Saturday, October 13, 2018

Delhi's contribution in early hindi cinema_आरंभिक सिनेमा-साहित्य का दिल्ली सूत्र






सिनेमा और साहित्य को लेकर दिल्ली के संबंध की बात कम ही ध्यान में आती है। जबकि हकीकत इससे बिलकुल जुदा है। हिंदी की पहली साप्ताहिक फिल्मी पत्रिका “रंगभूमि” वर्ष 1932 में पुरानी दिल्ली के कूचा घासीराम से छपी। इस पत्रिका के प्रकाशक, त्रिभुवन नारायण बहल और संपादक नोतन चंद-लेखराम थे। वही 1934 के साल में दिल्ली के ऋषभचरण जैन ने राजधानी से “चित्रपट” के नाम से एक फिल्म पत्र प्रकाशित किया। सात रूपए के सालाना चंदे वाले इस फिल्म पत्र की एक प्रति दो आने की होती थी। उनकी हिंदी के मशहूर लेखकों जैसे प्रेमचंद, जैनेंद्र कुमार और चतुरसेन शास्त्री खासी दोस्ती थी। यही कारण था कि “चित्रपट” में इनकी रचनाएं प्रकाशित होती थी।

हिंदी सिनेमा में करीब 1500 गानों को गाने वाले मुकेश (चंद माथुर) का जन्म 22 जुलाई 1923 को दिल्ली के चांदनी चौक में ही हुआ था। इंजीनियर पिता लाला जोरावर चंद माथुर और मां चांदरानी की संतान मुकेश प्रसिद्व गायक अभिनेता कुंदनलाल सहगल की तरह गायक-अभिनेता बनने का ख्वाब देखा करते थे। दसवीं तक पढ़ाई करने के बाद स्कूल छोड़ने वाले मुकेश ने दिल्ली लोक निर्माण विभाग में बतौर सहायक सर्वेयर सात महीने तक नौकरी की। उनके दूर के रिश्तेदार मशहूर अभिनेता मोतीलाल ने उनकी आवाज सुनी और प्रभावित होकर वह उन्हें 1940 में बंबई ले आए। मुकेश ने नेशनल स्टूडियोज की फिल्म “निर्दोष” (1941) में अभिनेता-गायक के रूप में संगीतकार अशोक घोष के निर्देशन में अपना पहला गीत “दिल ही बूझा हुआ हो तो फसले बहार क्या” गाया। विनोद विप्लव “हिंदी सिनेमा के 150 सितारे” (प्रभात प्रकाशन) शीर्षक पुस्तक में लिखते हैं कि मुकेश को कामयाबी मिली निर्माता मजहर खान की फिल्म  “पहली नजर” (1945) के गीत “दिल जलता है तो जलने दे” से। जो कि संयोग से मोतीलाल पर ही फिल्माया गया था। अनिल विश्वास के संगीत में निर्देशन में डाक्टर सफदर आह सीतापुरी की इस गजल को मुकेश ने सहगल की शैली में ऐसी पुरकशिश आवाज में गाया कि लोगों को भ्रम हो जाता था कि इसके गायक सहगल हैं। इसी गीत को सुनने के बाद मुकेश को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया था।

गौरतलब है कि सदाबहार पार्श्व गायक मुकेश को फिल्मी दुनिया की राह दिखाने वाले मोतीलाल (राजवंश) भी दिल्ली के प्रतिष्ठित परिवार से संबंध रखते थे। 1935 में बनी “शहर का जादू” उनकी पहली फिल्म थी। हिंदी सिनेमा के स्वाभाविक अभिनय करने वाले आरंभिक कलाकारों में से एक मोतीलाल 1940 के दशक के सितारा अभिनेता थे। यह उनके अभिनय का ही कमाल था कि मोतीलाल को फिल्म “देवदास”(1955) में चुन्नी बाबू की भूमिका के फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता पुरस्कार मिला। इतना ही नहीं, उनका हैट लगाने का अंदाज एकदम निराला था। केवल अंदाज ही नहीं लक्ष्मी की भी, उन पर पूरी कृपा थी। उस समय अकेली ऐसी फिल्म हस्ती थे, जिनके पास अपना स्वयं का हवाई जहाज था।

“द हंड्रेड ल्यूमिनरीज आॅफ हिंदी सिनेमा” की प्रस्तावना में सुपर स्टाॅर अमिताभ बच्चन ने लिखा है कि इस महान और बेहद सजह अभिनय के धनी अभिनेता की प्रशंसा में अधिक कुछ नहीं लिखा गया है। वे (मोतीलाल) अपने समय से काफी आगे थे। अगर वे आज जीवित होते तो उनकी बहुमुखी प्रतिभा उनके लिए अब भी स्थान सुरक्षित रखती। हकीकत में वे आज भी हमारी तुलना में बेहतर अभिनय कर रहे होते। 


उर्दू के मशहूर शायर मिर्जा गालिब के दिल्ली में दफन होने की बात आम नहीं है। यह बात कम जानी है कि राजधानी में गालिब की मजार दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित फिल्मकार सोहराब मोदी के कारण सलामत है। उन्होंने ही हजरत निजामुद्दीन औलिया की खानकाह के पास गालिब की कब्र पर संगमरमर पत्थर चिनवा कर महफूज करवाया था वरना खुदा ही जाने क्या होता। उन्होंने यह काम हिंदी सिनेमा के इतिहास की यादगार फिल्म “मिर्जा गालिब” (1954) को राष्ट्रपति का स्वर्ण पदक जीतने के बाद श्रध्दा स्वरूप किया था। 

पूछते हैं वो के गालिब कौन है? 

कोई बतलाओ के हम बतलाएं क्या? 


यह तथ्यात्मक बात है कि फिल्म “मिर्जा गालिब” के पोस्टर पर भी हिंदी ही लिखा था। जबकि फिल्म में शायरी उर्दू थी, कल्चर उर्दू का था. तब भी (सेंसर बोर्ड) सर्टिफिकेट पर हिंदी ही लिखा था।


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