Wednesday, September 13, 2017
Saturday, September 2, 2017
Traders of Delhi_Railway connection_दिल्ली के कारोबारियों का रेल कनेक्शन
आज यह बात जानकर हर किसी को अचरज होगा कि अंग्रेजों के जमाने में दिल्ली में रेलवे लाइन को लाने में शहर के व्यापारियों ने एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। आज की राजधानी में रेलवे लाइन बिछाने की बात पर सबसे पहली बार 1852 में विचार किया गया था। जबकि 1857 की पहली आजादी की लड़ाई के बाद अंग्रेजों ने दिल्ली की बजाय मेरठ से रेलवे लाइन बिछाने का मन बना लिया था। जिससे ब्रिटेन और दिल्ली में निराशा का माहौल बना।
1863 में व्यापारियों की एक बैठक हुई, जिसमें अंग्रेज सरकार से दिल्ली को रेलवे लाइन से वंचित नहीं किए जाने का अनुरोध किया गया। इस बैठक में अनेक अधिकारियों सहित सम्मानित नागरिकों ने हिस्सा लिया। आजादी की पहली लड़ाई के पांच साल बाद राजधानी में जुटी यह एक बड़ी संख्या थी। इनमें हिंदू और जैन साहूकार, हिंदू, मुस्लिम और एक पारसी व्यापारी और पांच मुस्लिम कुलीन शामिल थे। उन्होंने सेक्रेटरी आॅफ स्टेट को सौंपी एक याचिका में कहा कि रेलवे लाइन को हटाने से न केवल दिल्ली का कारोबार प्रभावित होगा बल्कि यह रेलवे के शेयर खरीदने वालों के साथ अन्याय होगा। यह एक महत्वपूर्ण बात थी क्योंकि आमतौर पर चुनींदा भारतीयों ने ही ब्रिटिश भारतीय रेलवे कंपनियों के उद्यमों में निवेश किया था लेकिन यह 1863 की बात थी जब यह कहा गया था कि दिल्ली के कुछ पूंजीपतियों ने शेयर खरीदे हैं।
इन व्यापारियों और पंजाब रेलवे कंपनी (जो कि ईस्ट इंडिया रेलवे के साथ दिल्ली में एक जंक्शन बनाना चाहती थी क्योंकि मेरठ अधिक दूरी पर था) के
दबाव के नतीजन चार्ल्स वुड ने वाइसराय के फैसले को पलट दिया। 1867 में नए साल की पूर्व संध्या की अर्धरात्रि को रेल की सीटी बजी और दिल्ली में पहली रेल दाखिल हुई। गालिब की "जिज्ञासा का सबब" इस "लोहे की सड़क" से शहर की जिंदगी बदलने वाली थी।
Butterfly world in Delhi_राजधानी का तितली संसार
भारत के अधिकांश तितलियां दक्षिण, पश्चिमी घाट और उत्तर-पूर्व में पाई जाती है पर ऐसे में दिल्ली भी पीछे नहीं है। दुनिया में पाई जाने वाली तितलियों की 17000 प्रजातियों में से देश में 1600 और दिल्ली में करीब 90 प्रजातियां हैं। गौर करने वाली बात यह है कि राजधानी में बारिश के बाद तितलियों की उपस्थिति न केवल संख्या में बल्कि विविधता में भी बढ़ जाती है और ऐसे में मार्च-अप्रैल और सितंबर-अक्तूबर के दौरान तितलियों की अच्छी संख्या दिखती है।
डेनमार्क के कीट विज्ञानी टॉरबेन बी लार्सन ने 1986 में दिल्ली की तितलियों पर काम करते हुए तितलियों की 86 प्रजातियों की उपस्थिति दर्ज की थी। उनका यह शोध पत्र 2002 में ही प्रकाशित हुआ था। इससे पहले राजधानी में तितलियों पर 1943, 1967 और 1971 में शोध कार्य हुए हैं। उल्लेखनीय है कि हिंदी में भारतीय तितलियों पर प्रथम संदर्भ पुस्तक "भारत की तितलियां" भारतीय प्राणी सर्वेक्षण के डॉ आर.के. वार्ष्णेय ने लिखी।
पिछले दशक के अध्ययन में राजधानी में तितलियों की छह नई प्रजातियां देखी गई हैं। जेएनयू के जीव विज्ञानी तितलियों और पतंगों में विशेषज्ञ डॉ सूर्य प्रकाश ने अपनी दस साल (2003-2013) के शोध के बाद इस बात का खुलासा किया कि रेड पियरोट, काॅमन जे, कॉमन बैरन, इंडियन टोर्टोसेसेल्ल,कॉंनजोइन्ड स्विफ्ट और कॉमन ब्लूबॉटल नामक प्रजातियाँ अब आधिकारिक रूप से दिल्ली के तितली संसार का अभिन्न हिस्सा है।
2013 में अरावली जैव विविधता पार्क में तितलियों की 95 प्रजातियां और यमुना जैव विविधता उद्यान में 70 प्रजातियों की उपस्थिति दर्ज की गई थी। जबकि आसोला भाटी वन्यजीव अभयारण्य में तितलियों की 80 से अधिक प्रजातियां है। नई दिल्ली नगर पालिका परिषद ने 2009 में लोदी गार्डन में तितलियों के लिए विशेष रूप से एक संरक्षक क्षेत्र बनाया।
यह एक आम धारणा है कि तितलियां अपने भोजन के लिए केवल फूलों पर निर्भर है। जबकि सच यह है कि तितलियों गली हुई लकड़ी, मृत पशु और यहां तक कि गोबर से भी अपना खाना पाती है। उदाहरण के लिए, दिल्ली के सब्जी मंडियों में आम तौर पर दिखने वाली काॅमन बैरोन तितली आम से अपना भोजन प्राप्त कर रही थी। जबकि दिल्ली में लाल पिएरॉट तितली के आगमन का कारण दिल्ली में उगाया जा रहा "कलंचो पिननाटा" नामक एक विदेशी सजावटी पौधा है, जिससे यह तितली अपना भोजन लेतीहै। इसी तरह काॅमन जय तितली का राजधानी में दक्षिण भारत से करी पत्ता के औषधीय पौधे के साथ आगमन माना जाता है।
पर दिल्ली के तितली संसार में हालात इतने अच्छे भी नहीं है। 1986 में लार्सन की तितलियों की गणना के बाद से राजधानी में तितलियों की कुछ विशेषप्रजातियों की संख्या में कमी आई है या वे पूरी तरह से लुप्त प्रायः हो गई है। इनमें प्रमुख हैं ब्लैक राजा, कॉमन सैलर, जेंट रेडये, इंडियन फ्र्रिटलरी, कॉमन प्योरॉट, कॉमन रोज, क्रिमसन रोज, टैवनी कॉस्टर और इंडियन ईजेबल। जबकि महत्वपूर्ण बात यह है कि लार्सन ने अपनी पुस्तक "द हैजर्ड्स ऑफ बटरफ्लाई कलेक्टिंग" में इस बात का उल्लेख किया है कि उन्होंने इंडियन ईजेबल की सुंदरता से प्रेरित होकर ही तितलियों का अध्ययनआरंभ किया था।
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