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Friday, March 6, 2020

Pushkar_Water_Mountain_Desert_पुष्कर _राजस्थान




राजस्थान के पुष्कर में पहाड़, पानी और मरुस्थल का एक साथ होना इस बात का प्रमाण है कि प्रकृति में हर स्थिति संभव है.

प्रकृति का ऐसा वरदान शायद ही धरती में और कहीं हो.

Saturday, July 7, 2018

water in the old maps of delhi_प्रकृति-पानी की कहानी बताते दिल्ली के नक्शे




आज से लगभग दो सौ साल पहले पुरानी दिल्ली (तब शाहजहांनाबाद) में अंसख्य बागों के साथ पानी की एक बड़ी नहर बहती थी। आज ये दोनों चीजें, बाग और नहर, बीते समय की बात बन कर रह गई हैं क्योंकि अब इनका कोई भौतिक अवशेष बाकी नहीं है। दिल्ली के पुराने नक्शों में झांकने से न केवल दिल्ली के इतिहास बल्कि शहर के पानी, जल निकायों और यमुना नदी से आबादी के अंर्तसंबंधों का पता चलता है। केवल इतना ही पिछली दो शताब्दियों में पानी को लेकर दिल्ली में बदलते समीकरणों का खुलासा भी होता है।
“एंटीक्यूटीस ऑफ दिल्ली” शीर्षक वाला सबसे पुराना रंगीन नक्शा (1803-1857 के बीच में बना) नदियों और नहरों को नीले, बसावट वाले इलाकों को लाल और सड़कों तथा रास्तों को पीले रंग में दर्शाता है। जबकि अंग्रेज सर्वेक्षक एफ एस व्हाईट का बनाया “1807 का दिल्ली के परिवेश” शीर्षक वाले मानचित्र में नीले रंग से नदियों और धाराओं का तो छायांकन चिन्ह से रिज और पहाड़ियों की उपस्थिति को बताया गया है। इस नक्शे की सबसे बड़ी विशेषता एक नहर है, जिसका उद्गम स्थल शाहजहांनाबाद से दर्शाया गया है। यह बात नक्शे के ऊपरी बाईं ओर संकेत रूप में देखने को मिलती है पर अफसोस कि आज की तारीख में इसका कोई अस्तित्व नजर नहीं आता है।
“दिल्ली या शाहजहांनाबाद के पर्यावरण का त्रिभुजीय सर्वेक्षण” शीर्षक वाला मानचित्र वर्ष 1808 की दिल्ली और उसके पास पड़ोस के परिवेश को दर्शाता है। इस नक्शे में खास तौर से यमुना नदी के बाएं ओर के इलाके को प्रदर्शित किया गया है। 1807 के दिल्ली के परिवेश शीर्षक वाले मानचित्र में अब बेकार हो चुकी नहर को प्रमुखता से दिखाते हुए पुरानी नहर बताया गया है। “1812 का दिल्ली की योजना” शीर्षक का नक्शा अंग्रेजों के अधिकार क्षेत्र वाले शाहजहांनाबाद में सैकड़ों बागों की उपस्थिति को दर्शाता है। अब यह बात स्पष्ट नहीं है कि ये बाग शहर के उत्तरी भाग के नजदीक होने की वजह से पनपे या फिर एक कृत्रिम नहर की निकटता के कारण।
“दिल्ली-1857” शीर्षक वाले मानचित्र में यमुना नदी के पूर्वी किनारे से शहर में घुसने के एकमात्र प्रवेश बिंदु के रूप में नौकाओं का पुल का संकेत है जो कि उसके सामरिक महत्व के साथ राजधानी की जल-जीवन रेखा के अस्तित्व को दर्शाता है। इसी अवधि का “1857 में दिल्ली” शीर्षक वाला एक अन्य श्वेत-श्याम नक्शा इस कारण से विलक्षण है कि उसमें दिल्ली की पहाड़ियों और पेड़ों को लाक्षणिक रूप में दर्शाने के साथ नदियों और नहरों को लहरदार लकीरों के रूप में प्रदर्शित किया गया जो कि नक्शों के मामलों में लीक से हटकर बात है।
इसी तरह, “दिल्ली का घेराबंदी” शीर्षक वाला एक महत्वपूर्ण श्वेत-श्याम सैन्य मानचित्र] अँग्रेजी सैन्य व्यवस्था के साथ-साथ दिल्ली रिज की स्थलाकृति को भी दर्शाता है। जबकि “पश्चिमी जमुना नहर” शीर्षक वाला नक्शा अपने नाम को चरितार्थ करते हुए, पूरे दिल्ली क्षेत्र की प्रस्तावित और तैयार सिंचाई नहरों और जल निकासी कार्यों को दिखाता है। तब दिल्ली का विस्तार यमुना नदी के पूर्व से से लेकर बहादुरगढ़ कस्बे के पश्चिम तक था। नक्शे के दाईं तरफ इस विषय में लिखित जानकारी दर्ज है। इस नक्शे में राजधानी के तीन जल स्रोत नीले रंग में अंकित हैं। जिसमें जमुना नदी, दिल्ली नहर और नजफगढ़ झील प्रमुख है। दिलचस्प बात यह है कि शाहजहांनाबाद के हल्के, लाल संकेतक, नक्शे के बीच में ध्यान आकर्षित करते है, जहां से जल प्रवाह की व्यवस्था को इंगित करती लाल रेखाएं शुरू होती हैं। “1807 का दिल्ली के परिवेश” शीर्षक नक्शा में भी इसी जल स्त्रोत के होने की ताकीद करता है।

Saturday, December 24, 2016

Obituary_Anupam Mishra_Aaj bhi khare hai talab

अनुपम आखर वाले आख्यान की इति!



"कठोपनिषद् मेरे लिए तो बहुत ही कठोर निकला। मैं इससे मृत्यु को जान नहीं पाया। मृतकों को तब भी जाना था और आज तो उस सूची में, उस ज्ञान में वृद्धि भी होती जा रही है। फिर इतना तो पता है किसी एक छिन या दिन इस सुंदर सूची में मुझे भी शामिल हो जाना है। उस सुंदर सूची को पढ़ने के लिए तब मैं नहीं रहूंगा।"


देश के हिंदी समाज के पानी ही नहीं बल्कि भाषा की भी उतनी ही चिंता करने वाले अनुपम मिश्र के "पुरखों से संवाद" लेख की यह पंक्तियां उनके आंखों के पानी यानी जीवन दृष्टि को रेखांकित करती है। यह अनायास नहीं है कि जल जैसे नीरस विषय पर सरस भाषा में "आज भी खरे हैं तालाब" सरीखी पुस्तक लिखने वाले अनुपम का जन्म "जिस तरह हम बोलते हैं, उस तरह तू लिख और इसके बाद भी हमसे बड़ा तू दिख" पंक्ति लिखने वाले कवि और गांधी वांड्मय के हिंदी संस्करण के संपादक भवानी प्रसाद मिश्र के घर आंगन (वर्धा- १९४८) में हुआ।


१९६८ में दिल्ली विश्वविद्यालय से संस्कृत पढ़ने के बाद नई दिल्ली स्थित गाँधी शांति प्रतिष्ठान के प्रकाशन विभाग में सामाजिक काम और पर्यावरण पर लिखने के साथ अपनी मृत्यु तक "गाँधी मार्ग" पत्रिका का संपादन किया। इस अनुपम जीवन यात्रा में उनका ताना-बाना और ठिकाना अपरिवर्तित रहा।
उत्तराखंड के चिपको आंदोलन पर पहली रपट लिखने वाले अनुपम की "हमारा पर्यावरण" और "राजस्थान की रजत कण बूंदे" शीर्षक वाली पुस्तकें उनके प्रकृति के प्रति ममत्व और अक्षर के प्रति प्रेम के तादात्मय का प्रतीक है। आज अनुपम की पुस्तकें जल संरक्षण के देशज ज्ञान के क्षेत्र में मील का पत्थर हैं।


पिछले दो दशक में देश की सर्वाधिक पढ़ी गई पुस्तकों में से एक आज भी खरे हैं तालाब बिना कॉपीराइट वाली अकेली ऐसी पुस्तक है, जिसे इसके मूल प्रकाशक से अधिक अन्य प्रकाशकों ने अलग-अलग भारतीय भाषाओं और फ्रांसीसी में दो लाख से अधिक प्रतियों को छापा है। जनसत्ता के संस्थापक-संपादक और उन्हें पत्रकारिता में लाने वाले प्रभाष जोशी के शब्दों में, अनुपम ने तालाब को भारतीय समाज में रखकर देखा है। सम्मान से समझा है। अद्भुत जानकारी इकट्टी की है और उसे मोतियों की तरह पिरोया है। कोई भारतीय ही तालाब के बारे में ऐसी किताब लिख सकता है।


यह पुस्तक अनुपम के दिल्ली के महानगरीय समाज के चुकते पानी और राजधानी की समृद्व जल पंरपरा वाली विरासत के छीजने की चिंता की साक्षी भी है। अंग्रेजी राज में अनमोल पानी का मोल लगने की बात पर पुस्तक बताती है कि इधर दिल्ली के तालाबों की दुर्दशा की नई राजधानी बन चली थी। अंग्रेजों के आने से पहले तक यहां 350 तालाब थे। इन्हें भी राजस्व के लाभ-हानि की तराजू पर तौला गया और कमाई न दे पाने वाले तालाब राज के पलड़े से बाहर फेंक दिए गए।


दिल्ली के समाज की यमुना नदी की साझ-संभाल और चिंता करने की बात को उजागर करती हुई पुस्तक बताती है कि घाटों पर अखाड़ों का चलन भी इसी कारण रहा होगा। सन् 1900 तक दिल्ली में यमुना के घाटों पर अखाड़े के स्वयंसेवकों का पहरा रहा करता था। इसी तरह यहां के तालाब और बावड़ियां अखाड़ों की देखरेख में साफ रखी जाती थीं। आज जहां दिल्ली विश्वविद्यालय है, वहां मलकागंज के पास कभी दीना का तालाब था। इसके अखाड़े में देश-विदेश के पहलवानों के दंगल आयोजित होते थे।


राजधानी के समाज-राज-स्त्री के अंर्तसंबंध की सामाजिक-सांस्कृतिक परिघटना भी उनकी अंतदृष्टि से ओझल नहीं होती है। वे बताते हैं कि उसी दौर में दिल्ली में नल लगने लगे थे। इसके विरोध की एक हल्की सी सुरीली आवाज सन् 1900 के आसपास विवाहों के अवसर पर गाई जाने वाली गारियों, विवाह गीतों में दिखी थी। बारात जब पंगत में बैठती तो स्त्रियां "फिरंगी नल मत लगवाय दियो" गीत गातीं। लेकिन नल लगते गए और जगह-जगह बने तालाब, कुंए और बावड़ियों के बदले अंग्रेज द्वारा नियंत्रित वाटर वर्क्स से पानी आने लगा।


इतना ही नहीं, किताब के अनुसार, लालकिले के लाहौरी गेट के सामने बनी लाल डिग्गी की सूचना उर्दू में लिखी सर सैयद अहमद खां की पुस्तक "आसारूस सनादीद" (सन् 1864) में है। पाठकों को यह जानकर अचरज होगा कि लाल डिग्गी तालाब एक अंग्रेज लार्ड एडिनवरो ने बनवाया था और राज करने वालों के बीच यह उन्हीं के नाम पर जाना जाता था। लेकिन दिल्ली वाले इसे लाल डिग्गी ही कहते रहे, क्योंकि 500 फीट लंबा और 150 फीट चौड़ा यह तालाब लाल पत्थरों से बना था। हर्न की सन् 1906 में प्रकाशित पुस्तक "सेवन सिटीज ऑफ़ डेली" में लाल डिग्गी का सुंदर विवरण मिलता है। दिल्ली के अन्य तालाबों, नहरों, बावड़ियों के बारे में काॅर स्टीफन की "आर्कियोलाॅजी एंड मान्यूमेंटल रीमेंस ऑफ़ डेली" (सन् 1876) और जी पेज द्वारा चार खंडों में संपादित "लिस्ट ऑफ़ मोहम्मडन एंड हिंदू मान्यूमेंट्स, डेली प्राॅविन्स " (सन् 1933) से भी बहुत मदद मिलती है।

पेड़ों को कटने से रोकने के लिए शुरू हुए "चिपको आंदोलन" से लेकर हिंदी क्षेत्र के पानी की विरासत का पुर्नपाठ और समाज को मरते तालाबों को जिलाने की संजीवनी देने का काम कोई कर सकता था तो अनुपम मिश्र। लेकिन कोई कहे कि वही लिखने के अधिकारी हैं तो सात आसमानों से परे गांधी मुद्रा में दो हाथ विनम्रता से जुड़े दिखेंगे।



Monday, November 14, 2016

साँप-नेवला_Snake_mongoose



साँप-नेवला एक होने लगे तो पानी तो किनारा छोड़ेगा ही, सो हो रहा है.…

Saturday, June 25, 2016

India_Water_देश का जल




लियोनार्डो-द-विंसी ने एक बार कहा था ‘जल प्रकृति का वाहक है।’

पृथ्वी की 3/4 सतह पर पानी होने के बावजूद केवल एक प्रतिशत पानी पीने योग्य है तथा इसका बड़ा हिस्सा पहले ही दूषित हो चुका है। इसके साथ ही, नदियां सूख रही हैं तथा भूजल का अधिक दोहन हो रहा है। जहां पानी है, वहीं जीवन है तथा जहां पानी नहीं है, वहां जीवन नहीं है।



भारत में जल लोगों में श्रद्धा जगाता है। इसे ‘वरुण’ नामक देवता का अवतार माना गया है, जिन्हें जल के सभी स्वरूपों के देवता के रूप में पूजा जाता है। भारत में दुनिया की सतरह प्रतिशत जनता रहती है परंतु, यहां विश्व का केवल चार प्रतिशत पानी उपलब्ध है।

देश के अधिकांश हिस्सों में नियमित रूप से पानी को लेकर हालात चिंता का विषय है। ऐसे में पानी का संरक्षण, संतुलित वितरण तथा प्रयुक्त जल का फिर से उपयोग पर अनिवार्य रूप से ध्यान दिये जाने की जरूरत है।

हमें इसके लिए जल की उपलब्धता में क्षेत्रीय असंतुलन को दूर करने की दिशा में प्रयास करने होंगे। इतना ही नहीं, शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों के बीच जल के बंटवारे में समानता लानी होगी। आज समय की मांग है कि जल संरक्षण को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाने की जरूरत है।
आज एक भारी चुनौती रूप ले चुकी जल सुरक्षा की समस्या के भविष्य में और बढ़ने के आसार है। ऐसे समय में जब हम घटते जल संसाधनों तथा जल की बढ़ती मांग से जूझ रहे हैं, जल संरक्षण से ही लाभ हो सकता है। आज ‘जल को बचाना ही जीवन बचाना है’ नामक कहावत पहले से कहीं अधिक सटीक बैठती है।

देश की राष्ट्रीय जल नीति 2012 में जल संसाधनों के उपयोग में सुधार की जरूरत को स्वीकार किया गया था। जबकि इससे पहले जल का उपयोग और उसके प्रबंधन पर ध्यान दिए बिना उपलब्ध जल की मात्रा बढ़ाने पर ध्यान दिया गया। इसलिए अब ‘जल संसाधन विकास’ से 'जल संसाधन प्रबंधन’ की दिशा में बदलाव किया जाना जरूरी हो गया है।


जलवायु परिवर्तन का खतरा वास्तविक और सामयिक है। जल प्रवाह में बदलाव, भूमिगत जल में कमी, बाढ़ और सूखे की घटनाओं के बढ़ने और समुद्र के किनारों पर खारेपानी के घुसने के कारण जलवायु परिवर्तन का जल संसाधनों पर भारी दुष्प्रभाव पड़ने की आशंका है। इस चुनौती का सामना जल प्रबंधन और संरक्षण से ही किया जा सकता है। 2011 में देश में राष्ट्रीय जल मिशन के तहत जल संरक्षण, जल की बर्बादी में कमी लाने और समतापूर्ण वितरण का काम शुरू किया गया था।

भारत में खेती में सबसे अधिक पानी का उपयोग होता है। तेजी से हुए शहरीकरण और शहरों में पानी की मांग ने पानी को गाँव से शहरी नागरिकों की ओर भेजने के लिए मजबूर कर दिया है, जिससे गाँव और शहर में होड़ पैदा हुई है। जल संसाधनों में बदलाव न होने के कारण भविष्य में पानी के उपयोग को लेकर गाँव और शहर में प्रतिस्पर्धा के बढ़ने की संभावना है। इस परिस्थिति के समाधान के लिए दोनों के बीच पानी के उचित बंटवारे की जरूरत है।


हमारे देश में कृषि के लिए जल की सबसे ज्यादा मांग है। सबको अन्न उपलब्ध करवाने के लिए खेती में उचित जल प्रबंधन आवश्यक है। हमें अपनी सिंचाई प्रणाली में जल के उचित प्रयोग को प्रोत्साहन, उपयोग किए गए पानी को संशोधित करके दोबारा उपयोग में लाने के प्रयासों को बढ़ाना होगा।

देश में घटते भूजल के स्तर को रोकने के लिए सही प्रौद्योगिकी का प्रयोग करना होगा। मौजूदा ग्रामीण विकास योजनाओं के साथ जोड़कर वर्षा जल संचयन को लोकप्रिय बनाना होगा। साथ ही मिट्टी में नमी बढ़ाना, नदी-तालाबों के किनारे पेडों की कटाई में कमी लाना और पानी की उत्पादकता में सुधार की दिशा में कोशिश करनी होगी।

उपयोग योग्य जल एक दुर्लभ वस्तु है। इसको देखते हुए पानी की कीमत इस तरह रखनी होगी कि समाज में पानी की बचत के लिए प्रोत्साहन और बर्बादी के लिए दंड की व्यवस्था की भावना हो।

आधुनिक विकास के हिसाब से पूरी दुनिया में सुरक्षित पीने के पानी की व्यवस्था एक गंभीर पहल बन चुकी है। मनुष्यों की काफी बड़ी जनसंख्या की, इस बुनियादी जरूरत तक पहुंच नहीं हो पाई है। सुरक्षित पेयजल तक गरीबों की पहुंच को सुनिश्चित करने के लिए बाजार, प्रौद्योगिकी और सरकार को काफी प्रयास करने होंगे। देश में सुरक्षित पेयजल की सामूहिक खपत को बढ़ावा देने के लिए वित्तीय संस्थानों की भी मदद लेनी होगी।

भारत में पानी को लेकर मौजूदा कानूनी ढांचा इस जटिल जल परिस्थिति से निबटने के लिए असमान तथा अपर्याप्त है। पानी को लेकर सरकारी नीतियों और नियमों को स्पष्ट और सारगर्भित बनाने की भी जरूरत है। तभी भारत में मुंह बाएँ खड़ा पानी का संकट को कम किया जा सकता है।

महात्मा गांधी का कहना था, ‘धरती मां के पास हमारी जरूरत पूरा करने के लिए पर्याप्त है परंतु लालच के लिए नहीं।’ वह एक ऐसा हिंद स्वराज स्थापित करना चाहते थे जो ‘लालच से जरूरत की ओर’ के सिद्धांतों पर आधारित हो। आज प्रकृति पर विजय से हटकर प्रकृति से सहयोग पर आधारित सोच होने की जरूरत है।



First Indian Bicycle Lock_Godrej_1962_याद आया स्वदेशी साइकिल लाॅक_नलिन चौहान

कोविद-19 ने पूरी दुनिया को हिलाकर रख दिया है। इसका असर जीवन के हर पहलू पर पड़ा है। इस महामारी ने आवागमन के बुनियादी ढांचे को लेकर भी नए सिरे ...