Thursday, March 8, 2012

Editing

पुस्तक-संपादन-अज्ञेय
पुस्तक पूरी हो गयी है। कोई काम निष्पन्न हुआ है, मेरे हाथों हुआ है, इसकी खुशी है ही; उस खुशी का थोड़ा नशा भी है। उसी में पांडुलिपि शोधता रहा हूँ; उसी के कारण न ऊब या थकान हुई है न मन भटका है-पांडुलिपि शोधने का काम भी सघन एकाग्रता माँगता है! बीच-बीच में पढ़ते-पढ़ते अच्छा लगा है : ‘अच्छा लिखा है’ और ‘अरे यह तो मैंने लिखा है’ का मिश्रित बोध या आविष्कार प्रीतिकर रहा है। पर कहीं-कहीं अटक गया हूँ। टंकन में कुछ शब्द या पद छूट गये हैं। (दीठ उछटी होगी या पढ़े न गये होंगे।) कहीं तो तत्काल उन रिक्तों की पूत्र्ति कर दी है, कहीं-कहीं नहीं सोच पाया कि मूल में (जो मेरे सामने नहीं है) क्या लिखा था। क्यों नहीं सोचा पाया? सब कुछ याद हो यह ज़रूरी नहीं है; पर अगर एक जगह के लिए एक ही सही शब्द होता है तो वह मुझे क्यों नहीं सूझता या याद आता? कई एक शब्द रख कर देखता हूँ : उनमें से कोई भी अर्थ दे जाएगा, ‘चल जाएगा’, पर भीतर गहरे में जानता हूँ कि वह शब्द वहाँ नहीं था। अर्थ दे जाएगा, स्वीकार भी हो जाएगा। शायद किसी को सन्देह भी न हो कि यह शब्द स्थानापन्न है, इसलिए ‘भरती’ है-पर मैं तो जानता हूँ, मुझे तो वह लकलक-सा तुरत अलग दीख जाएगा, दीख जाया करेगा! यहीं अटक है; और मैं नहीं तै कर पाता कि क्या करूँ। चाहूँ तो प्रसन्न हो सकता हूँ कि सही शब्द की पहचान मुझे है, भले ही वह मिल नहीं रहा है (याद नहीं आ रहा है)। नहीं तो दु:खी हो सकता हूँ कि क्यों वह शब्द अभी तत्काल मेरा वशंवद नहीं है? मैं दु:खी ही अधिक हूँ। जानता हूँ कि रचना-क्षण की आग में जो तपा कुन्दन निकलता है, ज़रूरी नहीं है कि वह हर समय उपलब्ध हो; और पांडुलिपि-संपादन का क्षण रचना-क्षण नहीं है। पर वह एकमात्र शब्द क्यों नहीं मेरे काबू में है? फिर जब वह संपादन तो आवृत्ति मात्र है अपने ही लिखे की-अगर आवृत्ति में वह शब्द पकड़ में नहीं आता तो क्या भरोसा है कि पहली बार आया था? भरोसा नहीं है, तब कैसे इतने ही को काफ़ी मान लूँ कि कोई सब्स्टिट्यूट शब्द मुझे स्वीकार नहीं है? सही शब्द पहचानना तो काफ़ी नहीं है, सही शब्द ढालना, उत्सृष्ट करना और करते रह सकता ही तो कवि-पद है।

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