Thursday, July 19, 2012
Monday, July 9, 2012
Saturday, July 7, 2012
For Father_पिता के लिए
कभी व्यक्त भी अव्यक्त रहा
तो दोनों संग भी असंग रहे
और जुदा रहकर भी जुड़े रहे
कभी बनी नहीं बात
कभी हो नहीं सकी मुलाकात
कभी बात करके भी कुछ अबूझा रह गया
कभी मिलकर भी दूरी रह गई
कभी दोनों ठीक होकर भी गलत थे
सिरे दोनों सुलझे थे
पर बीच में गांठ बनी रही
हर बार कितना अबोला रह जाता
दोनों की हथेलियों में सिमटा समय
रेत की तरह बह जाता
विरोधाभासों में विरोध ही सम था
सम ही मानो विषम था
लेकिन दोनों के संबंधों में बंधन था
उनका अनुभव, कुतुबनुमा घड़ी थी
जिसने जीवन की दशा ही नहीं
दिशा भी तय की
उनके बरगद सरीखे व्यक्तित्व ने
सभी दुश्चिंताओं और खतरों से सुरक्षित रखा
धूप सहकर छांव दी
कभी कष्टों के कांटों को
दुख के दर्द को
अभावों को, पराभवों को
कभी स्थायी भाव नहीं बनने दिया
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