Saturday, February 17, 2018

Urdu connection of Delhi_दिल्ली-उर्दू का गर्भनाल का नाता




अरे, बन्दे खुदा उर्दू बाज़ार न रहा उर्दू कहाँ ?
दिल्ली, वल्लाह, अब शहर नहीं है, कैंप है, छावनी है,

दिल्ली और उर्दू के इस जोड़ को अमर बनाने वाली कड़ी है, मिर्जा असदुल्लाह खां “गालिब”। इस बात से कम व्यक्ति ही वाकिफ़ है कि अपना अधिकांश लेखन फ़ारसी में करने वाले मिर्जा “गालिब” ने फ़ारसी उर्दू में तुलनात्मक रूप से कम ही लिखा पर जो लिखा जोरदार लिखा। गालिब फारसी भाषा के विद्वान और कवि होने के साथ समर्थ गद्यकार भी थे। उनका यही पक्ष उनके पत्रों के संग्रह (ग़ालिब के पत्र, हिन्दुस्तानी एकेडमी) “ऊदे हिन्दी” और “उर्दूए मोअल्ला” उर्दू में परिलक्षित होता है।

अगर इतिहास की बात करें तो अमीर खुसरो को उर्दू भाषा का प्रथम कवि माने जाते हैं, जिन्होंने सबसे पहले उर्दू में कविताएं कीं। उर्दू की सबसे पहली गजल खुसरो की ही है, जिसकी एक पंक्ति फारसी की है तो दूसरी उर्दू की। 

जहाल मस्कीं मकुन तगाफुल दुराय, नैना बनाय बतियां।

प्रसिद्ध शायर ‘मीर’ तक़ी ‘मीर’ का पहला शेर है (पहला दीवान, 1752 से पूर्व)
गुफ्तगू रेख्ते में हमसे न कर, यह हमारी जबान है प्यारे। 

भाषा के नाम की हैसियत से उर्दू शब्द का प्रयोग पहली बार 1780 के आसपास हुआ।

आज की उर्दू को मुगल दरबार की भाषा बनते बहुत देर लगी। गैर सरकारी भाषा का रूतबा भी उसके लिए उसी समय सम्भव हो सका, जब शाहआलम द्वितीय (शासनकाल 1759-1806) जनवरी 1772 में दिल्ली वापस आया। उसने अपनी कृति "अजायब-उल-कसस" हिन्दी में ही लिखी।

जबकि उस दौर की दिल्ली में मिर्जा मोहम्मद रफी“सौदा” ने उर्दू में उत्कृष्ट कविताएं लिखते हुए भारतीय रीति-रिवाजों का चित्रण किया। इस तरह, दिल्ली के शेख इब्राहीम “जौक”, तत्कालीन मुगल बादशाह बहादुरशाह जफर ने भी इनका शिष्यत्व ग्रहण किया था, की अधिकांश रचनाएं 1857 के पहले स्वतंत्रता संग्राम की विभीषिका की भेंट चढ़ गयीं जिसका उल्लेख "आबेहयात" में मिलता है। उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि इन्होंने उर्दू भाषा को सुसंस्कृत और परिमार्जित किया।


दिल्ली में जन्मे दाग भी नामचीन शायर थे। उनके ही शब्दों में, उर्दू है जिसका नाम हमीं जानते हैं 'दाग़', हिन्दुस्तां में धूम हमारी ज़बां की है। “गुलजारे दाग”, “आफताबे दाग” और “माहताबे दाग” उनकी कृतियाँ हैं।

1920 के दशक में ख्वाजा हसन निजामी ने 1857 की आजादी की लड़ाई पर दिल्ली पर केंद्रित उर्दू में पुस्तिकाएं छापी थीं। मिर्जा फरहतुल्लाह बेग की “दिल्ली की आखरी शमा” इनमें से सबसे ज्यादा लोकप्रिय हुई। इसमें 1857 से कुछ वर्ष पहले एक मुशायरे की कल्पना है जिसमें दिल्ली के तमाम बड़े शायर (लगभग पचास) भाग लेते हैं। मौखिक परंपरा पर आधारित उर्दू की यह कृति तत्कालीन दिल्ली के सांस्कृतिक माहौल का विश्वसनीय चित्रण करती है।

वही “धर्मनिरपेक्षता की खोज में हिन्दी साहित्य और उसके पड़ोस पर एक दृष्टि” पुस्तक में विजयदेव नारायण साही लिखते हैं कि दिल्ली की उर्दू का मतलब था सात सौ बरसों की बंजर फ़ारसीगोई का बहिष्कार, लेकिन लगे हाथ सारे ब्रजभाषा साहित्य का बहिष्कार भी, जिससे उसका जन्म हुआ और जिसकी परम्परा को निभाने में उर्दू असमर्थ रही। मीर और ग़ालिब का मतलब सिर्फ देव और बिहारीलाल को ही भूलना नहीं हुआ बल्कि फेहरिस्त से कबीरदास, जायसी, रहीम और उन तमाम लोगों का नाम खारिज करने का हुआ जिन्होंने एक मिले-जुले देसी मिजाज को बनाने में पहल की थी।



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