Saturday, January 18, 2020

Post Independent Legislative Journey of Delhi_स्वतंत्रता उपरांत दिल्ली की विधायी यात्रा

18012022, दैनिक जागरण 



देश की आजादी के बाद दिल्ली की राजनीतिक और प्रशासनिक व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन हुए हैं। उल्लेखनीय है कि स्वतंत्रता-पूर्व दिल्ली में अनेक स्थानीय निगम थे, जिसके प्रशासन का दायित्व मुख्य आयुक्त का था। 22 फरवरी 1951 को बने भाग सी राज्य (विधि) अधिनियम 1951 के तहत 17 मार्च, 1952 को दिल्ली राज्य विधानसभा अस्तित्व में आई। पुराना सचिवालय में लोकप्रिय सरकार के गठन के अवसर पर आयोजित समारोह का उद्घाटन करते हुए तत्कालीन केन्द्रीय गृह मंत्री श्री कैलाश नाथ काटजू ने इस कार्यक्रम को ”ऐतिहासिक राजधानी दिल्ली की कथा का एक गर्वीला क्षण” बताया था।


1952 की विधानसभा में 48 सदस्य थे। मुख्य आयुक्त को उसके कार्य के निष्पादन में सहायता और सलाह देने के लिए एक मंत्रिपरिषद का प्रावधान था। इन विषयों के सम्बन्ध में राज्य विधानसभा को कानून बनाने की शक्तियां दी गई थीं।

दिल्ली को एक लोकतांत्रिक व्यवस्था और एक उत्तरदायी शासन प्रदान करने के उद्देश्य और प्रशासनिक सुधार आयोग की सिफारिशों के आधार पर दिल्ली प्रशासन अधिनियम, 1966 को क्रियान्वित किया गया। इस अधिनियम के तहत "मेट्रोपोलिटन काउंसिल" नामक एक निकाय का प्रावधान किया गया, जिसे संस्तुतिपरक शक्तियां प्राप्त थी। इस तरह, दिल्ली प्रशासन में शीर्ष पर उपराज्यपाल अथवा प्रशासक का स्थान था, जिसकी नियुक्ति भारत के राष्ट्रपति करते थे। मेट्रोपोलिटन काउंसिल, एक सदनीय लोकतांत्रिक निकाय थी, जिसमें 56 निर्वाचित सदस्य और राष्ट्रपति की ओर से नामित पांच सदस्य होते थे।


दिल्ली में पहली मंत्रिपरिषद कांग्रेस के विधायक चौधरी ब्रह्म प्रकाश के नेतृत्व में बनी थी। फिर वर्ष 1955 में सरदार गुरुमुख निहाल सिंह मुख्यमंत्री बने जो कि एक साल (1956) तक इस पद पर रहे। राज्य पुनर्गठन आयोग की सिफारिशों के अनुसरण में, दिल्ली 1 नवंबर, 1956 से एक भाग सी का राज्य बन गया। जिसके परिणामस्वरूप दिल्ली विधान सभा और मंत्रिपरिषद को समाप्त कर दिया गया और दिल्ली राष्ट्रपति के प्रत्यक्ष शासन के तहत एक केंद्र शासित राज्य बन गया।


आयोग की एक अन्य सिफारिश के अनुसार, दिल्ली नगर निगम अधिनियम, 1957 को लागू किया गया। इस अधिनियम के तहत समूची दिल्ली के लिए नगर निगम का गठन किया गया, जिसके लिए सदस्यों का चुनाव वयस्क मताधिकार के आधार पर होने का प्रावधान था।


दिल्ली में आंरभिक अन्तरिम काल वाली महानगर परिषद के कार्यकाल (1966-1967) में एक ही सत्र हुआ, जिसके मुख्य कार्यकारी पार्षद मीर मुश्ताक अहमद थे। जबकि पहली महानगर परिषद के कार्यकाल (1967-1972) में 17 सत्र हुए, इस दौरान मुख्य कार्यकारी पार्षद प्रोफेसर विजय कुमार मल्होत्रा थे। दूसरी महानगर परिषद के कार्यकाल (1972-1977) में भी 17 सत्र हुए, जिसके कार्यकारी मुख्य पार्षद राधा रमण थे। तीसरी महानगर परिषद के कार्यकाल (1977-1980) में दस सत्र हुए, जिसके कार्यकारी मुख्य पार्षद केदारनाथ साहनी थे। चौथी महानगर परिषद के कार्यकाल (1983-1990) में बीस सत्र (जनवरी 1989 तक) हुए, जिसके मुख्य कार्यकारी पार्षद जगप्रवेश चन्द्र थे। दिल्ली में बनी मेट्रोपॉलिटन काउंसिल विधायी शक्तियों रहित थीं। काउंसिल की भूमिका शासन व्यवस्था में केवल एक सलाहकार की थी।


दिल्ली उपराज्यपाल की सहायता और सलाह के लिए मंत्रिपरिषद वाले एक पूर्ण राज्य की विधानसभा की आवश्यकता के अनुरूप, केन्द्र सरकार ने 24 दिसंबर 1987 को सरकारिया समिति (जिसे बाद में बालकृष्णन समिति का नाम दिया गया) का गठन किया। इस समिति का उद्देश्य केंद्र शासित प्रदेश दिल्ली के प्रशासन से जुड़े विभिन्न मुद्दों की समीक्षा और प्रशासनिक व्यवस्था को सुव्यवस्थित करने के उपायों की अनुशंसा करना था।


इस समिति ने 14 दिसंबर, 1989 को अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करते हुए दिल्ली को केंद्रशासित प्रदेश बने रहने की सिफारिश की। साथ ही समिति ने जन साधारण से जुड़े विषयों के समाधान के लिए पर्याप्त शक्ति सम्पन्न विधानसभा देने की बात भी कही। समिति ने राजधानी में स्थिरता और स्थायित्व को सुनिश्चित करने के लिए, राष्ट्रीय राजधानी को केंद्र शासित प्रदेशों के मध्य एक विशेष दर्जा देने के लिए संविधान में आवश्यक संशोधन की भी सिफारिश की।


बालकृष्णन समिति की  अनुशंसा   के अनुरूप, संसद ने संविधान (69 वाँ संशोधन) अधिनियम, 1991 पारित किया। जिसमें दिल्ली में एक विधान सभा के गठन के लिए संविधान में नए अनुच्छेद 239 एए और 239 एबी जोड़े गए। संसद ने राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली सरकार अधिनियम, 1991 को भी पारित किया जो कि विधान सभा और मंत्रिपरिषद से जुड़े संवैधानिक प्रावधानों से संबंधित है। विधानसभा को राज्य सूची में सभी मामलों या भारत के संविधान की समवर्ती सूची में सिवाय  प्रविष्टि   एक (सार्वजनिक व्यवस्था), दो (पुलिस) और 18 (भूमि) तथा राज्य सूची इन प्रविष्टियों से संबंधित 64, 65 और 66 प्रविष्टियों के अलावा समस्त कानून बनाने की शक्ति प्राप्त है।


इस तरह, दिल्ली में एक फरवरी 1992 से भारतीय संविधान के अनुच्छेद 239 के प्रभावी होने के बाद राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली के लिए एक विधान सभा की व्यवस्था बनी। इसी के अनुरूप दिल्ली विधानसभा की पहली बैठक 14 दिसम्बर 1993 को पुराना सचिवालय में आयोजित हुई।



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