Saturday, December 16, 2017
Saturday, December 9, 2017
First colour film_Delhi Durbar_1911_दुनिया की पहली रंगीन फिल्म बनी थी, दिल्ली दरबार में
यह बात जानकर हर किसी को अचरज होगा कि दुनिया की पहली सफल रंगीन छायांकन, हकीकत में 1911 में दिल्ली में हुए राज्यारोहण दरबार में फिल्मायी गयी थी। वह बात अलग है कि वर्ष 2000 तक इसकी रील गायब हो रखी थी। विश्व फिल्म के इतिहास में आम तौर पर दिल्ली दरबार में चार्ल्स अर्बन की उपस्थिति की अनदेखी की जाती है। अर्बन ने दिल्ली दरबार की घटनाओं, अंग्रेज साम्राज्य के उत्कर्ष की घड़ियों और उसके सबसे बड़े दृश्यमान जमावड़े को फिल्मांकन के लिए अपनी कीनेमाक्लोर प्रक्रिया का इस्तेमाल किया। हिंदुस्तान के माध्यम से अंग्रेज राजा और रानी को पहली बार रंगीन छायांकन या किसी तरह की एक फिल्म का भाग बनने के कारण अधिकतर पश्चिमी दुनिया के दर्शकों ने इसे देखा।
इस फिल्म ने कामकाजी तबके के लिए एक सस्ते रोमांचक पिक्चर शो को दुनिया भर के भद्रलोक के लिए एक उपयुक्त मनोरंजन का स्थान दिला दिया। उल्लेखनीय है इसे देखने वाले भद्रलोक में ब्रिटिश शाही परिवार, पोप और जापान के सम्राट तक थे। इसके बावजूद कुछ वर्षों के भीतर ही इस फिल्म का फुटेज गायब हो गया था। वर्ष 2000 में इसकी एक रील, रूस के एक शहर क्रास्नोगोस्र्क में मिली। प्राकृतिक रंगीन फिल्मों की पहली पीढ़ी में फिल्म उत्पादन के क्षेत्र में क्रांतिकारी परिवर्तन लाने वाली इस भव्य फिल्म के केवल दस मिनट का फुटेज ही शेष बचा है।
कीनेमाक्लोर की अंग्रेज शाही परिवार के आयोजनों में भागीदारी बाॅम्बे के विक्टोरिया मेमोरियल के उद्घाटन से शुरू हुई जो कि बाद में जॉर्ज पंचम के राज्यारोहण तक चली। जब तत्कालीन अंग्रेज वाइसराॅय लॉर्ड हार्डिंग ने हिंदुस्तान की प्राचीन राजधानी दिल्ली में नए राजा-सम्राट की मेजबानी की तब अर्बन ने इस फिल्म शूटिंग की।
वर्ष 1911 के दिल्ली दरबार में कुल पांच फर्मों को शूटिंग, जिसे अब डाक्यूमेंटरी फुटेज कहा जाता है, करनी की अनुमति दी गई थी। इनमें से रंगीन शूटिंग करने वाली अर्बन की ही टीम थी। इस टीम ने अंग्रेज राजा और रानी के मुंबई में अपोलो बंदर (जहां पर बाद में गेटवे ऑफ इंडिया बना) में उतरने-जाने तक की फुटेज तैयार की। शाही युगल दम्पति ने लाल किला के उत्तर में बने सलीमगढ़ किले के द्वार पर बने प्रस्तर हाथियों के बीच से होते हुए दिल्ली में प्रवेश किया। जबकि हकीकत में दिल्ली दरबार अनेक परेडों और शाही घोषणाओं की एक श्रृंखला थी, जिसका अंत अंग्रेज सम्राट की दो घोषणाओं के साथ हुआ। इनमें से पहली बंगाल विभाजन की समाप्ति और दूसरी अंग्रेज साम्राज्य की राजधानी को कलकत्ता से दिल्ली स्थानांतरित करने की थी।
अगर दिल्ली दरबार को पूरी तरह फिल्माने के साथ उसकी फोटोग्राफी नहीं की गई होती तो वर्ष 1911 के इस दरबार की विशालता का आकलन करना मुश्किल ही नहीं असंभव होता। यहां एकत्र हुए महाराजाओं, चमकदार पीतल के साथ जुटे 34,000 सैनिकों, अंग्रेज वाइसराॅय के दल सहित शाही अमला, जहां अंग्रेज राजा ने 6,100 हीरे से जड़ित् भारत का शाही ताज पहना, मौजूद था। ऐसे में अर्बन के लिए फिल्म शूटिंग के हिसाब से इससे अधिक रंगदार घटना नहीं हो सकती थी।
वर्ष 1912 में पूरे लंदन में अंग्रेज राजा और रानी के हिंदुस्तान के दौरे का 150 मिनट का कार्यक्रम, जो कि तब तक की सबसे लंबा फिल्म शो था, प्रदर्शित किया गया। इसके साथ 48 वाद्य यंत्रों का एक ऑर्केस्ट्रा, गाने वाले 24 व्यक्तियों के एक दल सहित बांसुरी-ड्रम बजाने वाले थे जो कि फिल्म प्रस्तुति का अभिन्न अंग थे।
Saturday, December 2, 2017
Arrival of Rail in Delhi_दिल्ली में रेल आने की कहानी
देश की राजधानी के नागरिकों को आज यह बात जानकार अचरज होगा कि शहर में पर रेलवे लाइन कुछ हद तक एक अकाल राहत योजना के तहत बनी थी। जब दिल्ली में रेल पटरी बिछी तब अकाल के बाद कारोबार मंदा था और कुछ व्यापारी दूसरे शहरों को पलायन कर चुके थे। यहां के स्थानीय कारोबारियों में इस बात को लेकर निराशा थी कि आखिकार क्या उन्हें रेलवे से फायदा होगा?
दिल्ली में ईस्ट इंडिया रेलवे के बनने से कारोबार में नए सिरे से जान आई थी। दिल्ली के समृद्ध खत्री, बनिया, जैन और शेख, जिनके हाथों में शहर की अर्थव्यवस्था और खुदरा व्यापार था, और हस्तकला उद्योग के कर्ता-धर्ताओं की स्वाभाविक रूप से पंजाब-कलकत्ता रेलवे के कारण उपजी सकारात्मक संभावनाओं में रुचि थी।
इस प्रस्ताव पर पहली बार वर्ष 1852 में विचार किया गया था। देश की 1857 की पहली आजादी की लड़ाई के बाद अंग्रेजी भारत सरकार ने रेलवे लाइन के दिल्ली की बजाय मेरठ से निकलने का सुझाव दिया। इससे ब्रिटेन और दिल्ली में निराशा का माहौल बना। अंग्रेज दिल्ली में रेलवे के पक्ष में इस वजह से नहीं थे क्योंकि वे दिल्लीवालों को आजादी के पहले आंदोलन में भाग लेने की सजा देना चाहते थे।
ऐसा इसलिए भी था क्योंकि मूल निर्णय न केवल दिल्ली के सैन्य और राजनीतिक महत्व बल्कि पंजाब जाने वाली दूसरी रेलवे लाइन से भी संबंधित था। ईस्ट इंडिया रेलवे कंपनी के अंग्रेज़ निदेशकों ने इसका विरोध किया, लेकिन तत्कालीन गवर्नर जनरल लॉर्ड डलहौजी का मानना था कि यह रेलवे लाइन पूरी तरह से एक शाही और राजनीतिक महत्व वाली रेललाइन है जो कि एक व्यापारिक रेलवे लाइन से अलग है।
दिल्ली में वर्ष 1863 में एक बैठक हुई, जिसमें यह आग्रह किया गया कि शहर को उसकी रेलवे लाइन से वंचित नहीं किया जाना चाहिए। इस बैठक में कुछ अधिकारियों और सैकड़ों सम्मानित भारतीयों ने हिस्सा लिया। आजादी की पहली लड़ाई के पांच साल बाद जुटी यह एक बड़ी संख्या थी। इन लोगों में मुखर सदस्यों में हिंदू और जैन साहूकार, एक हिंदू, एक मुस्लिम और एक पारसी व्यापारी और पांच मुस्लिम कुलीन शामिल थे।उन्होंने सेक्रेटरी ऑफ स्टेट को दी एक याचिका में कहा कि रेलवे लाइन को हटाने से न केवल शहर का व्यापार प्रभावित होगा बल्कि यह रेलवे के शेयर खरीदने वालों के साथ अन्याय होगा। यह एक महत्वपूर्ण बात थी क्योंकि आमतौर पर चुनींदा भारतीयों ने ही ब्रिटिश भारतीय रेलवे कंपनियों के उद्यमों में निवेश किया था लेकिन यह वर्ष 1863 की बात थी जब यह कहा गया था कि दिल्ली के कुछ पूंजीपतियों ने शेयर खरीदे हैं।
इन व्यापारियों और पंजाब रेलवे कंपनी (जो कि ईस्ट इंडिया रेलवे के साथ दिल्ली में एक जंक्शन बनाना चाहती थी क्योंकि मेरठ अधिक दूरी पर था) के दबाव के नतीजन चार्ल्स वुड ने अंग्रेज वाइसराय के फैसले को पलट दिया। वर्ष 1867 में नए साल की पूर्व संध्या की अर्धरात्रि को रेल की सीटी बजी और दिल्ली में पहली रेल दाखिल हुई। दिल्ली के उर्दू शायर मिर्जा गालिब की जिज्ञासा का सबब इस लोहे की सड़क से दिल्ली शहर की जिंदगी बदलने वाली थी।
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