Sunday, November 27, 2016

History of Indian note currency_इतिहास का झरोखा हैं भारतीय नोट


आधुनिक भारत के नोटों पर नजर आने वाली चित्रों की अवधारणाओं में परिवर्तनशील सामाजिक-सांस्कृतिक विशेषताओं सहित तात्कालिक वैश्विक दृष्टिकोण की झलक मिलती है। यह समुद्री लुटेरे और वाणिज्यवाद, औपनिवेशिक काल, विदेशी साम्राज्यवाद, साम्राज्य की श्रेष्ठता के दर्प से लेकर भारतीय राष्ट्रीय स्वतंत्रता के प्रतीकों और स्वतंत्र राष्ट्र की प्रगति के रूप में इन नोटों पर परिलक्षित होती है।

कलकत्ता के जनरल बैंक ऑफ बंगाल एंड बिहार (1773-75) ने देश में शुरुआती नोट छापे। इन नोटों के मुख भाग पर बैंक का नाम और मूल्यवर्ग (100, 250, 500 रूपए) तीन लिपियों उर्दू, बांग्ला और नागरी में छपा था। 

वर्ष 1840 में बंबई प्रेसिडेन्सी बैंक बना, जिसने अपने नोटों पर टाउन हाल और माउंट स्टुअर्ट एलफिन्स्टन तथा जॉन मालकोल्म के चित्र, वर्ष 1843 में बने मद्रास प्रेसिडेन्सी बैंक ने मद्रास के गवर्नर सर थॉमस मुनरो (1817-1827) के चित्र वाला नोट छापा।


कागजी मुद्रा अधिनियम ,1861 के बाद प्रेसिडेन्सी बैंकों के नोट छापने पर रोक लग गयी और भारत सरकार को देश में नोट छापने का एकाधिकार मिल गया और कागजी मुद्रा का प्रबंधन टकसाल मास्टरों को सौंप दिया गया। 

अंग्रेज़ सरकार ने भारतीय सिक्का अधिनियम, 1906 के पारित होनेके साथ देश में टकसालों की स्थापना और सिक्कों और मानकों की व्यवस्था बनी।


ब्रिटिश इंडिया नोटों के पहले सेट में रानी विक्टोरिया के चित्र वाले 10, 20, 50, 100, 1000 मूलवर्ग में दो भाषाओं के पैनल वाले हाथ से बने एकतरफा नोट छापे गए। पहली बार वर्ष 1917 में एक रूपए का नोट और फिर दो रूपए आठ आने के नोट जारी हुए। इन नोटों पर पहली बार अंग्रेज़ राजा की तस्वीर छपी। 

वर्ष 1923 में दस रूपए का नोट छापा गया। सरकार ने भारतीय रिजर्व बैंक के कायम होने तक 5, 10, 50, 1000, 10,000 रूपए के नोट छापे।


1 अप्रैल 1935 को कलकत्ता में भारतीय रिजर्व बैंक का केंद्रीय कार्यालय खुला और उसने सरकारी लेखा और लोक ऋण के प्रबंधन का काम संभाल लिया। वर्ष 1937 में जार्ज छठे के चित्र के साथ पहली बार पांच रूपए का नोट, 1938 में 10 रूपए, 100 रूपए, 1,000 रूपए और 10,000 रूपए के नोट छापे गए। 

दूसरे महायुद्ध में जालसाजी से बचने के लिहाज से नोटों को रक्षा धागा के साथ छापना शुरू किया गया। वर्ष 1940 में दोबारा एक रूपए का नोट और वर्ष 1943 में 2 रूपए का नोट छापा गया।

एक कम-जाना तथ्य यह है कि देश को अगस्त 1947 में आजादी मिलने के बाद भी वर्ष 1950 तक अंग्रेज़ राजा के चित्रों वाले नोट छपते रहे। 

आजाद भारत में अंग्रेज़ राजा के चित्र की बजाय नोट पर सारनाथ के सिंह की आकृति को छापने का फैसला हुआ।

वर्ष 1969 में महात्मा गांधी की जन्म शताब्दी समारोह के समय नोट की पृष्टभूमि में सेवाग्राम आश्रम में बैठे गांधी का चित्र छपा। 

वर्ष 1954 में दोबारा 1,000 रूपए, 5000 रूपए, 10,000 रूपए के नोट छापे गए। वर्ष 1967 में नोटों का आकार छोटा कर दिया। वर्ष 1972 में 20 रूपए और वर्ष 1975 में 50 रूपए के नोट छपे। 

वर्ष 1978 में एक बार फिर नोटों का विमुद्रीकरण किया गया। अस्सी के दशक में 1 रूपए के नोट पर तेल रिंग और 5 रूपए के नोट पर फार्म मशीनीकरण के चित्र वाले नोटों के साथ 20 रूपए और 10 रूपए के नोटों पर कोणार्क चक्र, मोर की चित्र वाले नये नोट छापे गए जबकि वर्ष 1987 में महात्मा गांधी के चित्र वाला 500 रूपए का नोट छपा।



(मुद्दा, पेज 13, 27/11/2016, दैनिक जागरण)

Saturday, November 26, 2016

Dead Man_India


दुनिया में हिंदुस्तान भी अजीब देश है, मरने वाले आदमी को एकदम देवता बना देता है।


निसंदेह "देह" को संदेह से परे होना चाहिए!


Pul Mithai_पुल मिठाई_मिठाई का पुल


पुल मिठाई यानि मिठाई का पुल


पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन के नजदीक के एक अजीब-सा नाम वाला पर भीड़ से भरी एक जगह है, ‘पुल मिठाई’। इसे ‘मिठाई पुल’ यानी मिठाई से जुड़ा हुआ एक पुल के नाम से भी जाना जाता है। पुल मिठाई, पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन से पीली कोठी की तरफ जाने वाले रास्ते में पड़ता है। इसका एक सिरा कुतुब रोड तो दूसरा सिरा आजाद मार्केट रोड से मिलता हैं तो उसके नीचे रेललाइन हैं। आज यहाँ पर मसाले, सूखे मेवे और अनाज बेचने वाले खुदरा व्यापारियों की दुकानें हैं।

पुल मिठाई की सड़क पर बिकती दालें

दिल्ली के पुल मिठाई का नाम साहसी सिख और अमृतसर के झबाल गाँव के रहने वाले सिंधिया मिसल के सरदार बघेल सिंह से जुड़ा है। दिल्ली पर मराठा सेना के लगातार धावों से भयभीत होकर तत्कालीन उन्होंने पतनशील मुगल साम्राज्य के बादशाह शाह आलम द्वितीय (1761) ने बेगम समरू ने सिख सरदारों से मदद की गुहार करने का अनुरोध किया। जब मराठों को सिख सेना के आने की खबर मिली तो वे दिल्ली से कूच कर गए।

ऐसे में, सरदार बघेल सिंह के नेतृत्व में सिख सेना के पहुँचने की सूचना मिलने पर मुगल बादशाह ने घबराकर अपनी मदद के लिए पहुंची सिख सेना को रोकने के लिए शहर के दरवाजे बंद करवा दिये। जिस पर नाराज़ होकर सिख सेना ने अजमेरी गेट से शहर में घुसकर तुर्कमान गेट के इलाके में आगजनी की और रात में मजनूँ का टीला पर डेरा डाला।
दिल्ली में हालत बिगड़ते देख बादशाह ने बेगम समरू को सरदार बघेल सिंह को मनाकर लालकिले लिवाने के लिए भेजा। बघेल सिंह के साथ 500 सिख घुड़सवारों ने बेगम के बगीचे में अपना डेरा डाला। आज चांदनी चौक में इसी स्थान पर बिजली के सामान का थोक बाजार भगीरथ प्लेस है।


सरदार बघेल सिंह का चित्र 



बघेल सिंह ने बेगम समरू के बगीचे में ही बने रहना पसंद किया पर मुगल बादशाह से मुलाक़ात नहीं की। वे हर्जाने में बादशाह से राजधानी में गुरूद्वारों के निर्माण के लिए सिख सेना के दिल्ली में चार साल रहने और उसके खर्च की वसूली पाने में सफल रहे। बघेल सिंह ने वर्ष 1783 में दिल्ली में माता सुंदरी गुरुद्वारा, बाला साहिब, बंगला साहिब, रकाबगंज, शीशगंज, मोती बाग, मजनूँ का टीला और दमदमा साहिब गुरुद्वारों का निर्माण पूरा करवाया।
इसी खुशी के अवसर पर मिठाई के बेहद शौकीन बघेल सिंह ने राजधानी में मिठाइयों की एक प्रदर्शनी का आयोजन किया। सबसे अच्छी मिठाई बनाने वालों को इनाम दिए। इस घटना के बाद यह स्थान पुल मिठाई के नाम से मशहूर हो गया।
फैंटम के 1857 की पहली आजादी की लड़ाई पर लिखे उपन्यास "मरियम" जिस पर बाद में "जुनून" फिल्म बनी के हवाले से दिल्ली के माहौल का वर्णन किया है कि कैसे मिठाई के पुल पर मिठाई की दुकानों से रात को जिन्न मिठाइयां खरीदते थे, विद्रोह की योजना बनाने वालों के लिए खाने-पीने की दूसरी दुकानें भी देर तक खुली रहती थीं। बताते हैं कि सन 1957 तक ऐसी कई दुकानें वहां मौजूद थी।

पुस्तक: जासूसों के ख़ुतूत 



"जासूसों के खुतूत" पुस्तक में अंग्रेजों का एक हिंदुस्तानी जासूस गौरीशंकर अपने भेजे खत में पुल मिठाई के बारे में लिखता है कि कल रात आक्रमण के बाद तीनों रेजीमेंटों को बताया गया है कि वे अपना दायित्व सही तरह से निभाएं। मिठाई पुल से दिल्ली दरवाजे तक समाचार पहुंचाने के लिए एक दस्ता नियुक्त किया गया है।

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