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22/02/2020, दैनिक जागरण |
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Saturday, February 22, 2020
Saturday, February 1, 2020
Mahatma Gandhi and Sardar Patel_Two sides of same coin_एक दूसरे के पूरक थे, गांधी और पटेल
मेरा दिल भरा हुआ है। क्या कहूं क्या न कहूं ? जबान चलती नहीं है। आज का अवसर भारतवर्ष के लिए सब से बड़े दुख, शोक और शर्म का अवसर है।
पिछले चन्द दिनों से उनका दिल खट्टा हो गया था और आप जानते हैं कि आखिर उन्होंने उपवास भी किया। उपवास में चले गए होते, तो अच्छा होता। इस समय पर ही उनको जाना था। आज वह भगवान के मंदिर पहुंच गए!
देश के पहले उपप्रधानमंत्री और गृहमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल ने यह बात 30 जनवरी 1948 को दिल्ली में गांधी जी की हत्या के एकदम बाद हुई एक सार्वजनिक सभा में जन साधारण को संबोधित करते हुए कही। ऐसी शोक की घड़ी में भी आत्मसंयम का परिचय देते हुए उन्होंने कहा कि यह बड़े दुख का, बड़े दर्द का समय है, लेकिन यह गुस्से का समय नहीं है। क्योंकि अगर हम इस वक्त गुस्सा करें, तो यह सबक उन्होंने हमको जिन्दगी भर सिखाया, उसे हम भूल जायेंगे! और कहा जायेगा कि उनके जीवन में तो हमने उनकी बात नहीं मानी, उनकी मृत्यु के बाद भी हमने नहीं माना। हम पर यह धब्बा लगेगा। तो मेरी प्रार्थनाा है कि कितना भी दर्द हो, कितना भी दुख हो, कितना भी गुस्सा आए, लेकिन गुस्सा रोककर अपने पर काबू रखिए। अपने जीवन में उन्होंने हमें जो कुछ सिखाया, आज उसी की परीक्षा का समय है। बहुत शान्ति से, बहुत अदब से, बहुत विनय से एक दूसरे के साथ मिलकर हमें मजबूती से पैर जमीन पर रखकर खड़ा रहना है।
सरदार पटेल ने हिंदुस्तान के सार्वजनिक जीवन में गांधी की सर्वव्यापी उपस्थिति के अभाव को रेखांकित करते हुए कहा कि उनका एक सहारा था और हिन्दुस्तान को वह बहुत बड़ा सहारा था। हमको को जीवन भर उन्हीं का सहारा था। आज वह चला गया! वह चला तो गया, लेकिन हर रोज, हर मिनिट वह हमारी आंखों के सामने रहेगा! हमारे हृदय के सामने रहेगा! क्योंकि जो चीज वह हमको दे गया है, वह तो कभी हमारे पास से जाएगी नहीं! आप जानते हैं कि हमारे ऊपर जो बोझ पड़ रहा है, वह इतना भारी है कि करीब-करीब हमारी कमर टूट जाएगी।
उस दुखद घड़ी में भी एक उत्तम नेता के दुर्लभ गुण का प्रदर्शन करते हुए उन्होंने आशावादिता का दृष्टिकोण रखते हुए कहा कि कल चार बजे उनकी मिट्टी तो भस्म हो जाएगी, लेकिन उनकी आत्मा तो अब भी हमारे बीच में है। अभी भी वह हमें देख रही है कि हम लोग क्या कर रहे हैं। वह तो अमर है। मैं उम्मीद करता हूँ और हम सब ईश्वर से यह प्रार्थना करेंगे कि जो काम वह हमारे ऊपर बाकी छोड़ गए हैं, उसे पूरा करने में हम कामयाब हों। मैं यह भी उम्मीद करता हूँ कि इस कठिन समय में भी हम पस्त नहीं हो जाएंगे, हम नहिम्मत भी नहीं हो जाएंगे।
फिर 2 फरवरी 1948 को रामलीला मैदान में गांधीजी की शोकसभा में सरदार पटेल के मन की पीड़ा फूट पड़ी। उन्होंने गांधी के साथ स्वयं के अभिन्न जुड़ाव और राष्ट्रीय जीवन में उनके प्रतिम योगदान को बताते हुए कहा कि जब से गांधीजी हिन्दुस्तान में आए तब से, या जब मैंने जाहिर जीवन शुरु किया तब से, मैं उनके साथ रहा हूँ । अगर वे हिंदुस्तान न आए होते, तो मैं कहां जाता और क्या करता, उसका जब मैं ख्याल करता हूँ तो एक हैरानी-सी होती है।
महात्मा गांधी ने कारागार से लिखे एक पत्र में सरदार पटेल के बारे में लिखा था कि मेरी कठिनाई यह है कि तुम मेरे साथ नहीं हो इसलिए मैं एकलव्य बनने का प्रयास कर रहा हूँ कि जिसने द्रोणाचार्य की अस्वीकृति के बाद अपने समक्ष द्रोणाचार्य की मिट्टी की प्रतिमा रखकर तीरदांजी सीखी थी। मैं उसी तरह, तुम्हारी छवि का स्मरण करते हुए अपने प्रश्न उसके समक्ष रखता हूँ।
उसी शोकाकुल पटेल ने गांधी स्मृति को लेकर रामलीला मैदान में कहा कि तीन दिन से मैं सोच रहा हूँ कि गांधीजी ने मेरे जीवन में कितना पलटा किया और इसी तरह से लाखों आदमियों के जीवन को उन्होंने किस तरह से पलटा? यदि वह हिन्दुस्तान में न आए होते तो राष्ट्र कहां जाता? हिन्दुस्तान कहां होता? सदियों से हम गिरे हुए थे। वह हमें उठाकर कहां तक ले आए? उन्होंने हमें आजाद बनाया। उनके हिंदुस्तान आने के बाद क्या-क्या हुआ और किस तरह से उन्होंने हमें उठाया, कितनी दफा किस-किस प्रकार की तकलीफें उन्होंने उठाई, कितनी दफे वह जेलखाने में गए और कितनी दफे उपवास किया, यह सब आज ख्याल आता है। कितने धीरज से, कितनी शान्ति से वह तकलीफें उठाते रहे, और आखिर आजादी के सब दरवाजे पार कर हमें उन्होंने आजादी दिलवाई।
Monday, October 1, 2018
Mahatma Gandhi on Sita and Ram_गाँधी के सीता-राम
मेरे लिए मेरा राम सीता पति दशरथ नन्दन कहलाते हुए भी वह सर्वशक्तिमान ईश्वर ही हैं जिसका नाम हृदय में होने के मानसिक नैतिक ओर भौतिक सब दुखों का नाश हो जाता है। राम नाम समस्त लोगों का शर्तिया इलाज है। फिर चाहे वे शारीरिक, मानसिक या आध्यात्मिक हों। राम नाम ईश्वर के कई नामों में से ही एक है। गांधी जी कहते हैं रामराज्य-स्वराज्य की परिसीमा है, राम ने एक जन की बात सुनकर प्रजा को संतुष्ट करने के लिए प्राणों के समान प्रिय जगदम्बा सती शिरोमणि जगदम्बा मूर्ति सीता जी का त्याग किया।
राम ने दुष्टों के साथ भी न्याय किया उन्होंने सत्यपालन के लिये राजपाट छोड़कर वनवास भोगा ओर संसार के तमाम राजाओं को उच्चकोटि के सदाचार पालन का दार्शनिक पाठ पढ़ाया। राम ने अखण्ड एक पत्निव्रत का पालन करके राजा प्रजा का है यह दिखा दिया कि, गृहस्थ आश्रम में भी संयम धर्म का पालन किस तरह किया जा सकता है। उन्होंने राज्यासन को सुशोभित करके राज्य इति को लोकप्रिय बनाकर यह सिद्ध कर दिया कि रामराज्य स्वराज्य की परिसीमा है। राजा को लोकमत जानने के लिए आज के आधे अधूरे साधनों की जरूरत कभी न थी राजा प्रजा मत को आंख के इशारे से समझ लेता था प्रजा राम राज्य में आनन्द सागर में हिलोरे लेती थी। ऐसा रामराज्य आज भी हो सकता है। राम का वंश लुप्त नहीं हुआ है।
-महात्मा गाँधी
Saturday, September 22, 2018
RSS_in view of Mahatma Gandhi to Mohan Bhagwat_संघ दृष्टि: गांधी से लेकर भागवत तक
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वर्तमान सरसंघचालक मोहन भागवत ने दिल्ली में“भविष्य का भारत-राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का दृष्टिकोण” विषय पर तीन दिवसीय (17-19 सितंबर 2018) कार्यक्रम में अपने संगठन की रीति-नीति और कार्य के सिद्वांत, स्वरूप, और अवधारणा की खुली चर्चा की। यह देश के इतिहास में एक संयोग ही कहा जा सकता है कि आज से ठीक 71 साल पहले महात्मा गांधी ने 16 सितंबर 1947 को नई दिल्ली नगर पालिका परिषद् में स्थित आज की वाल्मीकि बस्ती में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की रैली में उसके सदस्यों से अपनी मन की बात कही थी। भारत सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की ओर से पूरे १०० खण्डों के महात्मा गाँधी वांग्मय में यह पूरा वर्णन (खंड ९६) सविस्तार से प्रकाशित है।
गाँधी ने कहा कि वे बरसों पहले वर्धा में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शिविर में गए थे जब उसके संस्थापक श्री हेडगेवार (डाक्टर केशव बलिराम हेडगेवार) जीवित थे। दिवंगत श्री जमनालाल बजाज उन्हें शिविर में ले गए थे और वे संघ के अनुशासन, किसी भी तरह की छुआछूत न होने और बेहद सादगी से काफी प्रभावित हुए थे। तब से संघ का विस्तार हुआ है। गाँधी का मानता था कि जिस संगठन में सेवा का लक्ष्य और सच्चा त्यागभाव रहता है, उसकी ताकत बढ़ती ही है। पर सही मायने में उपयोगी होने के लिए आत्मोसर्ग के साथ लक्ष्य के प्रति शुचिता और सच्चे ज्ञान का समावेष होना आवश्यक है। इन दोनों के बिना त्याग समाज के लिए दुखदायी हो सकता है।
आरंभ में जो प्रार्थना गाई गई, जिसमें भारत माता, हिंदू संस्कृति और हिंदू धर्म का गुणगान था। उन्होंने (गांधी) दावा किया कि वे सनातनी हिंदू हैं। उन्होंने “सनातन” शब्द के मूल अर्थ बताया। हिंदू शब्द का सच्चा मूल क्या है, यह बहुत ही कम लोग जानते हैं। यह नाम हमें दूसरों ने दिया और हमने उसे अपना लिया। हिंदू धर्म ने दुनिया के सभी मतों की अच्छी चीजों को समाहित (अपने में पचा लेने की ताकत) किया है और इस अर्थ में यह एक विशिष्ट महजब नहीं है। इसी कारण उसका इस्लाम या उसके अनुनायियों के कोई झगड़ा नहीं हो सकता जो कि दुर्भाग्य से आज का मसला है।
जब अस्पृश्यता का विष हिंदू धर्म में प्रविष्ट हुआ, तो उसका पतन शुरू हुआ। एक बात निश्चित थी कि वे (गांधी) सार्वजनिक रूप से घोषित कर रहे थे कि अगर अस्पृश्यता कायम रहेगी तो हिंदू धर्म को मरना होगा। इसी प्रकार, अगर हिंदुओं का यह मानना है कि भारत में हिंदुओं को छोड़कर किसी और के लिए कोई स्थान नहीं है और यदि गैर हिंदुओं, विशेष रूप से मुस्लिम अगर यहां रहने की इच्छा रखते हैं, तो उन्हें हिंदुओं के दासों के रूप में रहना होगा तो ऐसा विचार रखकर वे हिंदू धर्म को समाप्त देंगे। इसी तरह से, यदि पाकिस्तान यह मानता है कि पाकिस्तान में केवल मुस्लिमों को ही रहने का हक है और गैर-मुसलमानों को वहां पीड़ित और उनके गुलामों की तरह वहां रहना पड़ेगा, तो यह भारत में इस्लाम के लिए मौत की घंटी होगी।
वे (गांधी) कुछ दिन पहले उनके (संघ) गुरूजी (संघ के दूसरे सरसंघचालक माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर उपाख्य गुरूजी) से मिले थे। उन्होंने गुरूजी से कलकत्ता और दिल्ली में संघ के विषय में उन्हें मिली शिकायतों के बारे में बताया। गुरूजी ने उन्हें आश्वस्त किया कि वैसे तो वे संघ के प्रत्येक सदस्य के उचित आचरण की बात सुनिश्चित नहीं कर सकते पर इतना निश्चित है कि संघ की नीति पूरी तरह से हिंदुओं और हिंदू धर्म की सेवा करना है और वह भी किसी दूसरे को हानि पहुंचाकर कतई नहीं। संघ आक्रमकता में विश्वास नहीं रखता। वह आत्मरक्षा की कला सिखाता है। उसने कभी प्रतिशोध की बात नहीं सिखायी।
संघ एक संगठित, अनुशासित संगठन था जिसकी शक्ति का प्रयोग भारत के हित में या अहित में हो सकता था। उन्हें (गाँधी) नहीं पता कि क्या संघ के खिलाफ लगाए गए आरोपों में कोई सत्यता थी या नहीं। अपने समरूप व्यवहार से आरोपों को निराधार साबित करने का दायित्व संघ का था।
1947 में हुए भारत विभाजन के बाद दिल्ली में पाकिस्तान से सर्वाधिक हिंदू-सिख शरणार्थियों ने अपना डेरा जमाया। इतना ही नहीं, राजधानी भी सांप्रदायिक दंगों की मार से अछूती नहीं थी। ऐसी विपरीत परिस्थिति में महात्मा गांधी राजधानी में शांति-सद्भाव कायम करने के प्रयासों में लगे थे।
11 सिंतबर 1947 को गांधी की ओर अखबारों को जारी एक प्रेस वक्तव्य के अनुसार, आज राजकुमारी अमृतकौर और डाॅक्टर सुशीला नैयर मुझे इरविन अस्पताल ले गई थी। वहां पर जात वगैरह का कोई भेदभाव रखे बगैर सिर्फ जख्मी लोगों का ही इलाज किया जाता है। मरीजों में एक बच्चा था, जिसकी उमर मुश्किल से पांच बरस की होगी। गोली लगने से उसके बदन पर घाव हो गया था। डाक्टर और नर्सों पर काम का भारी बोझ था, वहां मुसलमान मरीजों की तादाद ज्यादा थी, क्योंकि हिंदू और सिख मरीजों को दूसरे अस्पतालों में भेज दिया गया था।
राजकुमारी से मुझे पता चला कि प्रयास शरणार्थी कैंपों में पाखाने साफ करने के लिए सफाई कर्मियों को भेजना करीब-करीब नामुमकिन है। इससे हैजे-जैसी छूत की बीमारी के फैलने का डर है। मेरी राय में शरणार्थियों को अपने-अपने कैपों में खुद सफाई करनी चाहिए। पाखाने भी उन्हें साफ करने चाहिए और कैंप-व्यवस्था की स्वीकृति से कुछ उपयोगी काम करना चाहिए। सिर्फ उन लोगों को छोड़कर, जो शारीरिक मेहनत नहीं कर सकते, बाकी सब पर यह नियम लागू होता है। सारे शरणार्थी-कैंप सफाई, सादगी और मेहनत के नमूने होने चाहिए। उल्लेखनीय है कि यह वक्तव्य "हरिजन" अखबार के 21 सिंतबर 1947 के अंक में भी प्रकाशित हुआ था।
Sunday, January 22, 2017
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