Tuesday, August 9, 2016

Shergarh_Shershash Suri_शेरशाह सूरी का शेरगढ़



सोलहवीं शताब्दी (वर्ष 1540) में अफगान शासक शेरशाह सूरी ने अपने दुश्मन और प्रतिद्वंदी हुमायूँ को लड़ाई में हराकर उसे हिंदुस्तान से भागने पर मजबूर कर दिया था। उसके बाद शेरशाह ने दीनपनाह को नष्ट करके कई सभ्यताओं के अवशेषों पर अपना शहर बसाया। शेरशाह ने पांच साल तक इसी किले से दिल्ली पर शासन किया।




(दिल्ली शेरशाही या शेरगढ़


शेरशाह ने लगभग इसी जगह पर एक नया शहर बसाया था, जिसे दिल्ली शेरशाही या शेरगढ़ का नाम दिया गया। कुछ अवशेष ही कभी दिल्ली के इन बादशाहों के यहां पर बसाए जाने के प्रमाण हैं। शेरशाह सूरी ने नया शहर बसाने की बजाय हुमायूँ के शहर में ही बहुत कुछ जोड़ा। इसलिए यह भी कहा जा सकता है कि पुराने किले और उसके आसपास दीनपनाह और शेरगढ़ नाम के दिल्ली के दो शहर रहे।


(किला-ए-कुनहा मस्जिद


शेरशाह की बनवाई पुराने किले के दक्षिणी दरवाजे के भीतर अष्टकोणीय-लाल बुलवा पत्थर की एक दो मंजिला इमारत शेर मंडल और दूसरी इमारत किला-ए-कुनहा मस्जिद कहलाती है। ये इमारतें इस पुराने नगर यानी किले के क्षेत्र में आज भी मौजूद हैं। इतिहासकार फणीन्द्रनाथ ओझा अपनी पुस्तक “मध्यकालीन भारतीय समाज और संस्कृति” में लिखते हैं कि शेरशाह ने सन् 1545 में एक मस्जिद बनाई गई जिसे किला-इ-कुन्ता मस्जिद कहा जाता है। उसमें वास्तुकला के ऐसे नायाब गुण और सौन्दर्य हैं कि उसे उत्तरी भारत के गिने-चुने भवनों में बहुत ऊंचा स्थान दिया जाता है। यह मस्जिद हिंदू शैली में निर्मित है।


(शेरगढ़ का उत्तरी दरवाजा


“दिल्ली जो एक शहर है” में महेश्वर दयाल लिखते हैं कि शेरशाह ने शेरगढ़ का भी निर्माण कराया जो उसके शहर दिल्ली शेरशाही का किला था। पुराने किले के नजदीक लाल दरवाजा और काबुली दरवाजा, जो शेरगढ़ का उत्तरी दरवाजा था, दिल्ली शेरशाही के पुराने किले के बाहर कुछ स्मारक हैं। सन् 1541 में शेरशाह ने सूफी बख्तियार काकी का कुतुब के पास मकबरा भी बनवाया।


(सलीमगढ़ किला का दरवाजा


शेरशाह के बेटे ने बसाया था सलीमगढ़ 
1545 में शेरशाह की मौत हो गई। उसके बेटे सलीमशाह या इस्लामशाह ने गद्दी संभाली। यमुना के किनारे लालकिले के साथ बना सलीमगढ़ का किला शेरशाह के इसी बेटे सलीमशाह का बनवाया हुआ है। “तारीख एक खानजहां” के लेखक की माने तो सलीमशाह ने सलीमगढ़ के किले को बनवाने के बाद हुमायूँ के किले के चारों ओर एक दीवार भी बनवाई थी। शाहजहांनाबाद बसाए जाने के दौरान शाहजहां और उसके सहयोगियों के सलीमगढ़ के किले में अस्थायी रूप से रहने का उल्लेख मिलता है।

(शेर मंडल


हुमायूँ जब पंद्रह वर्ष (23 जुलाई 1555) बाद दोबारा जीतकर दिल्ली लौटा तो उसने फिर अपनी राजधानी दीनपनाह में रहना शुरू कर दिया। उसने शेर मंडल को अपने एक पुस्तकालय के रूप दे दिया। इस इमारत की सीढ़ियों से फिसलकर हुमायूं की असामयिक मौत हुई। “मुगल कालीन भारत-हुमायूं” पुस्तक के अनुसार, इसी बीच को पादशाह अपने किताबखाने के कोठे पर से, जिसे उन्होंने देहली के दीनपनाह के किले में बनवाया था, उतर रहे थे। उतरते समय अजान देने वाले ने अजान देना प्रारम्भ कर दिया। वे अजान के प्रति सम्मान प्रदर्शित करने के लिए बैठ गए। उठते समय डंडा लड़खड़ा गया और पांव फिसल गया। कई जीने से लुढ़कते हुए वे भूमि पर आ रहे। इस तरह, मुगलिया तख्त पाने के छह महीने में ही उसकी मौत हो गई।

(हुमायूँ  मकबरा


“दिल्ली की खोज पुस्तक” में बृजकिशोर चांदीवाला लिखते हैं कि हुमायूँ के लाश को दीनपनाह से ले जाकर किलोखड़ी गांव में दफन किया गया था जहां बाद में उसकी बीवी हाजी बेगम ओर उसके लड़के अकबर ने उसकी कब्र पर एक बहुत ही शानदार मकबरा बनवाया। सन् 1565 में हमीदा बानो ने हुमायूँ के मकबरे को बनवाना शुरू किया किया जो दिल्ली में मुगल वास्तुकला का सर्वोत्तम नमूना है। इस मकबरे को बनाने का काम ईरान के वास्तुकार मिरक मिर्जी गियास ने किया इसी वजह से यह इमारत गुंबज बनाने की ईरानी परंपरा का भारत में यह पहला उदाहरण है। यह विशाल भवन लाल पत्थरों से बना है, इसके किनारों पर काला और सफेद संगमरमर लगा हुआ है। भारतीय वास्तुकला में दोहरे गुबंद वाली संभवतः प्रथम इमारतों में से एक है। आंतरिक गुबंद मकबरे के कमरों का मेहराबदार छत है तो बाहरी गुबंद इसे बाह्य भव्यता प्रदान करता है। हमीदा बानो बेगम की मौत के बाद उन्हें भी इसी मकबरे में दफनाया गया।




राजधानी के प्रसिद्व मथुरा मार्ग रोड पर स्थित यह मकबरा पत्थरों के जड़ाऊ कार्य की उस कला का पहला दर्शन कराता है जो कि लगभग एक शताब्दी पश्चात ताजमहल की सजावट में भी दृष्टिगोचर होती है। आज यह एक विश्व विरासत स्थल (वर्ल्ड हैरिटेज साइट) है। इस मकबरे के डिजाइन को ही आगरा के ताजमहल का आधार माना जाता है।

“दास्तान ए दिल्ली” पुस्तक में आदित्य अवस्थी लिखते हैं कि हुमायूँ के मकबरे को दिल्ली की पहली और महत्वपूर्ण मुगलकालीन इमारत कहा जा सकता है। बगीचों, चलते फव्वारों और बहते पानी के बीच बने इस मकबरे को दिल्ली की सबसे खूबसूरत मुगलकालीन इमारतों में से एक माना जाता है।



(पुराना किला का भीतर का दृश्य


पुराना किला की इमारत आज भी बहुत भव्य लगती है। इस किले का गेट पचास फुट से भी ऊंचा है। इसके ऊपर की दीवार 24 फुट चौड़ी है। इसे लाल और सलेटी पत्थरों से बनाया गया है। दरवाजे के दोनों ओर बने कंगूरे इस ऐतिहासिक किले को अनोखी भव्यता प्रदान करते हैं। इसकी दीवारें अत्यंत विशाल हैं तथा लाल पत्थर से निर्मित तीन बड़े दरवाजों को सफेद संगमरमर को जड़ाऊ कार्य तथा रंगीन पत्थरों के समतल टुकड़ों से सजाया गया है।




इस किले की दक्षिण की ओर खुलने वाले दरवाजे की दीवार पर से चिड़ियाघर देखा जा सकता है। इस समय पश्चिम की ओर खुलने वाले भव्य और विशाल दरवाजे से ही इस किले में प्रवेश किया जा सकता है। 



इन विशालकाय दरवाजों के अलावा इस किले में खिड़कियां, यानी किले के अंदर-बाहर आने-जाने के लिए छोटे दरवाजे भी थे। इनमें से दो खिड़कियां नदी की ओर की दीवार में थीं, जबकि तीसरी किले की पश्चिमी दीवार में थी। ये खिड़कियां अब बंद कर दी गई हैं। दरवाजे की ऊंची दीवारों पर उत्कीर्ण हाथियों की दो सफेद आकृतियां यह प्रमाणित करती हैं कि उनकी प्रेरणा उसे हिंदू वास्तु शैली से मिली होगी क्योंकि हुमायूं के काल के सभी भवनों की मूल संकल्पना फारसी शैली की है।


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