Friday, August 26, 2016

Sorrow_Human state of mind_क्योंकि सपना है अभी भी_धर्मवीर भारती



जीवन में यदाकदा स्वपन, दु:स्वपन साबित होते हैं पर इससे सपने देखने की इच्छा समाप्त नहीं होनी चाहिए। आखिर जीवन है तो सपना है। दूसरे अर्थ में देखें या हिन्दी के प्रसिद्ध संपादक (धर्मयुग पत्रिका) और सम्मानित कवि धर्मवीर भारती के शब्दों (क्योंकि सपना है अभी भी शीर्षक कविता) में कहे तो, 

"ढाल छूटे, कवच टूटे हुए मुझको

फिर तड़प कर याद आता है कि

सब कुछ खो गया है - दिशाएं, पहचान, कुंडल,कवच

लेकिन शेष हूँ मैं, युद्धरत् मैं, तुम्हारा मैं

तुम्हारा अपना अभी भी

 

इसलिए, तलवार टूटी, अश्व घायल

कोहरे डूबी दिशाएं

कौन दुश्मन, कौन अपने लोग, सब कुछ धूंध धूमिल 

किन्तु कायम युद्ध का संकल्प है अपना अभी भी

... क्योंकि सपना है अभी भी!"

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