लिए चले गए और उन्हें एहसास हुआ कि भारतीय नृत्य का मतलब हिजड़ों के अश्लील नाच से कहीं अधिक था। उन्होंने उदय शंकर और उनकी टोली को अपने कुछ अंग्रेज मित्रों से मिलने के लिए अपने घर पर आमंत्रित किया।


रीगल के स्थापना वर्ष में ही जोसफ डेविड के पारसी नाटक पर आधारित पहली भारतीय बोलती (सवाक) फिल्म “आलम आरा” (दुनिया की रोशनी) का निर्माण मूक फ़िल्मों के दौर की समाप्ति का एलान था। इस फिल्म के मुख्य कलाकार मास्टर विट्ठल, जुबैदा और पृथ्वीराज कपूर थे। सन् 1938 में रीगल को एक कंपनी के लिए लीज पर दिया गया था, जिसमें राजेश्वर दयाल भी एक निदेशक थे। उस दौर में उन्होंने 10,000 रुपए का निवेश किया था पर उसके बाद भी कंपनी का दिवाला पिट गया।

गौरतलब है कि पहले रीगल में रूसी बैले, उर्दू नाटक और मूक फिल्में दिखाई जाती थीं। पृथ्वीराज कपूर सरीखे अभिनेता ने कनॉट प्लेस के कई थिएटरों में मंचित अनेक नाटकों में अभिनय किया था। आज़ादी से पूर्व उस दौर में, यहां समाज के उच्च वर्ग का तबका, जिनमें अंग्रेज़ अधिकारी और भारतीय रजवाड़ों के परिवार हुआ करते थे, नाट्य प्रस्तुति देखने आया करता था।

देश को आजादी मिलने तक रीगल में नाटकों होते थे और अनेक अंग्रेज नाटक कंपनियों ने शेक्सपियर और दूसरे क्लासिक अंग्रेजी नाट्य प्रस्तुतियों का मंचन किया। वायसराय लॉर्ड माउंटबेटन के अतिथि के रूप में नाटककार नोएल पियर्स कोवर्ड ने यहां प्रदर्शन किया। उल्लेखनीय है कि दूसरे विश्व युद्ध में ब्रिटिश खुफिया सेवा के लिए काम करने वाले पियर्स ने अपने दोस्त लॉर्ड लुईस माउंटबेटन पर चरित्र आधारित एक नाटक में नौसेना के एक कप्तान की भूमिका निभाई थी।

राबर्ट ग्रांट के शब्दों में, दूसरे विश्व युद्ध के दौरान सेना अकसर अपने सैन्य कार्यों के लिए सिनेमाघर लेने का अनुरोध करती थी, जिस कारण पूरी इमारत आम जनता की जद से दूर हो जाती थी। फरवरी 1949 में जवाहर लाल नेहरू अंग्रेज राजदूत के एक अतिथि के रूप में नई दिल्ली के रीगल सिनेमा में हेमलेट के एक नाट्य प्रदर्शन को देखने के लिए गए और बाद में उन्हें पता चला कि थिएटर के सामने सड़क को तीन घंटे के लिए बंद कर दिया गया था।

सन् 1952 से जब दिल्ली में बीटिंग रिट्रीट का कार्यक्रम आरंभ हुआ, तब इसका एक समारोह रीगल सिनेमा के सामने मैदान में और दूसरा लालकिले में हुआ था। फिल्म व्यापार से जुड़े लोग बताते हैं कि पांचवे दशक के आसपास कनाट प्लेस में सात बजे के बाद सब कुछ सूना हो जाता था। लोग पुराने शहर से तांगे पर आकर रीगल में फिल्म देखा करते थे।

काफी समय के बाद यहां नया शो और मैटिनी शो में फिल्में भी दिखाई जाने लगीं। यह वह समय था जब नया शो शुरू होने से पहले हवन किए जाते थे। देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू वर्ष 1956 में रीगल में “चलो दिल्ली” फिल्म देखी। इसी वर्ष, सोवियत नेता ख्रुशचेव और बुल्गानिन भारत की यात्रा पर आए थे। उनके साथ एक सांस्कृतिक दल भी था, जिसने उस समय के दिल्ली के सबसे बड़े थिएटर रीगल सिनेमा में प्रदर्शन किया था। वर्ष 1960 तक नई दिल्ली में सिनेमा मनोरंजन के प्रमुख साधनों में एक हुआ करता था।

आजादी के बाद, रीगल में लोकप्रिय हिंदी फिल्में दिखाई जाती थीं। हिंदी सिनेमा जगत के पहले परिवार, कपूर खानदान का रीगल से गहरा नाता रहा। हिंदी फिल्मों के पहले शोमैन राजकपूर की फिल्मों के रेड-कार्पेट प्रीमियर एक “असाधारण समारोह” हुआ करते थे। फिल्म प्रीमियर का पैमाना रेड-कार्पेट स्वागत और शानदार जुलूस से तय होता था। राजकपूर की अनेक फिल्में जैसे ‘बाबी’, ‘जागते रहो’, ‘संगम’ और ‘बूट पालिश’ रीगल में ही रिलीज़ हुईं।
यहाँ उनकी आखिरी फिल्म ‘सत्यम शिव सुंदरम’ थी । यहाँ तक कि रीगल को बेहद पसंद करने वाले वी. शांताराम कि ‘दहेज’ और ‘दो आंखें बारह हाथ’ भी यहाँ रिलीज़ हुई तो गुरुदत्त की ‘कागज के फूल’ और महबूब खान की ‘मदर इंडिया’ जैसी कालजयी हिंदी फिल्में भी।


70 के दशक से पहले अधिक फिल्मों के रिलीज़ न होने के कारण आज के समय के उलट जब हर सप्ताह सिनेमाघरों में फिल्में बदलती हैं, लंबे समय तक सिनेमाघरों में एक ही फिल्म लगी रहती थी। तब एक ही फिल्म के दिन में चार शो होते थे: दोपहर का शो (12.30 बजे), मैटिनी शो (3.30 बजे), शाम का शो (6.30 बजे) और रात का शो (9.30 बजे). उस समय सिनेमा देखने के टिकिट का दाम, जो सीट पर निर्भर था, 12 आने से लेकर 1.25 रूपए तक होता था।
वर्ष 2000 तक रीगल को छोड़कर कनॉट प्लेस के सभी सिनेमाघर मल्टीप्लेक्स के मालिकों ने किराए के पट्टे पर ले लिए। ऐसे में, केवल रीगल ही अपनी सांस्कृतिक पहचान को बनाए रखने में सफल रहा है।









Sunday, March 23, 2014

Purana qila-Dharamvir Bharati (पुराना क़िला-धर्मवीर भारती)

 
[भारत के स्वातन्त्र्योत्तर इतिहास का सबसे पहला और सबसे बड़ा हादसा था-अक्तूबर 1962 में चीन का आक्रमण। उसने न केवल सारे देश को हतप्रभ कर दिया था, हमारी दु:खद पराजय ने अब तक पाले हुए सारे सपनों के मोहजाल को छिन्न-भिन्न कर दिया था और मानो एक ही चोट में नेहरू युग की सारी विसंगतियाँ उजागर हो गयी थीं और खुद नेहरू, जिन्हें सारा देश प्यार करता था, पक्षाघात से पीड़ित पड़े थे। विचित्र यह था कि इस भयानक शून्य को किन्हीं नये मूल्यों से या आदर्शों से भरने की चिन्ता करने के बजाय चिन्ता थी ‘नेहरू के बाद कौन?’ और सिसायत के खेल खेले जाने लगे थे। उस सारी भयावह परिस्थितियों में उभरा था यह बिंब-सन् ’63 में। कई महीनों के दौरान लिखी गयी थी यह कविता-‘पुराना क़िला’।]

खा...मो..श !
बोलो मत...
एक भी आवाज़, एक भी सवाल, लबों की हल्की-सी जुम्बिश भी नहीं नहीं,
एक हल्की-सी दबी हुई सिसकी भी नहीं !
हर दीवार के कान हैं
और दीवार के इस पार का हर कान
दीवार के उस पार चुगलखोर मुँह बन जाता है
जहाँ शहंशाह
हकीमों, नजूमियों, खोजों और नक्शानवीसों से घिरे
अपनी ज़िंदगी की आख़िरी रात गुजार रहे हैं !


ख़बरदार !
हिलो मत !
सजदे में झुकने वाला हर धड़ दुआ माँगते हुए
सिर से अलग कर दिया जाएगा
शहंशाह को भरोसा नहीं कि कौन दुआ माँगने वाला
अपने लबादे में खंजर छुपा कर लाया हो !
किले के बाहर रौंदी हुई फसलें, बिछी हुई लाशें, जले हुए गाँव, भुखमरे लोग :
क्या तुम्हारी दुआ उन्हें लगी जो शहंशाह को लगेगी ?


मौत किले के आँगन में आ चुकी है
और शहंशाह के नक्शानवीस अभी तजवीजें पेश कर रहे हैं
कि किले की दीवारें ऊँची कर दी जाएँ
खाइयों में खौलता पानी दौडा दिया जाए
फाटकों पर जहर-बुझे नेजे जड़ दिये जाएँ
अँधेरा, बिल्कुल अँधेरा कर दिया जाए


अँधेरा घुप !
कौन है जो चादर, अगरबत्ती, बेले के फूल और चिराग लाया है
साजिश ! खतरा ! दौड़ो दौड़ो अलमबरदारो
खंजर से टुकड़े-टुकड़े कर दो ये चादर, ये गजरे, ये चिराग
मान लिया कि इस अभागिन के बाप, भाई, प्रेमी और बेटे
शहंशाह की खामख्याली से ऊबड़खाबड़ घाटियों में जाकर खेत रहे
पर इसे क्या हक है कि यह
उनके मजार पर इस अँधेरी रात चिराग रक्खे
उस टिमटिमाती रोशनी में मौत को
शहंशाह के कमरे तक जाती हुई पगडंडी दीख गयी तो ?


न एक चिराग
न एक जुम्बिश
न एक आवाज़


ख़ा मो श !
कौन है जो अँधेरे में मुट्ठियाँ कसे
होठ भींचे एक शब्द के लिए छटपटाता है...
ख़ ब र दा र...


बा अदब...
बा मुलाहिजा...
रास्ता छोड़ो
पीछे हटो
जानते नहीं कौन जा रहे हैं ?
हँसो मत बेअदब !
दु:ख की घड़ी है
दीवाने-खास के खासुलखास विदूषक कतार बाँधे अपने गाँव लौट रहे हैं।
ये हैं जिन्होंने दरबार को हर संकट में राहत दी
कत्लगाह में लुढ़कते हर विद्रोही सिर को
इन्होंने गेंद की तरह उछाल कर दरबार को हँसाया
रियाया के आँसुओं से अभिनन्दन पिरोये
खिंची हुई खालों को ढोलक पर मढ़कर तुकबन्दियाँ बजायीं


अगर मरते वक्त भी ये जहाँपनाह से शिरोपेच और अपनी दक्षिणा लेने गये
तो इन पर खीजो मत-तरस खाओ !
तुम्हें क्या मालूम कि ये बरसों पहले अपने कुटुम्बियों
पड़ोसियों और गाँववालों की फरियाद लेकर आये थे
जहाँपनाह को असलियत बताने !


इनके भयभीत देहातीपन ने जहाँपनाह की दिलबस्तगी की
और तब से ये भयभीत बने रहे दिलबस्तगी की खातिर


हँसो मत
इनके जरीदार दुपट्टों और बड़ी पागों पर !
ये बड़े लोग हैं-
छोटा-सा मुँह लेकर अपने गाँवों को लौटते हुए


इनसे इनके कुटुम्बी, पड़ोसी, गाँववाले पूछेंगे
कि क्या तुमने शहंशाह को असलियत बतायी
तो ये किसमें मुँह छिपायेंगे बिना इन पागों और जरीदार दुपट्टों के
पीछे हटो नामसझो
कौन बेदर्द है जो
मखौल में इनके दुपट्टे खींचता है, पगड़ी उछालता है !


बा...अदब
बा...मुलाहिजा !


एक धुपधुपाती हुई बेडौल मोमबत्ती
खुफिया सुरंगों, जमीदोज तहखानों, चोर-दरवाजों और टेढ़े-मेढ़े जीनों पर घुमायी जा रही है
दीवारों पर खुदे ये किसके पुराने नाम फिर से दर्ज किये जा रहे हैं ?


ये उन अमीर उमरावों के नाम हैं जिन्होंने कभी
मुहरें और पुखराज
बच्चों के मुँह से छीने हुए कौर
नीलम और हीरे
औरतों के बदन से खसोटे हुए जेवर
चमड़े की मुहरबन्द थैलियों में भर कर
शहंशाह को पेशेनजर किये थे !


उनसे किले की दीवारें मजबूत की गयीं
उनसे बेगमात के लिए बिल्लौरी हौज बने
उनसे दीवानखानों के लिए फानूस ढलवाये गये
उनसे मरमरी फर्शों पर इत्र का छिड़काव हुआ
उनसे इन्साफ के घंटे के लिए ठोस सोने की जंजीर ढलवायी गयी
और अब उन तमान बदनीयत अमीर उमरा के नाम
कत्ल का परवाना भेजा जा रहा है
ताकि खुदा के सामने पेशी के वक्त
पाक नीयत शहंशाह के जमीर पर
कोई दाग न छूट जाए


एक धुपधुपाती हुई मोमबत्ती
बिल्लौरी हम्मामों, अन्धी सुरंगों, खुशनुमा फानूसों, खौफनाक तहखानों
इत्र धुले फर्शों, चोरदरवाजों में से घुमायी जा रही है
दीवारों पर खुदे पुराने नामों की शिनाख्त के लिए
उनमें शहंशाह के हमप्याला हमनेवाला जिगरी दोस्तों के नाम हैं !


गजर बजेगा मायूस आवाज में
और सहर होते ही महल का मातमकदा खोल दिया जाएगा !
लटके हुए काले परदे, खुली हुई पवित्र पुस्तकें !


लोग मगर ज्यादा मुस्तैद हैं ताजपोशी के सरंजाम में
पायताने बैठे हुए लोगों का मातम में झुका हुआ सिर
ताज पहनने के लिए उठने का अभ्यास करना चाहता है !
मगर बादशाह ने हाथ के इशारे से लुहार बुलवाये हैं
वे ताज को पीट-पीट कर चौड़ा कर रहे हैं


कल सुबह जब ताज पहनने के लिए सिर एक-एक कर आएँगे
तब ताज कहीं बड़ा लगेगा और सिर बहुत छोटे
और एक-एक कर इन सिरों से ताज
और इन धड़ों से सिर उतार दिये जाएँगे


कल सुबह शहंशाह न होगा
पर बाद मदफन उस पुरमजाक बादशाह का
यह आखिरी मजाक अदा होगा
जिसे देख कर
हँसते-हँसते लोटपोट हो जाएगी वह तमाशबीन रियाया
जो हँसना खिलखिलाना जाने कब का भूल चुकी है !


या मेरे परवरदिगार
मुझ पर रहम कर !
बदनसीब खुसरू की आँखों में दागी गर्म सलाखों से
जियादा तकलीफेदेह है इस बेडौल असलियत को अपनी आँखों देखना
और इसके बाबत कुछ भी न कर पाना !


काश कि मैं भी अपनी निगाहें फेर सकता
मगर मैं क्या करूँ कि तूने मुझे निगाहें दीं कि मैं देखूँ
और मैं तेरे देने को झुठला नहीं पाता !
मौत किले के आँगन में घूम रही है
और वे हैं कि अभी किले की दीवारें ऊँची कर रहे हैं
खाइयों के पास कँटीले झाड़ बोये जा रहे हैं जिनकी जड़े
कब्र में दफन नौजवानों की पसलियों में फूटेंगी


ओ !
तूने मुझे क्यों भेज दिया इस पुराने किले में इस अँधेरी रात :
जहाँ मैं छटपटा रहा हूँ
उस बेचैन चश्मदीदी पुकार की तरह जिसे एक-एक शब्द के लिए
मोहताज कर दिया गया हो !


खा...मो..श !
खबरदा...र !!

First Indian Bicycle Lock_Godrej_1962_याद आया स्वदेशी साइकिल लाॅक_नलिन चौहान

कोविद-19 ने पूरी दुनिया को हिलाकर रख दिया है। इसका असर जीवन के हर पहलू पर पड़ा है। इस महामारी ने आवागमन के बुनियादी ढांचे को लेकर भी नए सिरे ...