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Monday, October 1, 2018

Mahatma Gandhi on Sita and Ram_गाँधी के सीता-राम






मेरे लिए मेरा राम सीता पति दशरथ नन्दन कहलाते हुए भी वह सर्वशक्तिमान ईश्वर ही हैं जिसका नाम हृदय में होने के मानसिक नैतिक ओर भौतिक सब दुखों का नाश हो जाता है। राम नाम समस्त लोगों का शर्तिया इलाज है। फिर चाहे वे शारीरिक, मानसिक या आध्यात्मिक हों। राम नाम ईश्वर के कई नामों में से ही एक है। गांधी जी कहते हैं रामराज्य-स्वराज्य की परिसीमा है, राम ने एक जन की बात सुनकर प्रजा को संतुष्ट करने के लिए प्राणों के समान प्रिय जगदम्बा सती शिरोमणि जगदम्बा मूर्ति सीता जी का त्याग किया।
राम ने दुष्टों के साथ भी न्याय किया उन्होंने सत्यपालन के लिये राजपाट छोड़कर वनवास भोगा ओर संसार के तमाम राजाओं को उच्चकोटि के सदाचार पालन का दार्शनिक पाठ पढ़ाया। राम ने अखण्ड एक पत्निव्रत का पालन करके राजा प्रजा का है यह दिखा दिया कि, गृहस्थ आश्रम में भी संयम धर्म का पालन किस तरह किया जा सकता है। उन्होंने राज्यासन को सुशोभित करके राज्य इति को लोकप्रिय बनाकर यह सिद्ध कर दिया कि रामराज्य स्वराज्य की परिसीमा है। राजा को लोकमत जानने के लिए आज के आधे अधूरे साधनों की जरूरत कभी न थी राजा प्रजा मत को आंख के इशारे से समझ लेता था प्रजा राम राज्य में आनन्द सागर में हिलोरे लेती थी। ऐसा रामराज्य आज भी हो सकता है। राम का वंश लुप्त नहीं हुआ है।

-महात्मा गाँधी

Saturday, August 4, 2018

Delhi at the time of partition 1947_बंटवारे के दौर की दिल्ली_1947

04082018, दैनिक जागरण 







स्वतंत्रता और विभाजन दोनों की घोषणा 15 अगस्त 1947 को एक साथ हुई। बंटवारे पर असीम कटुता तथा दुख का अनुभव किया गया। जैसे-जैसे पाकिस्तान से धकेले हुए आतंकित हिंदू-सिख दिल्ली में आने लगे वैसे-वैसे राजधानी में उदासी और डर का वातावरण बैठता गया।

प्रसिद्ध पत्रकार कुलदीप नैयर अपनी आत्मकथा, "एक जिन्दगी काफी नहीं" में उस समय का वर्णन करते हुए लिखते है कि 15 सितंबर को मैं दिल्ली पहुंचा तो शहर दंगों की चपेट में था। मुसलमान शहर से भाग रहे थे, उसी तरह जैसे हिन्दू और सिख पश्चिम पंजाब से भाग रहे थे। मुसलमान दिल्ली की गलियों में सुरक्षित नहीं थे, इसलिए उनमें से ज्यादा ने पुराने किले में शरण ले रखी थी। सरदार पटेल और संविधान परिषद के अध्यक्ष राजेन्द्र प्रसाद दोनों ने ही नेहरू के इस प्रस्ताव का विरोध किया था कि दिल्ली के कुछ रिहायशी इलाके मुसलमानों के लिए आरक्षित कर देने चाहिए।

अगस्त 1947 में देश के विभाजन के दौरान हुए रक्त-रंजित दंगों में दिल्ली के मुसलमानों पर भी संकट आया और वे बड़ी संख्या (लगभग दो लाख) में पाकिस्तान चले गये। मुस्लिम लीग का नेतृत्व भी यहां से विदा हुआ। ऐसे ही दिल्ली में 1951 में लगभग जिन पांच लाख हिंदू-सिख शरणार्थियों की गणना की गई थी उनमें से 95 प्रतिशत दिल्ली के शहरी क्षेत्रों में ही बस गए।

प्यारेलाल की पुस्तक "महात्मा गांधीःपूर्णाहुति" के अनुसार, जून के अंतिम भाग में और जुलाई भर गांधीजी राजधानी में रहे। गांधी के शब्दों में, मैं नेताओं के बुलाने पर दिल्ली आया था, लेकिन अगर मुझसे पूछा जाय कि मैंने यहां क्या सिद्व किया, तो मुझे कहना पडे़गा कि उपयोगी कुछ नहीं। गांधी को लगा कि ऐसी स्थिति में मेरा सच्चा स्थान राजधानी में नहीं, किन्तु उन आदमियों के साथ है, जो पलटन टूट जाने पर भी मरते दम तक लड़ते रहते हैं। स्वाधीनता दिवस पर गांधीजी रोज से एक घंटे पहले अर्थात् 2 बजे जाग गये। वह महादेव देसाई का पांचवां श्राद्व दिवस था, इसलिए उन्होंने-ऐसे अवसर पर अपनी प्रथा के अनुसार-प्रातःकालीन प्रार्थना के बाद उपवास रखकर और संपूर्ण गीता का पाठ करके यह दिन मनाया।

आजादी की खुशी में बंटवारे का दर्द का बयान करते हुए "तमस" के लेखक भीष्म साहनी अपनी आत्मकथा "आज के अतीत" में लिखते हैं, मैंने साथ-ही-साथ दिल्ली की सड़कों पर शरणार्थियों की भीड़ भी देखी। एक ओर जश्न का-सा समां, दूसरी ओर बेघर लोगों की बदहाली, पर कुल मिलाकर वातावरण में आजादी की लहर का अधिक प्रभाव था। वे सबसे पहले 1947 में देश को आजादी मिलने का गवाह बनने की ललक से दिल्ली आए थे। बकौल साहनी पिताजी से यह कहकर कि मैं सप्ताह भर में लौट आऊंगा, कि मैं दिल्ली में आजादी का जश्न देखने जा रहा हूँ जब लालकिले पर भारत का झंडा लहराया जाएगा। जबकि दिल्ली पहुंचने की देर थी कि पता चल गया कि लौट पाना असम्भव हो गया है, रेलगाड़ियों का आना-जाना बन्द हो गया था। सहसा ही मेरे लिए सारा चित्रपट बदल गया। मेरे लिए ही क्यों, हमारे परिवार के लिए।

भारत की पहली महिला मुख्यमंत्री (उत्तर प्रदेश) और प्रसिद्ध गांधीवादी सुचेता (मजूमदार) कृपलानी ने अपनी मधुरिम आवाज में संवैधानिक सभा में 14 अगस्त, 1947 की रात को एक विशेष सत्र के दौरान वंदे मातरम और जन-गण-मन गाया था। "गांधी बोध: गांधीवादियों के साथ फ्रेड जे ब्लूम का संवाद" पुस्तक में दिए एक साक्षात्कार में सुचेता के ही शब्दों में, विभाजन के उपरान्त जब शरणार्थी आ रहे थे, मैंने बहुत काम किया। वास्तव में, मैंने सरकार की ओर से उनकी देखरेख की जिम्मेदारी के लिए राजी होने के पूर्व ही पहल करते हुए शरणार्थियों को संगठित किया। सुचेता ने इसके लिए राजेन्द्र बाबू की अध्यक्षता में एक समिति बनाई। बकौल सुचेता, मैंने सभी चीजें व्यवस्थित की और मैं दिल्ली में सैंकड़ों शरणार्थियों की देखभाल कर रही थी। बाद में, हम दूसरे भागों में भी फैले। शिविरों का संचालन करते हुए दो मास उपरान्त मेरे पास देखरेख में तीस हजार से भी ज्यादा लोग थे।



Saturday, January 14, 2017

Ramkinker Baij on questing Gandhi_ गाँधी के अनुकरण पर रामकिंकर बैज


रामकिंकर बैज



"आज गांधी की मूर्तियां बनाने के महत्वपूर्ण कलाकार माने जाते हैं। क्या मुझे एक कलाकार के रूप में पहचाने जाने के लिए निरंतर गांधी की मूर्तियां बनानी होंगी?"

-रामकिंकर बैज, गाँधी के अँधा-अनुकरण पर 

Saturday, December 24, 2016

Obituary_Anupam Mishra_Aaj bhi khare hai talab

अनुपम आखर वाले आख्यान की इति!



"कठोपनिषद् मेरे लिए तो बहुत ही कठोर निकला। मैं इससे मृत्यु को जान नहीं पाया। मृतकों को तब भी जाना था और आज तो उस सूची में, उस ज्ञान में वृद्धि भी होती जा रही है। फिर इतना तो पता है किसी एक छिन या दिन इस सुंदर सूची में मुझे भी शामिल हो जाना है। उस सुंदर सूची को पढ़ने के लिए तब मैं नहीं रहूंगा।"


देश के हिंदी समाज के पानी ही नहीं बल्कि भाषा की भी उतनी ही चिंता करने वाले अनुपम मिश्र के "पुरखों से संवाद" लेख की यह पंक्तियां उनके आंखों के पानी यानी जीवन दृष्टि को रेखांकित करती है। यह अनायास नहीं है कि जल जैसे नीरस विषय पर सरस भाषा में "आज भी खरे हैं तालाब" सरीखी पुस्तक लिखने वाले अनुपम का जन्म "जिस तरह हम बोलते हैं, उस तरह तू लिख और इसके बाद भी हमसे बड़ा तू दिख" पंक्ति लिखने वाले कवि और गांधी वांड्मय के हिंदी संस्करण के संपादक भवानी प्रसाद मिश्र के घर आंगन (वर्धा- १९४८) में हुआ।


१९६८ में दिल्ली विश्वविद्यालय से संस्कृत पढ़ने के बाद नई दिल्ली स्थित गाँधी शांति प्रतिष्ठान के प्रकाशन विभाग में सामाजिक काम और पर्यावरण पर लिखने के साथ अपनी मृत्यु तक "गाँधी मार्ग" पत्रिका का संपादन किया। इस अनुपम जीवन यात्रा में उनका ताना-बाना और ठिकाना अपरिवर्तित रहा।
उत्तराखंड के चिपको आंदोलन पर पहली रपट लिखने वाले अनुपम की "हमारा पर्यावरण" और "राजस्थान की रजत कण बूंदे" शीर्षक वाली पुस्तकें उनके प्रकृति के प्रति ममत्व और अक्षर के प्रति प्रेम के तादात्मय का प्रतीक है। आज अनुपम की पुस्तकें जल संरक्षण के देशज ज्ञान के क्षेत्र में मील का पत्थर हैं।


पिछले दो दशक में देश की सर्वाधिक पढ़ी गई पुस्तकों में से एक आज भी खरे हैं तालाब बिना कॉपीराइट वाली अकेली ऐसी पुस्तक है, जिसे इसके मूल प्रकाशक से अधिक अन्य प्रकाशकों ने अलग-अलग भारतीय भाषाओं और फ्रांसीसी में दो लाख से अधिक प्रतियों को छापा है। जनसत्ता के संस्थापक-संपादक और उन्हें पत्रकारिता में लाने वाले प्रभाष जोशी के शब्दों में, अनुपम ने तालाब को भारतीय समाज में रखकर देखा है। सम्मान से समझा है। अद्भुत जानकारी इकट्टी की है और उसे मोतियों की तरह पिरोया है। कोई भारतीय ही तालाब के बारे में ऐसी किताब लिख सकता है।


यह पुस्तक अनुपम के दिल्ली के महानगरीय समाज के चुकते पानी और राजधानी की समृद्व जल पंरपरा वाली विरासत के छीजने की चिंता की साक्षी भी है। अंग्रेजी राज में अनमोल पानी का मोल लगने की बात पर पुस्तक बताती है कि इधर दिल्ली के तालाबों की दुर्दशा की नई राजधानी बन चली थी। अंग्रेजों के आने से पहले तक यहां 350 तालाब थे। इन्हें भी राजस्व के लाभ-हानि की तराजू पर तौला गया और कमाई न दे पाने वाले तालाब राज के पलड़े से बाहर फेंक दिए गए।


दिल्ली के समाज की यमुना नदी की साझ-संभाल और चिंता करने की बात को उजागर करती हुई पुस्तक बताती है कि घाटों पर अखाड़ों का चलन भी इसी कारण रहा होगा। सन् 1900 तक दिल्ली में यमुना के घाटों पर अखाड़े के स्वयंसेवकों का पहरा रहा करता था। इसी तरह यहां के तालाब और बावड़ियां अखाड़ों की देखरेख में साफ रखी जाती थीं। आज जहां दिल्ली विश्वविद्यालय है, वहां मलकागंज के पास कभी दीना का तालाब था। इसके अखाड़े में देश-विदेश के पहलवानों के दंगल आयोजित होते थे।


राजधानी के समाज-राज-स्त्री के अंर्तसंबंध की सामाजिक-सांस्कृतिक परिघटना भी उनकी अंतदृष्टि से ओझल नहीं होती है। वे बताते हैं कि उसी दौर में दिल्ली में नल लगने लगे थे। इसके विरोध की एक हल्की सी सुरीली आवाज सन् 1900 के आसपास विवाहों के अवसर पर गाई जाने वाली गारियों, विवाह गीतों में दिखी थी। बारात जब पंगत में बैठती तो स्त्रियां "फिरंगी नल मत लगवाय दियो" गीत गातीं। लेकिन नल लगते गए और जगह-जगह बने तालाब, कुंए और बावड़ियों के बदले अंग्रेज द्वारा नियंत्रित वाटर वर्क्स से पानी आने लगा।


इतना ही नहीं, किताब के अनुसार, लालकिले के लाहौरी गेट के सामने बनी लाल डिग्गी की सूचना उर्दू में लिखी सर सैयद अहमद खां की पुस्तक "आसारूस सनादीद" (सन् 1864) में है। पाठकों को यह जानकर अचरज होगा कि लाल डिग्गी तालाब एक अंग्रेज लार्ड एडिनवरो ने बनवाया था और राज करने वालों के बीच यह उन्हीं के नाम पर जाना जाता था। लेकिन दिल्ली वाले इसे लाल डिग्गी ही कहते रहे, क्योंकि 500 फीट लंबा और 150 फीट चौड़ा यह तालाब लाल पत्थरों से बना था। हर्न की सन् 1906 में प्रकाशित पुस्तक "सेवन सिटीज ऑफ़ डेली" में लाल डिग्गी का सुंदर विवरण मिलता है। दिल्ली के अन्य तालाबों, नहरों, बावड़ियों के बारे में काॅर स्टीफन की "आर्कियोलाॅजी एंड मान्यूमेंटल रीमेंस ऑफ़ डेली" (सन् 1876) और जी पेज द्वारा चार खंडों में संपादित "लिस्ट ऑफ़ मोहम्मडन एंड हिंदू मान्यूमेंट्स, डेली प्राॅविन्स " (सन् 1933) से भी बहुत मदद मिलती है।

पेड़ों को कटने से रोकने के लिए शुरू हुए "चिपको आंदोलन" से लेकर हिंदी क्षेत्र के पानी की विरासत का पुर्नपाठ और समाज को मरते तालाबों को जिलाने की संजीवनी देने का काम कोई कर सकता था तो अनुपम मिश्र। लेकिन कोई कहे कि वही लिखने के अधिकारी हैं तो सात आसमानों से परे गांधी मुद्रा में दो हाथ विनम्रता से जुड़े दिखेंगे।



First Indian Bicycle Lock_Godrej_1962_याद आया स्वदेशी साइकिल लाॅक_नलिन चौहान

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