दोगलापनहम सब दूर का तो देख लेते हैं बस पास में ही नजर चूक जाती है । अब ये नजर का कसूर है या हमारा दोगलापन ईश्वर ही जाने ।
Tuesday, March 27, 2012
Shortsightness
Sunday, March 25, 2012
Poem:City and Girl
शहर और लड़की
डाल पर चहकती हैं चिडि़या,
डाल पर चहकती हैं चिडि़या,
पेड़ों पर झूलती हैं लड़कियां
आसामान में उड़ान भरती है चिडि़या,
आकाश में नई मंजिलों की छूती हैं लड़कियां
कुल्हाड़े से केवल पेड़ ही नहीं कटते,
बसेरे भी उजड़ जाते हैं
चहचहाहट के संगीत के साथ
किलकिलारियां भी मद्वम हो जाती है
जंगल की हरियाली ही नहीं,
शहर की हरीतिमा भी खो जाती है
एक का उजड़ता है घरौदा
तो दूसरी के सपने बिसूर जाते हैं
एक की खो जाती है दिशा
तो दूसरी के सपने गुम हो जाते हैं
एक जीते जी शहर में,
अचानक क्फर्यू की मुर्दगी पसर जाती है
दूर कहीं पुलिस की जीप के बजते सायरन से
चिडि़या ही नहीं लड़कियां भी सहम जाती हैं
अपनी लाचार सिमटती दुनिया में और सिकुड़ जाती है
हौंसले हवा हो जाते हैं, दोनों के
ये किसकी नजर लगी है जंगल को
जो शहर के नाम पर उजाड़ा जा रहा है
जबकि शहर में जंगलराज छा रहा है
यह कैसा है सभ्यता का अतिचार
गमलों में बोनसाई लगाकर
खेतों में पापुलर पेड़ उगाकर
शहर में जंगल लग रहा है
जंगल में शहर बस रहा है
Thursday, March 22, 2012
Netaji on Our Freedom Struggle and India
Standing at one of the cross-roads of world-history, I solemnly declare on behalf of all freedom-loving Indians in India and abroad that we shall continue to fight British Imperialism till India is once again the mistress of her own destiny.
During this struggle and in the reconstruction that will follow, we shall heartily co-operate with all those who will help us in overthrowing the common enemy. I am confident that in this sacred struggle, the vast majority of the Indian people will be with us.
No maneuver, intrigue, or conspiracy on the part of the agents of Anglo-American Imperialism, however prominent they may be and to whichever nationality they may belong, can throw dust in the eyes of the Indian people or swerve them from the path of patriotic duty.
The hour of India’s salvation is at hand. India will now rise and break the chains of servitude that have bound her so long.
Through India’s liberation will Asia and the world move forward towards the larger goal of human emancipation.
-Netaji Subhas Chandra Bose
[From the first broadcast over Azad Hind Radio, February 19, 1942]
Wednesday, March 21, 2012
Tuesday, March 20, 2012
Daughter
बेटी
आशा है, विश्वास है,
आशा है, विश्वास है,
परिवार का अहसास है,
स्वयं की पहचान है,
सम्यक ज्ञान है,
समय का चक्र है,
परिवार का पक्ष है,
जीवन का लक्ष्य है,
प्रगति का पथ है,
सफलता का अर्थ है,
मां की छांव है,
पिता का अभिमान है,
सकल की चिंता है,
अपना ध्यान है,
पक्ष है,
विपक्ष है,
अपने में भगवान है,
कल्याणी है, मंगल है,
जागृत स्वाभिमान है
Thursday, March 15, 2012
Book:Wife
किताब-पत्नी
पाठ्यक्रम में लगी हुई किताब पत्नी की तरह होती है जिसके साथ रहना जरूरी है प्यार हो न हो ।
Tuesday, March 13, 2012
Monday, March 12, 2012
Memory:Mother
खाली अहसास है, मन में विश्वास है
मां की बरसी थी, सो आंखे भीग आई । अंगुलियां खुद-ब-खुद चलने लगी । कब उतर गए शब्द पता ही नहीं चला, अभी भी अधूरापन है । चार बरस हो गए । खाली अहसास है, मन में विश्वास है कि वो यही कहीं है, मेरे पास है ।
Thursday, March 8, 2012
Editing
पुस्तक पूरी हो गयी है। कोई काम निष्पन्न हुआ है, मेरे हाथों हुआ है, इसकी खुशी है ही; उस खुशी का थोड़ा नशा भी है। उसी में पांडुलिपि शोधता रहा हूँ; उसी के कारण न ऊब या थकान हुई है न मन भटका है-पांडुलिपि शोधने का काम भी सघन एकाग्रता माँगता है! बीच-बीच में पढ़ते-पढ़ते अच्छा लगा है : ‘अच्छा लिखा है’ और ‘अरे यह तो मैंने लिखा है’ का मिश्रित बोध या आविष्कार प्रीतिकर रहा है। पर कहीं-कहीं अटक गया हूँ। टंकन में कुछ शब्द या पद छूट गये हैं। (दीठ उछटी होगी या पढ़े न गये होंगे।) कहीं तो तत्काल उन रिक्तों की पूत्र्ति कर दी है, कहीं-कहीं नहीं सोच पाया कि मूल में (जो मेरे सामने नहीं है) क्या लिखा था। क्यों नहीं सोचा पाया? सब कुछ याद हो यह ज़रूरी नहीं है; पर अगर एक जगह के लिए एक ही सही शब्द होता है तो वह मुझे क्यों नहीं सूझता या याद आता? कई एक शब्द रख कर देखता हूँ : उनमें से कोई भी अर्थ दे जाएगा, ‘चल जाएगा’, पर भीतर गहरे में जानता हूँ कि वह शब्द वहाँ नहीं था। अर्थ दे जाएगा, स्वीकार भी हो जाएगा। शायद किसी को सन्देह भी न हो कि यह शब्द स्थानापन्न है, इसलिए ‘भरती’ है-पर मैं तो जानता हूँ, मुझे तो वह लकलक-सा तुरत अलग दीख जाएगा, दीख जाया करेगा! यहीं अटक है; और मैं नहीं तै कर पाता कि क्या करूँ। चाहूँ तो प्रसन्न हो सकता हूँ कि सही शब्द की पहचान मुझे है, भले ही वह मिल नहीं रहा है (याद नहीं आ रहा है)। नहीं तो दु:खी हो सकता हूँ कि क्यों वह शब्द अभी तत्काल मेरा वशंवद नहीं है? मैं दु:खी ही अधिक हूँ। जानता हूँ कि रचना-क्षण की आग में जो तपा कुन्दन निकलता है, ज़रूरी नहीं है कि वह हर समय उपलब्ध हो; और पांडुलिपि-संपादन का क्षण रचना-क्षण नहीं है। पर वह एकमात्र शब्द क्यों नहीं मेरे काबू में है? फिर जब वह संपादन तो आवृत्ति मात्र है अपने ही लिखे की-अगर आवृत्ति में वह शब्द पकड़ में नहीं आता तो क्या भरोसा है कि पहली बार आया था? भरोसा नहीं है, तब कैसे इतने ही को काफ़ी मान लूँ कि कोई सब्स्टिट्यूट शब्द मुझे स्वीकार नहीं है? सही शब्द पहचानना तो काफ़ी नहीं है, सही शब्द ढालना, उत्सृष्ट करना और करते रह सकता ही तो कवि-पद है।
Monday, March 5, 2012
Crisis in System
क्राइसिस में संस्थान
संस्थाएँ और प्रतिष्ठान टूट रहे हैं। कह लीजिए, मूल्यों का क्राइसिस है। वैसा है, तो चिन्ता और उद्वेग एक हद तक समझ में आते हैं : क्राइसिस की स्थिति के वे आनुषंगिक है। पर संस्था कब टूटती है, किस परिस्थिति में टूटती है? जब मानव के विचार उसकी संस्था के विकास की अपेक्षा अधिक तेज़ी से चलने लगते हैं, तब संस्था हिलती है, अररा कर गिरती है : क्योंकि विचार ही वह सीमेंट हैं जो उसे जोड़े रख सकते हैं। विचार आगे निकल गये हैं; पिछड़ी हुईं संस्थाएँ और प्रतिष्ठान नींव खोखली हो जाने के कारण लडख़ड़ा रहे हैं। जब फिर विचार सम्पूर्ण स्वीकृति पाएँगे-तब संस्थान फिर पनप सकेगा, आगे बढ़ सकेगा, तभी वह ‘संस्थान’ होगा।
Thursday, March 1, 2012
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