Friday, January 8, 2016
Wednesday, January 6, 2016
Mastani Bajirao_बिना मस्तानी के भी था एक बाजीराव
हाल में ही निर्देशक संजय लीला भंसाली की रिलीज हुई हिंदी फिल्म "बाजीराव मस्तानी" ने सिनेमाई दर्शकों के साथ जनसाधारण के मन में भी बाजीराव को लेकर उत्सुकता पैदा की है। आखिर यह वीर मराठा था कौन? लाख टके का सवाल है यह है कि फिल्मी मस्तानी से अलग बाजीराव का व्यक्तित्व कैसा था? इतिहास के पन्ने खँगालने पर पता चलता है कि बाजीराव ने न केवल महाराष्ट्र बल्कि राष्ट्र के इतिहास को अपनी विलक्षण प्रतिभा और वीरता से प्रभावित किया।
मुगल दिल्ली से बाजीराव का परिचय युवावस्था में ही हो गया था। वे अपने पिता पेशवा बालाजी विश्वनाथ के साथ दिल्ली वर्ष 1718-1719 में आए थे। तब बालाजी विश्वनाथ ने मुगल बादशाह फर्रूखसियर के वजीर और सैयद बंधुओं में से एक हुसैन अली खां के साथ संधि की थी। इस संधि में मराठों को मुगलों के छह दक्खिनी सूबों की चौथ और सरदेशमुखी वसूलने तथा छत्रपति शाहू को मराठा स्वराज्य का शासक होने के अधिकार मिला। बादशाह फर्रूखसियर के इस संधि से इंकार करने के कारण सैयद बंधुओं ने उसे तख्त से बेदखल और अंधा बनाकर कैद में डाल दिया। उसके बाद बने, दूसरे बादशाह रफीउलद्दौला ने मराठा संधि को अपनी स्वीकृति दी।
इस तरह, बाजीराव को अपनी पहली दिल्ली यात्रा में ही मुगल सल्तनत के खोखलेपन का आभास हो गया। छत्रपति शाहू ने पेशवा बालाजी विश्वनाथ की मृत्यु के बाद उनके ज्येष्ठ पुत्र 19 वर्षीय बाजीराव को सन् 1720 अपना पेशवा नियुक्त किया।बाजीराव अपनी मृत्यु तक यानी सन् 1740 तक पेशवा के पद पर रहे।
पेशवा बाजीराव अपने पिता से अधिक महत्वाकांक्षी, युद्धप्रिय और कुशाल सेनानी थे। यह कालखंड देश में हिंदू चेतना का नवोत्थान था जो कि बालाजी विश्वनाथ के पेशवा के रूप में अभिषेक (सतारा, 1713) से आरंभ होकर बाजीराव पेशवा के महान अभियानों (1723-1740) तक रहा।
बाजीराव ने पेशवा बनने के बाद मराठा राज्य के उत्तर दिशा में विस्तार करने की नीति अपनाई। उन्होने छत्रपति शाहू के दरबार में कहा, "जो कुछ तुम्हारे पास है उसे बचाओ और उसकी वृद्धि के लिए प्रयत्न करो, सब ओर महाराष्ट्र साम्राज्य का प्रसार करो। मुझे विश्वास है कि हमारी संगठित शक्ति निजामुल मुल्क मुहम्मद खां आदि को शीघ्र की पराजित कर देगी।" बाजीराव का कहना था, "यदि हम जर्जर वृक्ष के तने पर ही सीधे प्रहार करेंगे तो उसकी शाखा-प्रशाखाएं तो अपने से ही गिर पड़ेगी। उनकी वक्तृता के प्रभाव में आकर छत्रपति शाहू ने भी इसके लिए अपनी स्वीकृति दे दी।"
बाजीराव ने दक्कन में मराठा राज्य को निष्कंटक करने के लिए निजाम आसफजाह निजामुलमुल्क से अनेक बार मोर्चा लिया और हर बार उसे पटकनी दी। बाजीराव ने मार्च 1728 को पालखेड़ के समीप निजाम को करारी हार दी और उसे मुंगी शिवागांव की संधि मानने के लिए बाध्य कर दिया। इस संधि के अनुसार, निजाम ने शाहू को चौथ और सरदेशमुखी देना, शंभूजी को सहायता न देना, विजित प्रदेश लौटाना स्वीकार किया। निजाम की इस हार से दक्कन में मराठों की सर्वोच्चता स्थापित हो गई और उनका देश के पूर्व तथा दक्षिण भाग में प्रसार करना, अब केवल समय का प्रश्न था।
पेशवा बाजीराव के बारे में अंग्रेज इतिहासकार रिचर्ड टेम्पल ने लिखा है कि वे घुड़सवारी में अद्वितीय थे तथा आक्रमण में आगे रहकर भयंकर से भयंकर स्थितियों में अपने को सदैव परखने के लिए इच्छुक रहा करते थे। वे कष्ट सहिष्णु थे। अपने सैनिकों के साथ आपत्तियों को झेलने में वे गर्व महसूस करते थे। स्वदेश भक्ति से ओत प्रोत हिन्दुत्व के पुराने विरोधी मुसलमानों और नए बैरी अंग्रेजों पर विजय पाना वे राष्ट्रीय धर्म समझते थे। बाजीराव ने हिंदू पद पादशाही के आदर्श का प्रचार किया और इसे लोकप्रिय बनाया ताकि अन्य हिंदू राजा इस योजना में मुगलों के विरुद्ध इनका पक्ष लें और साथ दें।
वहीं उत्तर भारत में, इलाहाबाद के मुग़ल सूबेदार मुहम्मद खां बंगश ने बुंदेलखंड पर हमला किया। जिस पर बुंदेला राजा छत्रसाल ने पेशवा बाजीराव को अपनी सहायता के लिए पत्र में लिखा, वहीं उत्तर भारत में, इलाहाबाद के मुग़ल सूबेदार मुहम्मद खां बंगश ने बुंदेलखंड पर हमला किया। जिस पर बुंदेला राजा छत्रसाल ने पेशवा बाजीराव को अपनी सहायता के लिए पत्र में लिखा,
जो गति ग्राह गजेन्द्र की, सो गति भइ है आज।
बाजी जात बुन्देल की, राखो बाजी लाज।
इस पत्र के उत्तर में पेशवा बाजीराव ने लिखा कि आप निश्चिंत तथा निर्भय रहें। हम इस धर्मयुद्ध में सब प्रकार से आपकी सहायता करने को तत्पर है।
वे होंगे छत्तापता, तुम होग छतसाल।
वे दिल्ली की ढाल तो, तुम दिल्ली ढालनेवाल।
पेशवा बाजीराव राजा छत्रसाल की सहायता के लिए बुंदेलखंड कूच कर गए और इन दोनों की 60 हजार की संयुक्त सेना ने मुगल फौज के छक्के छुड़ा दिए। मुग़ल सूबेदार हारकर राजा छत्रसाल और पेशवा बाजीराव से संधि करनी पड़ी। इस तरह, सन् 1728 तक मराठों ने बुंदेलखंड के सभी विजित प्रदेश मुगलों से वापिस छीन लिए।
पेशवा बाजीराव ने तो छत्रसाल की सहायता निरपेक्ष भाव से की थी, फिर भी इस कृपा से छत्रसाल बाजीराव से अभिभूत हो गए। अतः सन् 1733 में वीर छत्रसाल ने अपनी मृत्यु के समय अपने राज्य को तीन भागों में विभाजित कर दिया। पहले दो भाग अपने पुत्रों और तीसरा भाग बाजीराव प्रथम को दे दिया। यहीं से मध्य भारत में मराठा ब्राहाणों के राजवंश की नींव पड़ी। छत्रसाल के उत्तराधिकारी भी बाजीराव के मित्र और सहायक रहे।
सन् 1735 तक मराठों ने पूरे गुजरात और मालवा पर अपना नियंत्रण कायम कर लिया था। पर स्थानीय मुगल अधिकारियों के प्रभाव में कुछ क्षेत्रों ने मराठा प्रभुत्व मानने से इंकार कर दिया। तो मुगल बादशाह मुहम्मद शाह भी मराठों को चौथ और सरदेशमुखी के अधिकार के लिए शाही आदेश जारी करने में आनाकानी कर रहा था। इतना ही नहीं, मुगल बादशाह ने पेशवा बाजीराव से मिलने को भी टाले रखा।
ऐसे में, बाजीराव ने मराठों की शक्ति प्रदर्शन का निश्चय किया। वर्ष 1737 में बाजीराव ने एक बड़ी मराठा सेना के साथ दिल्ली की ओर कूच किया। बाजीराव ने मराठा सेना को दो टुकडि़यों में बांट दिया। सेना की एक टुकड़ी का नेतृत्व पेशवा बाजीराव और दूसरी टुकड़ी की संयुक्त कमान पीलाजी जाधव और मल्हारराव होल्कर के हाथ में थी। अवध के नवाब और आगरा के मुगल सूबेदार सआदत खान की विशाल घुड़सवार सेना से टक्कर में होल्कर की मराठा टुकड़ी को पीछे हटना पड़ा। ऐसे में, होल्कर की टुकड़ी वापस बाजीराव की टुकड़ी में आकर मिल गई। उधर, सआदत खान ने मुगल बादशाह मुहम्मदशाह रंगीला को मराठों की हार की झूठी खबर दी, जिसके फलस्वरूप मथुरा से दिल्ली तक मुगल जश्न मनाने लगे। यह खबर सुनकर दूसरे मुगल सेनापति भी सआदत खान की कथित कामयाबी के जश्न में शरीक होने की गरज से दिल्ली छोड़कर निकल गए।
ऐसे में, पेशवा बाजीराव ने मुगल बादशाह को मराठा शक्ति की एक झलक दिखाने की सोची। बाजीराव के नेतृत्व में मराठा टुकड़ी ने दिल्ली से दूर डेरा डालकर ठहरी मुगल फौज को चकमा देते हुए तेजगति से दिल्ली के बाहरी इलाके में पहुंच गई। बाजीराव ने दस दिन की दूरी केवल अड़तालीस घंटे में पूरी करके सबको हैरान कर दिया और मराठा सेना ने तुगलकाबाद पहुंचकर धूम मचा दी।
पेशवा कुतुबमीनार आकर रुके और फिर मराठों ने मुग़ल दिल्ली को बुरी तरह रौंद डाला। ऐसे में, मुगल बादशाह अपनी जान बचाने के लिए सुरक्षित लाल किले में जाकर छिप गया। यहाँ तक कि लाल किले से मीर हसन कोका के नेतृत्व में आठ हजार की मुगल फौज को भी बाजीराव के हाथों बुरी तरह मुंह की खानी पड़ी। पेशवा बाजीराव बेशक दिल्ली में केवल तीन दिन ठहरे पर इस दौरान उन्होंने मुगल सल्तनत के खोखलेपन को जगजाहिर कर दिया।
दिल्ली के मुगल दरबार के बाजीराव के खिलाफ मुकाबले के लिए किए गए सारे प्रयत्न निष्फल रहे। एक दिन वह भी था, जब मराठा जाति के अभ्युत्थान को दिल्ली की तरफ से बार-बार बाधा दी गई। लेकिन अब दिल्ली में दम्भ, घमंड,अहंकार में चूर, तैमूरी बादशाहों के सल्तनत का पतन शुरू हो चुका था। सन्1738 में मुगल बादशाह ने निजाम को फिर दिल्ली बुलाया और उसे आसफजां का खिताब देकर मराठों के विरुद्ध भेजा। पेशवा बाजीराव ने उसे एक बार फिर भोपाल के युद्ध में बुरी तरह पराजित कर दिया। निजाम को हारकर बाजीराव से दुरई-सराय की संधि करनी पड़ी। निजाम ने मालवा, नर्मदा के बीच की संपूर्ण भूमि और 50 लाख रूपए बाजीराव को दिए। इस तरह, मुगल बादशाह और निजाम को मुंह की खानी पड़ी और मराठा शक्ति की सर्वोच्चता को स्वीकार करना पड़ा।
पेशवा बाजीराव ने देश में बृहद मराठा साम्राज्य की नींव डाली। प्रसिद्ध इतिहासकार जदुनाथ सरकार पेशवा बाजीराव को रचनात्मक पूर्व दृष्टि रखने वाला मानते हुए लिखते हैं, "यदि सर राबर्ट वालपोल ने इंगलैंड के प्रधानमंत्री पद को अप्रतिरोध्य सत्ता का केंद्र बना दिया तो ठीक उसी प्रकार बाजीराव ने ऐसी ही सत्ता का केंद्र मराठा राज्य में भी बना दिया।"
जबकि जी.एस. सरदेसाई के अनुसार, "अब शाहू एक छोटे से राज्य के राजा नहीं थे जिनके अधीन एक भाषा-भाषी लोग रहते थे जैसा कि उनके पिता या पितामह के काल में था। अब वह एक दूर-दूर तक विस्तृत तथा भिन्न प्रदेशों के महाराजा थे। मराठों का राज्य अब अरब सागर से बंगाल की खाड़ी तक फैला था और भारतीय मानचित्र पर स्थान-स्थान पर मराठा शक्ति के केंद्र थे। भारतीय शक्ति का केंद्र बिंदु अब दिल्ली नहीं पूना था।"
रिचर्ड टेम्पल ने पेशवा बाजीराव का वर्णन करते हुए लिखा है "वह खेमों में ही जिए और खेमों में ही मरे, अपने साथियों के बीच।" शायद इसीलिए आज तक लोग उन्हें सैनिक पेशवा तथा शक्ति के अवतार के रूप में स्मरण करते हैं।
Saturday, December 5, 2015
Delhi connection of Prithviraj Kapoor_पृथ्वी के राज का दिल्ली सूत्र
“हम बेशक आसमान में उड़ रहे हो पर हमारा जमीन से नाता नहीं टूटना चाहिए। पर अगर हम अर्थशास्त्र और राजनीति की जरूरत से ज्यादा पढ़ाई करते हैं तो जमीन से हमारा नाता टूटने लग जाता है-हमारी आत्मा प्यासी होकर तन्हां हो जाती है। हमारे राजनीतिक मित्रों को उसी प्यासी आत्मा की स्थिति से सुरक्षित रखने और बचाने की जरूरत है और इस उद्देश्य के लिए शिक्षाविदों, वैज्ञानिकों, कवियों, लेखकों और कलाकारों के रूप में नामित सदस्य यहाँ (राज्यसभा) उपस्थित हैं।’’इस शब्दों के साथ, पृथ्वीराज कपूर ने देश की राजधानी दिल्ली में संसद के उच्च सदन में एक कलाकार की ओर से नामित सदस्यों की भूमिका के बारे में दी गई बेहतरीन दार्शनिक व्याख्या न केवल अपने नामांकन बल्कि इस विषय में हमारे गणराज्य के संस्थापक सदस्यों के दृष्टिकोण को भी न्यायसंगत साबित कर दिया।देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू पृथ्वीराज के बड़े प्रशंसकों में से एक थे। नेहरू के समय में ही पृथ्वीराज को पहली बार राज्यसभा के लिए नामित किया। वे दो बार, वर्ष 1952 में दो साल के लिए और फिर वर्ष 1954 में पूर्ण काल के लिए राज्यसभा के सदस्य रहे। “पुस्तक थिएटर के सरताज पृथ्वीराज’’ (प्रकाशक: राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय) में योगराज लिखते है कि जब पृथ्वीराज राज्यसभा में अपने नामांकन को लेकर दो-मन थे। बकौल पृथ्वीराज, “थिएटर की भलाई और राज्यसभा की व्यस्तताएं, पर क्या किया जाए!मुझे इन परिस्थितियों का मुकाबला तो करना होगा। थिएटर को भी जिंदा रखना है और सरकार के इस सम्मान को भी निभाना है। दूसरा कोई चारा नहीं है चलो थिएटर की सलामती के लिए और बेहतर लड़ाई लड़नी होगी।’’उनके साथ कंस्टीट्यूशन हाउस में रहे वी एन कक्कड़ अपने संस्मरणों वाली पुस्तक “ओवर ए कप ऑफ काफी’’ में बताते हैं, पृथ्वीराज ने उन्हें एक बार कहा कि, “मुझे वास्तव में नहीं पता कि मुझे राज्यसभा में क्या करना चाहिए। मेरे लिए मुगल-ए-आजम फिल्म में अभिनय करना राज्यसभा में एक सांसद की भूमिका निभाने से आसान था। भगवान जाने पंडित जी ने मुझमें क्या देखा। लेकिन जब भी मैं दिल्ली में रहूंगा और राज्यसभा का सत्र होगा तो मैं निश्चय ही उसमें भाग लूंगा।’’ 60 के दशक के आरंभ में कंस्टीट्यूशन हाउस कस्तूरबा गांधी मार्ग पर होता था, जहां पृथ्वीराज शुरू में बतौर राज्यसभा सांसद रहें। वैसे बाद में वे अपने कार्यकाल के अधिकतर समय में इंडिया गेट के पास प्रिंसेस पार्क में रहे।“राज्य सभा के नामांकित सदस्य पुस्तिका’’ (प्रकाशक: राज्यसभा सचिवालय) के अनुसार, एक थिएटर कलाकार और सिने अभिनेता के रूप में अपने उत्कृष्ट योगदान के लिए राज्यसभा के सदस्य के रूप में नामित पृथ्वीराज कपूर ने सदन के पटल पर नामजद सदस्यों (जिसका संदर्भ मैथिलीशरण गुप्त का था) के अपने आकाओं के विचारों को व्यक्त करने के आरोप का खंडन करते हुए कहा, “जब यहां अंग्रेजों का राज था और जनता पर दमिश्क की तलवार लटक रही थी तब मैथिलीशरण गुप्त जैसे क्रांतिकारी थे, जिनमें भारत भारती लिखने का साहस था। ऐसे में, उस समय हिम्मत करने वाले निश्चित रूप से आज अपने मालिकों के समक्ष नहीं नत मस्तक होंगे। वे (नामजद सदस्य) तर्क और प्रेम के सामने झुकेंगे और न कि किसी और के सामने।” पृथ्वीराज कपूर ने देश की सांस्कृतिक एकता के अनिवार्य तत्व को रेखांकित करते हुए 15 जुलाई 1952 को राज्यसभा में एक राष्ट्रीय थिएटर के गठन का सुझाव दिया था। जिसके माध्यम से विभिन्न संप्रदायों और भिन्न-भिन्न भाषाएं बोलने वाले व्यक्तियों को एक साथ लाने और एक समान मंच साझा करने तथा उचित व्यवहार सीखने के अवसर प्रदान किए जा सकें।वर्ष 1954 में संगीत नाटक अकादमी के 'रत्न सदस्यता सम्मान' से सम्मानित होने के बावजूद उन्होंने पृथ्वी थिएटर के लिए किसी भी तरह की सरकारी सहायता लेने से इंकार कर दिया। भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने उन्हें कई सांस्कृतिक प्रतिनिधिमंडलों में विदेश भेजा। पृथ्वीराज कपूर और बलराज साहनी वर्ष 1956 में चीन की यात्रा पर गए एक भारतीय सांस्कृतिक प्रतिनिधिमंडल का हिस्सा थे।
रंगमंच का कलाकार होने और सिनेमा के फ़र्श से अर्श तक पहुँचने के कारण वे रंगमंच-सिने जगत की चुनौतियों और कलाकारों को रोजमर्रा के जीवन में होने समस्याओं से अच्छी तरह से परिचित थे। उन्होंने राज्यसभा के सदस्य के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान मंचीय कलाकारों के कामकाज की स्थिति को सुधारने के लिए कड़ी मेहनत की। इसी का नतीजा था कि वे मंचीय कलाकारों के लिए रेल किराए में 75 प्रतिशत की रियायत प्राप्त करने में सफल रहे। उनकी पोती और पृथ्वी थिएटर को दोबारा सँभालने वाली संजना कपूर के अनुसार, “मेरे दादा के कारण ही आज हम 25 प्रतिशत रेल किराए में पूरे देश भर में यात्रा करने में सक्षम हैं अन्यथा हम अपना अस्तित्व ही नहीं बचा पाते।“ इतना ही नहीं, पृथ्वीराज ने देश के अनेक शहरों में रवींद्र नाट्य मंदिरों की भी स्थापना की।
शशिकपूर के शब्दों में, पृथ्वीराज कपूर अपनी थिएटर कंपनी, जिसने लगातार 16 साल 150 स्थायी व्यक्तियों के साथ नाटक किए, को अपना नशा कहते थे। वे मुंबई के सबसे पेशेवर अभिनेता प्रबंधक के रूप में जाने जाते थे। ऐसा माना जाता है कि पृथ्वी थिएटर ने भारत में अनेक शौकिया समूहों के लिए मानक निर्धारित किए। इतना ही नहीं, पृथ्वीराज कपूर आल इंडिया रेलवे यूनियन के अध्यक्ष रहे और विश्व शांति कमेटी के भारतीय चेयरमैन भी।थिएटर में रूझान के कारण कानून की अपनी पढ़ाई को बीच में ही छोड़कर पेशावर से मुंबई अपनी किस्मत आजमाने पहुंचे और पृथ्वीराज इंपीरियल फिल्म कंपनी से जुड़े। वर्ष 1931 में प्रदर्शित पहली भारतीय बोलती फिल्म ‘आलमआरा’ में पृथ्वीराज ने बतौर सहायक अभिनेता काम करते हुए चौबीस वर्ष की आयु में ही अलग-अलग आठ दाढि़यां लगाकर जवानी से बुढ़ापे तक की भूमिका निभाई। फिर राज रानी (1933), सीता (1934), मंजिल (1936), प्रेसिडेंट, विद्यापति (1937), पागल (1940) के बाद पृथ्वीराज फिल्म सिकंदर (1941) की सफलता के बाद कामयाबी के शिखर पर पहुंच गए। उनकी अंतिम फिल्मों में राज कपूर की ‘आवारा’ (1951), ‘कल आज और कल’, जिसमें कपूर परिवार की तीन पीढियों ने अभिनय किया था और ख्वाजा अहमद अब्बास की ‘आसमान महल’ थी। उन्होंने कुल नौ मूक और 43 बोलती फिल्मों में काम किया।हिंदी सिनेमा के सितारे पृथ्वीराज कपूर ने कनॉट प्लेस के सिनेमाघरों में कई नाटकों का प्रदर्शन किया। पुस्तक थिएटर के सरताज पृथ्वीराज के अनुसार, “इसी बीच पृथ्वीराज कपूर अपना थिएटर लेकर दिल्ली आए। उन दिनों उनके तीन नाटक बहुत चर्चित थे-“शकुन्तला”, “दीवार” और “पठान”। ये तीनों नाटक अपनी-अपनी जगह लोगों की खूब वाह-वाही ले रहे थे। संस्कृत भाषा के महाकवि कालिदास का अभिज्ञान शाकुन्तलम् उर्दू में बिलकुल पारसी थिएटर की शैली में नाटकीय रूपांतर था। दूसरा नाटक “दीवार” था जो राष्ट्रीय एकता पर देश के विभाजन के विरोध में था। इसी तरह पृथ्वी थिएटर के तीसरे नाटक “पठान” को लिखने में भी पृथ्वीराज का बड़ा हाथ था।‘आई गो साउथ विथ पृथ्वीराज एंड हिज पृथ्वी थिएटर्स’ पुस्तक (प्रकाशक:पृथ्वी थिएटर्स) में प्रोफेसर जय दयाल लिखते हैं, ‘पृथ्वी ने हर तरह के उतार-चढ़ाव का सामना करते हुए निर्भीकता के साथ ‘दीवार’ का मंचन किया। एक लम्बे अंतराल के बाद इस नाटक को आला स्तर के नेताओं से एक महत्वपूर्ण प्रस्तुति के रूप में मान्यता मिली। तत्कालीन उपप्रधानमंत्री और सूचना एवं प्रसारण मंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल ने नाटक को अंत तक बैठकर देखा जबकि वह केवल मात्र एक सरकारी उपस्थिति की खानापूर्ति के लिए आए थे।'दीवार' ने उन्हें गुदगुदाने के साथ उनकी आँखे भी नम कर दी और इसका नतीजा पृथ्वी थिएटर को मनोरंजन कर से मिली छूट के रूप में सामने आया।गौरतलब है कि पहले कनाट प्लेस के रीगल सिनेमा में रूसी बैले, उर्दू नाटक और मूक फिल्में दिखाई जाती थीं। पृथ्वीराज कपूर ने कनॉट प्लेस के कई थिएटरों में मंचित अनेक नाटकों में अभिनय किया था। आज़ादी से पूर्व उस दौर में, यहां समाज के उच्च वर्ग का तबका, जिनमें अंग्रेज़ अधिकारी और भारतीय रजवाड़ों के परिवार हुआ करते थे, नाट्य प्रस्तुति देखने आया करता था।उस समय जब दिल्ली में पृथ्वी थिएटर के नाटक रीगल सिनेमा हाल में हो रहे थे। सारे शो हाउसफुल थे। लोग टूटे पड़ते थे। हो सकता है, लोगों की इस भीड़ का कारण बहुत हद तक ये हो कि स्टेज पर उनके सामने एक बहुत बड़ा नामवर फिल्मी अभिनेता चलता-फिरता नजर आएगा। इसके अतिरिक्त लोग देखेंगे तो नाटक ही न। योगराज के शब्दों में, जहां तक मुझे याद है, दो या तीन सप्ताह पृथ्वी थिएटर अपने इन तीनों नाटकों को बार-बार खेलते रहे और लोग इसी तरह भीड़ की शक्ल में आते रहे।”आज यह बात जानकर सबको हैरानी होगी कि थिएटर की मशहूर अदाकारा जोहरा सहगल ने पृथ्वी थिएटर में अपनी पारी की शुरूआत बतौर एक नृतकी के रूप में की थी। प्रसिद्व रामपुर राजघराने से संबंधित जोहरा भारत के मशहूर और अंतरराष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त नर्तक उदयशंकर के बेले ग्रुप में थीं और इस ग्रुप में महत्वपूर्ण स्थान रखती थी। पृथ्वीराज के बारे में जोहरा कहती है, “उन्होंने मुझे विनम्रता का पाठ पढ़ाया और मेरे व्यक्तित्व में से घमंड को पूरी तरह निकाल बाहर किया। मैंने हमारी नाट्य मंडलियों के साथ रेल के तीसरे दर्जे में पूरे भारत का दौरा करने के कारण ऐसी चीजें सीखीं जिन्हें करना पहले मैं अपनी हेठी समझती थी। जोहरा के लिए, पृथ्वीजी देवता थे।पृथ्वीराज कपूर ने वर्ष 1944 में तत्कालीन फारसी और परंपरागत थिएटरों से अलग आधुनिक शहरी थिएटर की अवधारणा को मूर्त रूप देते हुए पृथ्वी थिएटर शुरूआत की। पृथ्वी थिएटर ने सोलह वर्ष में 2662 नाट्य प्रस्तुतियां दी, उसके बहुचर्चित नाटकों में दीवार, पठान, 1947, गद्दार, 1948 और पैसा थे। उल्लेखनीय है कि टेलीविजन सीरियल के निर्माता रामानंद सागर और प्रसिद्व संगीतकार जोड़ी शंकर-जयकिशन जैसे कलाकार पृथ्वी थिएटर से ही फिल्मी दुनिया में आए।हिंदी फिल्मों में सम्मोहित अभिनय और रंगमंच को नई दिशा देने वाले पृथ्वीराज का 29 मई, 1972 को निधन हुआ। उन्हें मरणोपरांत सिनेमा जगत के सबसे बड़े सम्मान दादा साहब फाल्के (वर्ष 1971) से सम्मानित किया गया था।
Subscribe to:
Posts (Atom)
First Indian Bicycle Lock_Godrej_1962_याद आया स्वदेशी साइकिल लाॅक_नलिन चौहान
कोविद-19 ने पूरी दुनिया को हिलाकर रख दिया है। इसका असर जीवन के हर पहलू पर पड़ा है। इस महामारी ने आवागमन के बुनियादी ढांचे को लेकर भी नए सिरे ...











