Wednesday, October 30, 2019

Ruskin Bond_Books_रस्किन बांड_किताब




On books and friends I spend my money, for stones and bricks I haven't any.
-Ruskin Bond

मैं किताबों और दोस्तों पर अपना पैसा खर्च करता हूं, मेरे पास पत्थरों और ईंटों (यानि घर) के लिए धन नहीं है।
-रस्किन बांड 


Saturday, October 26, 2019

Story of Yaksh_Yakshini murals at RBI Delhi_रिज़र्व बैंक की लक्ष्मी के रखवाले यक्ष-यक्षिणी

दैनिक जागरण, 26/10/2019



अंग्रेजों से मिली आजादी के बाद देश में बनी पहली भारतीय सरकार ने राजधानी दिल्ली में सार्वजनिक संस्थानों के गठन के लिए भवनों के निर्माण की योजना बनाई।


तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने भव्य और विशाल आकार वाले सार्वजनिक संस्थानों के भवनों को बनाने की योजना में वास्तुशिल्पियोंचित्रकारों और मूर्तिकारों को जोड़ने का सुझाव दिया। इस सुझाव के मूल में नवस्वतंत्र राष्ट्र के सार्वजनिक संस्थानों के भवनों के निर्माण में भारतीय कलाकारों की प्रतिभा का किसी न किसी रूप में उपयोग करने की भावना थी। नेहरू का विचार था कि इन सार्वजनिक संस्थानों के भवनों के निर्माण में आने वाली कुल लागत की तुलना में कला के काम पर अधिक खर्चा नहीं होगा। इससे भारतीय कलाकारों को प्रोत्साहन मिलेगा और जनता ऐसे काम का स्वागत करेगी।


प्रधानमंत्री के प्रस्ताव को व्यवहार रूप में लागू करने के लिए केंद्रीय वित्त सचिव श्री के.जी. अंबगांवकर ने तत्कालीन गर्वनर बी. रामा राव को इस विषय पर एक नोट भेजा। यह उस समय की बात है, जब भारतीय रिजर्व बैंक नई दिल्ली, मद्रास और नागपुर जैसे स्थानों में नए भवनों के निर्माण को लेकर सोच-विचार कर रहा था। भारतीय रिजर्व बैंक ने इस प्रस्ताव की जांच और सुझाव देने के लिए एक समिति गठित की। इस समिति के सदस्यों में बंबई के जे.जे. स्कूल ऑफ़ आर्ट के डीन श्री जे.डी. गोंदेलकर, मैसर्स मास्टर, साठे और भूटा कंपनी के श्री जी.एम. भूटा और रिजर्व बैंक के सहायक मुख्य लेखाकार श्री आर.डी. पुलस्कर थे। 


समिति ने नई दिल्ली स्थित भारतीय रिजर्व बैंक के मुख्य प्रवेश द्वार के दोनों ओर प्रतिमाएं लगाने की सिफारिश की। इनमें से एक को उद्योग और दूसरी को कृषि से समृद्धि प्राप्त करने के प्रतीक विचार के रूप में लिया गया। तब भारतीय रिजर्व बैंक के केंद्रीय बोर्ड के तत्कालिक निदेशक जे.आर.डी. टाटा के आग्रह पर प्रख्यात आलोचक और कला के पारखी कार्ल खंडालवाला की इस विषय पर सम्मति पूछी गई। उन्होंने ही भारतीय रिजर्व बैंक के मुख्य द्वार के दो तरफ यक्ष और यक्षिणी की प्रतिमाओं को स्थापित करने के विचार का सुझाव दिया था। खंडालवाला की सलाह पर ही रिजर्व बैंक के नई दिल्ली कार्यालय के सामने के अहाते में अलंकरण के कार्य के लिए नौ कलाकारों से निविदाएं आमंत्रित की गई। अलंकरण के कार्य के लिए कुल आमंत्रित नौ कलाकारों में से पाँच ने अपने प्रस्ताव प्रस्तुत किए और उनमें से भी केवल ने एक ही प्रतिमाओं के निर्माण के लिए उपयुक्त मॉडल और रेखाचित्र दिए। 


इस तरह, राम किंकर बैज का प्रस्ताव स्वीकृत हुआ। बैज ने पुरुष यक्ष की कला का प्रतिरूप मथुरा संग्रहालय में परखम यक्ष की प्रतिमा से और महिला यक्षिणी की कला का प्रतिरूप कलकत्ता संग्रहालय में बेसनगर यक्षिणी के आधार पर तैयार किया। श्री खंडालवाला की मान्यता थी कि ये विशाल प्रतिमाएं, नई दिल्ली स्थित भारतीय रिजर्व बैंक के कार्यालय की स्थापत्य विशेषताओं के साथ बेहद अच्छी लगेगी। एक ओर जहां, किसान-मजदूर की खुशहाली के विषय को नेहरू की वैज्ञानिक सोच से लिया गया तो वहीं दूसरी तरफ यक्ष और यक्षिणी के रूप में उसकी अभिव्यक्ति पारंपरिक दृष्टि रखने वालों की संवेदनाओं को पुष्ट करती थी। 


हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, यक्ष अर्ध देवयोनि के एक वर्ग में आते हैं और वे धन के देवता कुबेर के सेवक माने जाते हैं। यक्षों का काम कुबेर के उद्यानों और खजाने की रक्षा करना है। यक्षिणी एक महिला यक्ष है। भारतीय रिजर्व बैंक को नोट जारी करने का एकमेव अधिकार होने और केंद्र तथा राज्य सरकार के बैंक होने के नाते, इसकी तुलना धन के देवता कुबेर के साथ की सकती है। एक तरह से, यक्ष और यक्षिणी की प्रतिमाएं बैंक के खजाने की रक्षा का दायित्व संभाल रही है। 


आधुनिक संदर्भ मेंइन प्रतिमाओं की रूपवादी व्याख्याओं के अनुसार, ये दोनों प्रतिमाएं उद्योग और कृषि का प्रतीक रूप भी मानी जा सकती है। ऐसा इसलिए भी था क्योंकि स्वतंत्रता के एकदम बाद देश का केंद्रीय बैंक होने के नाते रिजर्व बैंक प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप इन क्षेत्रों के विकास को लेकर अत्यंत चिंतित था। इन प्रतिमाओं के निर्माण में लगे एक लंबे कालखंड ने बैंक अधिकारियों के धैर्य की परीक्षा ली। यह लंबा इंतजार, प्रसिद्ध शिल्प-कलाकार राम किंकर के उपयुक्त गुणवत्ता वाले पत्थर को चयनित करने में लिए अपार समय लेने के कारण हुआ। किंकर को इतना समय, सही पत्थर के लिए विभिन्न स्थानों की खोज, पत्थर की गुणवत्ता, पत्थर के उत्खनन में आई समस्याओं और पत्थर को ढोकर दिल्ली लाने के लिए परिवहन की व्यवस्था करने में लगा। 


इस काम में हुई खासी-लेटलतीफी के कारण कई बार तो रिजर्व बैंक को यह बात महसूस हुई कि रामकिंकर भले ही उत्कृष्ट कलाकार होने की योग्यता रखते हो पर शायद उनके पास प्रतिमाओं को बनाने का उद्यम करने का प्रबंधकीय कौशल नहीं है। जब दिसंबर 1966 के आसपास प्रतिमाएं गढ़कर पॉलिश के लिए तैयार हुई तो स्वीकृत लागत की अनुमानित मूल राशि में खासा संशोधन करना पड़ा।

पर किस्सा यही खत्म नहीं हुआ। ऐसा इसलिए क्योंकि आखिरकार जब प्रतिमाएं को स्थापित किया गया तब करीब दस साल से ज्यादा का समय बीत चुका था। जब इन प्रतिमाओं को बनाने का आदेश दिया गया था, तब से लेकर अब तक समय, स्थिति और समाज सभी में काफी परिवर्तन आ चुका था। केवल इतना ही नहीं, देश के नेतृत्व और जनमानस दोनों का दृष्टिकोण काफी बदल चुका था। 


जब नई दिल्ली के संसद मार्ग पर रिजर्व बैंक के कार्यालय में प्रतिमाओं को स्थापित किया गया तो नागरिकों के एक वर्ग की पाखंडी संवेदनशीलता को ठेस लगी। इस वर्ग की उत्तेजना का वास्तविक कारण, अपने प्राकृतिक सौंदर्य के रूप में दर्शायी गई यक्षिणी की प्रतिमा थी। उस समय सांसद प्रोफेसर सत्यव्रत सिद्वांतालंकार ने इन प्रतिमाओं के विषय को राज्यसभा में उठाया था। उन्होंने आवास और आपूर्ति मंत्री से यह सवाल पूछा कि संसद मार्ग स्थित भारतीय रिजर्व बैंक के सामने एक नग्न स्त्री की प्रतिमा स्थापित करने का क्या उद्देश्य है, जबकि वास्तविकता में नग्न स्त्री की प्रतिमा अनिवार्य रूप से एक रूपक व्याख्या थी जो कि कृषि-समृद्वि का प्रतिनिधित्व करती थी। यह बात समझने-समझाने के लिए पर्याप्त थी पर तिस पर भी पूरक प्रश्न पूछे गए। इन प्रश्ननों में प्रतिमाओं के निर्माण की लागत के खर्च का ब्यौरा और इस कला की सिफारिश करने वाली समिति के सवाल थे। संसद के उच्च सदन में बेचैनी का कारण तो यक्षिणी की मूर्ति थी पर तब के लोकप्रिय साप्ताहिक अखबार ब्लिट्ज, जिसका न पाखंडी दृष्टिकोण था और न कला के बारे में अनजान, ने विशेष रूप से प्रतिमाओं को लेकर प्रकाशित समाचार को एक अलग ही कोण दे दिया। ब्लिट्ज ने यक्ष को एक उद्योगपति सदोबा पाटिल के समान बताते हुए यक्ष पाटिल शीर्षक वाले एक समाचार के साथ प्रतिमा की एक तस्वीर छापी। वह बात अलग थी कि राम किंकर के एक आधुनिक यक्ष, जो कि अब रिजर्व बैंक का रक्षक है, की संयोग से तब देश के बड़े व्यवसायियों में से एक सदोबा पाटिल से अद्भुत समानता थी।



ब्लिट्ज के प्रकाशित लेख को ध्यान में रखते हुए देखते हुए यह बात महसूस की गई कि प्रतिमाओं के कारण उपजी गलतफहमियों को रिजर्व बैंक की ओर से एक प्रेस विज्ञप्ति जारी करके कला-कार्य पर सफाई देनी चाहिए। फिर विज्ञप्ति को जारी करने से एक बार फिर विवादों को हवा मिलने की भी आषंका जताई गई। फिर अंत में रिजर्व बैंक में इस विषय पर चुप्पी ही साधने की बात पर सहमति बनी। पचास के दशक में, जब नेहरू ने देश में कला को प्रोत्साहन देने के विचार की कल्पना की थी, वह आशावादिता का एक युग था। जबकि तुलनात्मक रूप से, साठ के दशक में एक तरह से कला का विचार पृष्ठभूमि में चला गया था। इस तरह, दोनों कालखंडों में विचार के स्तर पर काफी अंतर आ गया था। रिजर्व बैंक के गर्वनर पी.सी. भट्टाचार्य ने समय की गति को पहचानते हुए टिप्पणी की थी कि मुश्किल समय में चुप रहना ही बेहतर होता है। आज के हिसाब से पैसे को खर्च करने का निर्णय और परियोजना के देरी से पूरा होने की बात को किसी भी तरह उचित नहीं ठहराया जा सकता है। ऐसे मेंएक प्रेस विज्ञप्ति के माध्यम से रिजर्व बैंक के प्रांगण में लगाई गई प्रतिमाओं के प्रतीकात्मक महत्व को समझाने की बात व्यर्थ ही होगी। हम संसद में पूछे जाने वाले किसी भी सवाल का सीधा या तदर्थ आधार पर जवाब दे सकते हैं। इस तरह, एक अच्छा विचार और कार्य मात्र देरी की वजह से शंका और संदेह का शिकार हुआ।


Saturday, October 19, 2019

Age old Indo_Soviet relationship_समय की धारा पर भारत-सोवियत संबंध

दैनिक जागरण, 19102019








यह एक कम जाना तथ्य है कि हिंदुस्तान ने आजादी मिलने के पहले ही सोवियत संघ के साथ राजनयिक संबंध कायम कर लिए थे। जबकि पहला सोवियत राजनयिक स्वतंत्र भारत में ही दिल्ली पहुंचा था। 13 अप्रैल 1947 को दोनों देशों के मध्य राजनियक संबंध स्थापित हुए थे। जबकि  नंवबर 1947 में दिल्ली पहुंचने वाले पहले सोवियत राजनयिक पावेल येर्जिन (1919-1992) थे। ऐसे मेंयर्जिन के सामने सबसे बड़ी चुनौती तत्कालीन भारत सरकार की सहायता से सोवियत दूतावास के लिए एक उपयुक्त स्थान की तलाश था। यर्जिन के दिल्ली पहुंचने के अगले दिन ही प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने उन्हें मिलने के लिए आमंत्रित किया। इस बैठक में नेहरू ने सोवियत राजनयिक को बताया कि भारत सरकार ने सोवियत संघ के दूतावास के लिए त्रावणकोर हाउस का चयन किया।


उसके शीघ्र बाद ही किरील नोविकोव (1905-1983) को भारत में सोवियत राजदूत नियुक्त किया गया। इससे पहलेवर्ष 1939 में नोविकोव को सोवियत विदेश मंत्रालय में नियुक्त थे। वे लंदन स्थित सोवियत दूतावास में डीसीएम बने। जबकि वर्ष 1945 में हुए प्रसिद्ध याल्टा सम्मेलन के वे मुख्य आयोजक थे। लिवाडिया पैलेस (क्रीमिया) में इस आयोजन को समर्पित संग्रहालय में उनकी राजनयिक पोषाक प्रदर्शित है।

दिसंबर 1947 में दिल्ली पहुंचे नोविकोव को यह जानकर बेहद खुशी हुई कि त्रावणकोर हाउस सरीखी शानदार इमारत सोवियत दूतावास होगी। वर्ष 1953 तक नोविकोव भारत में तैनात रहे। वर्ष 1960 में सोवियत संघ दूतावास त्रावणकोर हाउस से स्थानांतरित होकर चाणक्यपुरी में एक नई इमारत में पहुंच गया। जबकि 1960-1964 यानि चार साल की अवधि में त्रावणकोर हाउस में सोवियत सेंटर फॉर साइंस एंड कल्चर बना रहा।

सितंबर 1946 को एक रेडियो प्रसारण में अंतरिम सरकार के उपाध्यक्ष के रूप में नेहरू ने सोवियत नागरिकों को भारत की शुभकामनाएं देते हुए इस बात की घोषणा कि वे एशिया में हमारे पड़ोसी हैं और अनिवार्य रूप से हमें मिलकर अनेक साझा कार्यों का बीड़ा उठाना होगा और एक दूसरे के साथ मिलकर बहुत कुछ करना होगा। सोवियत नेताओं ने भी ऐसी भावनाओं के साथ पूरी तरह अपनी सम्मति जताई। इसका ही परिणाम था कि 13 अप्रैल 1947 को दोनों देशों ने राजनयिक संबंध स्थापित करने के निर्णय की घोषणा की। तब अंग्रेजों से भारतीय नेतृत्व के हाथों में सत्ता हस्तांतरण की वार्ता को लेकर अपनी आशंकाओं के बावजूद सोवियत संघ ने स्वतंत्रता पूर्व भारत के साथ राजनयिक संबंध स्थापित करने का फैसला लिया। एक तरह सेयह भारत में सोवियत संघ की गहरी रूचि का प्रतीक था। जो कि दोनों देशों के भविश्य के द्विपक्षीय संबंधों के विकास के लिए एक शुभंकर साबित हुआ।

15 अगस्त, 1947 को भारत की आजादी के बाद कुछ समय के लिएभारत-सोवियत संबंधों में वह पहले वाली गर्मजोशी नहीं रही। यहां तक कि दोनों देशों में कुछ दूरियां भी बढ़ी। फिर भी उस समय संयुक्त राष्ट्र में भारत और सोवियत संघ उपनिवेशवाद और नस्लवाद के मुद्दों पर एकमत और साथ थे। उदाहरण के लिएसोवियत संघ ने दक्षिण अफ्रीका में भारतीय मूल के लोगों की दुर्दशा और इंडोनेशियाई निवासियों के स्वतंत्रता संघर्ष की ओर ध्यान आकर्षित करने के भारत की कोशिशों का पुरजोर समर्थन किया। उसके शीघ्र बाद भारत की पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना को मान्यता और कोरियाई युद्ध की समाप्ति के लिए निरंतर प्रयासों ने सोवियत नेताओं को इस बात का भरोसा हुआ कि भारत पश्चिमी शक्तियों के दबावों को दरकिनार करते हुए वैश्विक मामलों में एक स्वतंत्र मार्ग का पक्षधर है। इससे भारत-सोवियत संबंधों में प्रगाढ़ता बढ़ी।

सोवियत संघ ने अब कश्मीर मुद्दे पर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की चर्चा में सक्रिय रुचि लेना शुरू किया और पूरी मजबूती से भारतीय पक्ष के समर्थन में खड़ा रहा। वर्ष 1952 में सुरक्षा परिषद में सोवियत प्रतिनिधि के भाषणों से यह बात साबित होती है। दिसंबर 1953 में पहले भारत-सोवियत व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर हुए। यह दोनों देशों के बीच व्यापार के विस्तार की एक महत्वाकांक्षीपंचवर्षीय योजना पर आधारित था। जिससे भारत को कुछ ऐसे फायदे थे जो कि आमतौर पर पश्चिमी देशों के साथ होने वाले समान व्यापारिक समझौतों में नहीं होते थे। जैसेदोनों देशों के बीच भारतीय रुपए में व्यापार होने की बात थी। इतना ही नहींआपसी व्यापार को बढ़ाने के अलावा भुगतान संतुलन को भी बनाए रखने के प्रयास किए गए। इस दौरानपरस्पर सांस्कृतिक संपर्क के बढ़ने का परिणाम दोनों देशों में विविध क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करने वाले व्यक्तियों की आपसी यात्राओं के रूप में सामने आया। 



First Indian Bicycle Lock_Godrej_1962_याद आया स्वदेशी साइकिल लाॅक_नलिन चौहान

कोविद-19 ने पूरी दुनिया को हिलाकर रख दिया है। इसका असर जीवन के हर पहलू पर पड़ा है। इस महामारी ने आवागमन के बुनियादी ढांचे को लेकर भी नए सिरे ...