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Saturday, October 12, 2019

Pre Independent Delhi in view of a Rajasthani एक राजस्थानी की जुबानी, दिल्ली की कहानी




अंग्रेजों के जमाने में नई दिल्ली के निर्माण में राजस्थान के पत्थर से लेकर राजस्थानियों का अप्रतिम योगदान रहा है। परस्पर सहयोग और आदान-प्रदान के इन संबंधों को लेकर इतिहास में लंबा मौन ही पसरा है। राजस्थान विधानसभा के चार बार सदस्य रहे और मेरवाड़ा क्षेत्र रावत समाज के मूर्धन्य नेता मेजर फतेहसिंह रावत की "मेरा जीवन संघर्ष" शीर्षक वाली आत्मकथा स्वतंत्रता पूर्व दिल्ली और राजपूताने के अनाम पर स्वाभिमानी अप्रवासी राजस्थानियों के कम-जानी पर परस्पर विकास की कहानी बयान करती है।
मेजर फतेहसिंह ने अपने काॅलेज पढ़ाई के दिनों का उल्लेख करते हुए तीस के दशक (1930-40) की दिल्ली का सजीव और सटीक वर्णन किया है।


वे अपने पहली बार राजधानी में आने के कारण के बारे में लिखते हैं कि दिल्ली विश्वविद्यालय के काॅलेज अगस्त में खुल रहे थे इसलिए पत्र-व्यवहार करके रामजस काॅलेज दिल्ली में दाखिला लेने का निर्णय लिया। मैं अगस्त 1935 के दूसरे सप्ताह में प्रातः 4 डाउन ट्रेन से सराय रोहिल्ला स्टेशन पर उतरा और तांगे से आनन्द पर्वत पर स्थित रामजस काॅलेज पहुंचा। काॅलेज में दाखिला लिया और साथ ही छात्रावास में भी। काॅलेज और छात्रावास में दिल्ली के अन्य समकक्ष शिक्षण संस्थानों की अपेक्षा काफी फीस कम ली जाती थी क्योंकि संस्थापक राय साहब ने देहाती क्षेत्रों के छात्रों की कमजोर आर्थिक स्थिति को समझते हुए ही इस संस्थान की स्थापना की थी।

उल्लेखनीय है कि रामजस काॅलेज की स्थापना राय केदारनाथ ने अपने पिता लाला रामजस की स्मृति में 1917 को दिल्ली में की थी। उनका मूल उदेश्य समाज के असमर्थ और साधनहीन छात्रों को शिक्षा देना था। महात्मा गांधी ने राय केदारनाथ के साथ तांगे पर जाकर रामजस काॅलेज की नींव रखी थी। गांधीजी की दिल्ली डायरी के अनुसार, उसी दिन गांधीजी ने काॅलेज का भी निरीक्षण किया और उपस्थित छात्रों के सामने भाषण दिया और समय महत्ता बताई। पुरानी दिल्ली में दरियागंज से शुरू हुआ यह काॅलेज 1924 में दिल्ली के दूसरे इलाके में स्थानांतरित हुआ, जो आज आनंद पर्वत के नाम से जाना जाता है। तब यह स्थान "काला पर्वत" कहलाता था, जिसे राय केदारनाथ ने अपनी लगन और मेहनत से आनंद पर्वत बना दिया। वे इतने निराभिमानी थे कि भवन बनाते समय मजदूरों के साथ ईंटें उठाने में भी पीछे नहीं रहते थे। वे रामजस काॅलेज के पहले प्राचार्य भी बने थे।


मेजर फतेह सिंह के शब्दों में, काॅलेज में दाखिला लेने के शीघ्र बाद मैं राय साहब से मिला, वे ही काॅलेज के प्रिंसिपल थे। अपनी आर्थिक स्थिति उनसे साफ-साफ बता दी तो ट्यूशन फीस माफ कर दी गई। काॅलेज के छात्रों का रहन-सहन बहुत ही साधारण और ग्रामीण परिवेश का था। अधिकांश छात्र कृषक वर्ग से संबंधित थे और प्रायः धोती-कुर्ता में ही काॅलेज आ जाते, कोई-कोई तो सर्दी में रजाई ओढ़कर भी काॅलेज में आ जाते थे। मैं सदा धोती और कुर्ता या कमीज ही पहना करता था और पांवों में चप्पल। जीरो मशीन से बाल कटवाता था जिससे तेल के खर्च से बच जाता था। सर्दी बहुत पड़ती थी क्योंकि काॅलेज ऊंचे पर्वत पर था। सर्दी के मौसम में मैं रेजे की दोहरी चद्दर (दोवड़) ओढ़कर काॅलेज जाया करता था, गर्म कपड़ा तो था नहीं। इससे दिल्ली में उस समय होने वाली ठंडी और जरूरतमंद छात्रों को आवश्यक कपड़े-लत्तों की उपलब्धता की बात साफ होती है।

तत्कालीन रामजस काॅलेज की पढ़ाई और उसके प्राध्यापकों के पढ़ाने के तरीकों का वर्णन करते हुए मेजर फतेह सिंह लिखते हैं कि मैंने बीए में इतिहास (ऑनर्स) में प्रवेश लिया था। क्लास में अकेला था। इतिहास के प्रोफेसर डाक्टर भंडारी थे, जिन्होंने लंदन विश्वविद्यालय से बीए (ऑनर्स)  की डिग्री प्राप्त की थी। काॅलेज के अलावा वे मुझे पढ़ाने छात्रावास में मेरे कमरे में भी आते रहते थे। हर छात्र को एक कमरा मिलता था। भंडारी साहब मेरे काम से बहुत प्रसन्न और प्रभावित थे। उन्होंने सब पाठ्यपुस्तकें एवं इतिहास की अन्य उपयोगी पुस्तकें अपने नाम से काॅलेज पुस्तकालय से निकलवाकर मुझे पढ़ने के लिए दे दी। अतः मेरा पुस्तकें खरीदने का खर्चा भी बच गया था। भंडारी साहब भी दिल्ली, पंजाब तथा यूपी की किसी न किसी विश्वविद्यालय की परीक्षाओं के परीक्षक हुआ करते थे। मुझ पर उनका विशेष स्नेह था। इलाहाबाद विश्वविद्यालय के डाक्टर ईश्वरीप्रसाद (प्रसिद्ध इतिहासकार) और लखनऊ विश्वविद्यालय के डाक्टर बैनीप्रसाद एक बार जब दिल्ली आये तो डाक्टर भंडारी साहब उनसे मिलने दिल्ली रेलवे-स्टेशन पर गये, तब मुझे भी साथ ले गये और उनसे मिलाया था। ऐसे गुरू के प्रति आभार प्रकट करने के लिए मेरे पास कोई पर्याप्त शब्द नहीं हैं।

"जीवन संघर्ष" पुस्तक में तब दिल्ली में काॅलेज स्तर पर छात्रों को प्रदान की जाने वाली सैनिक शिक्षा की जानकारी भी मिलती है। इस बारे में मेजर बताते हैं कि मैं यूटीसी में भर्ती हुआ। रामजस काॅलेज की एक प्लाटून यूटीसी की थी उसके प्लाटून कंमाडर प्रोफेसर बी.डी. शर्मा थे। सारे दिल्ली के काॅलेजों की यूटीसी की एक कम्पनी हुआ करती थी जिसके कम्पनी कमांडर रामजस काॅलेज के ही प्रोफेसर कप्तान रामजीलाल होते थे। परेड हफ्ते में दो बार होती थी, अवधि एक-एक घंटा।

परेड ग्राउंड लालकिला था। लालकिला रामजस काॅलेज से लगभग चार मील दूर था। मैं और एक अन्य अहीर छात्र शायद नाम हरिप्रसाद था, दरियागंज चांदनी चैक होते हुए पैदल ही जाते थे और परेड के बाद पैदल ही वापस आते थे। वर्दी (पोशाक) थी-हैट, खाकी कमीज, खाकी हाॅफपेंट, फुल बूट, पट्टी और कमर पेटी। हमें दो साल में वह प्रशिक्षण दिया गया जो कि एक फौजी रिक्रूट को छह माह में दिया जाता है। प्रशिक्षक अंग्रेज अफसर और एनसीओ होते थे।
बीए (ऑनर्स) की अंतिम वर्ष की परीक्षा के बाद घर लौटने से पहले मैं मेरे कम्पनी कमांडर कप्तान रामजीलाल के मार्फत यूटीसी के स्थानीय सीओ, जो कि एक अंग्रेज कप्तान थे, उनसे मिला और उनसे मेरे यूटीसी में भर्ती होने का उदेश्य बताया और सर्टिफिकेट दिया जिसकी भाषा थी, कैडेट सीखने के लिए बेहद उत्सुक है। अगर वह सैन्य कैरियर को अपनाता है तो यह लगनशीलता उसके लिए फलदायी होगी।
उपरोक्त प्रमाण पत्र लिया, उस रात्रि को मैंने दिल्ली में अपने जीवन की पहली सिनेमा फिल्म "अछूत कन्या" देखी थी। पहले तो कभी सिनेमा देखने के लिए समय और पैसे दोनों ही नहीं थे। दूसरे दिन प्रातः प्रोफेसर डाक्टर भंडारी से आशीर्वाद लिया और रात्रि को 11-अप दिल्ली-अहमदाबाद मेल स्टेशन ट्रेन से 12 घंटे के सफर के बाद ब्यावर पहुंचा। दिल्ली विश्वविद्यालय बीए (ऑनर्स) का परीक्षा परिणाम जून 1937 के अंतिम सप्ताह में घोषित हुआ और मैं दूसरी श्रेणी से पास हुआ।


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