Wednesday, June 15, 2016

Third city of Delhi_तुगलकाबाद_दिल्ली का तीसरा किलेबंद शहर



गयासुद्दीन तुगलक ने दिल्ली में एक नए राजवंश की नींव डाली परंतु यह कहना भूल है कि तुगलक किसी नस्ल अथवा वंश का नाम था। गयासुद्दीन का नाम गाजी तुगलक अथवा गाजी बेग तुगलक था। इस कारण इतिहास में उसके उत्तराधिकारियों को भी तुगलक पुकारा जाने लगा और उसका वंश तुगलक वंश कहलाया।


मुस्लिम इतिहासकार फरिश्ता के अनुसार, उसका पिता मलिक तुगलक बलबन का एक तुर्की गुलाम था जिसने एक हिंदू जाट स्त्री से विवाह किया था। उनका पुत्र गाजी तुगलक था जो गयासुद्दीन तुगलक (1321-1325), के नाम से दिल्ली के सिंहासन पर बैठा। खिलजी वंश के खुसरव शाह की हत्या करके उसने दिल्ली की गद्दी पर अधिकार कर लिया और सुल्तान बना।


तुगलक वंश के ग्यारह बादशाहों में से केवल पहले तीन ही वास्तुकला में दिलचस्पी रखते थे और इनमें से हरेक ने दिल्ली में एक नया राजधानी का नगर जोड़ा।


कहा जाता है कि गयासुद्दीन तुगलक ने यह स्थान अलाउद्दीन खिलजी, जिसकी सेना में वह सेनापति था, के साथ यात्रा के दौरान देखा था। इस स्थान के महत्व की तत्काल अनुभूति करते हुए गयासुद्दीन ने कहा, मेरे मालिक, यह वाजिब होगा अगर यहां एक नगर बसाया जाए। सुल्तान इससे प्रभावित नहीं हुआ था और उसने जवाब दिया, जब तुम सुल्तान बनोगे, तब बनाना।


वर्षों बाद जब गयासुद्दीन दिल्ली का सुल्तान बना, उसने इसी पहाड़ी क्षेत्र को अपने शासन का केन्द्र बनाने का निर्णय लिया। यहां उसने तुगलकाबाद का सुन्दर शहर बसाया। सिरी के उपरांत बना ऊंची बुर्जों और 13 दरवाजों वाला यह किलेबंद नगर तुगलकाबाद, जो आज भी अपने पूर्व स्थान पर स्थित है, दिल्ली का तीसरा नगर था।


तुगलकाबाद का निर्माण पुराने शहर के दक्षिण पूर्व में सहज सुरक्षित ऊंचे क्षेत्र पर स्थापित किया गया था। जबकि जहांपनाह का निर्माण पुराने शहर किला राय पिथौरा और सीरी के बीच के रिहायशी क्षेत्र को दीवारों के भीतर लाने के लिए किया गया था।


सुनसान पहाड़ियों पर खड़ा भूरे रंग के अनगढ़े पत्थर की ढलानदार दीवारों वाला किला तुगलकाबाद, जहां इसकी स्थिति को एक प्राकृतिक लाभ प्राप्त है, अपने नगर और दुर्ग सहित वास्तुकला संबंधी महत्वाकांक्षाओं वाले एक महानगर के बजाय एक गढ़ के रूप में बनवाया था। दूसरे शब्दों में उच्च कोटि की स्थापत्य कला से युक्त नगर की अपेक्षा कहीं सामरिक केन्द्र था।


तुगलकाबाद का किला कुतुब-बदरपुर सड़क पर कुतुब मीनार से लगभग आठ किलोमीटर पर एक चट्टानी पहाड़ी पर स्थित है। यह नगर दिल्ली का तीसरा नगर है जिसमें 65 किलोमीटर के परिणाम सहित योजना में मोटे तौर पर अष्टभुजाकार की 10 से 15 मीटर ऊंचे अनगढ़े पत्थरों से निर्मित दीवारों में अन्तरालों पर बुर्ज और फाटक है।


किला शब्द अरबी भाषा का है, जिसका अर्थ है-लड़ाई के समय रक्षा का एक सुरक्षित स्थान। इसी से किलेदार और किलेबंदी जैसे शब्द बने हैं। किले के लिए संस्कृत का शब्द है दुर्ग, जो दुर्गम शब्द से बना है, जिसका अर्थ है जहां सहजता से पहुंचने का रास्ता न हो।


तुगलकाबाद को मुख्यतः तीन भागों में बांटा गया था। कुतुब-बदरपुर सड़क से वर्तमान प्रवेश द्वार के पूर्व में ऊंची दीवारों और बुर्जों सहित एक आयताकार क्षेत्र किले का काम देता था। इसी प्रकार अनगढ़े पत्थरों की दीवारों और बुर्जों से घिरे पश्चिम में बिलकुल ही निकट विस्तृत क्षेत्र में महल बने हुए हैं।


इसके आगे उत्तर में शहर था जो अब घरों के खंडहरों से पहचाना जाता है। शहर की गलियां जिनके चिन्ह अब भी देखे जा सकते हैं, जो एक तरफ फाटकों से लेकर सामने की ओर के फाटकों तक एक समकोणात्मक रूप में जाती थीं। दुर्ग के अहाते के भीतर विजय मंडल के नाम से विख्यात एक बुर्ज है और अनेक बड़े बड़े कमरों के अवशेष हैं, जिनमें एक लम्बा भूमिगत मार्ग भी शामिल है।


तुगलकों की इमारतों की विषेषताएं हैं, भूरे पत्थर के सीधे साधे और कठोरतल, बड़े-बड़े कमरों के ऊपर मेहराबी छतों का होना और पुश्तेदार ढालू दीवारों और मुख्य रूप से कोनियों पर बुर्ज चार केन्द्रित मेहराबें और खुले भागों पर सरदलों का होना। मिट्टी या ईटों से बनी मोटी दीवारों के लिए बाहरी और ढालू को बनाना आवश्यक था परन्तु वह पत्थर की दीवार के लिए जरूरी नहीं था। इस पद्धति को तुगलकों ने सम्भवतः सिंध, पंजाब या अफगानिस्तान से लिया था जहां गारे या ईटों का इस्तेमाल होता था।


तुगलकाबाद का केवल परकोटा ही अब जैसे तैसे बचा हुआ है। सन् 2001 में भारत सरकार के पुरातत्व विभाग ने तुगलकाबाद में नए सिरे से उत्खनन करवाया था।


तुगलकाबाद की नियति यही थी कि उसके निर्माण के शीघ्र बाद ही उजड़ गया। कहा जाता है कि गयासुद्दीन को सूफी दरवेश निजामुद्दीन औलिया ने श्राप दिया था। गयासुद्दीन तुगलक चाहता था कि लोग आ-आकर उसे सलाम बजाते रहें और उसके काम की तारीफ करते रहें। लोग ऐसा किया भी करते थे, सिवाय ख्वाजा के। गयासुद्दीन ने ख्वाजा से इस बात की जवाबदेही मांगी।


तब ख्वाजा ने भविष्यवाणी की कि जल्द ही तुगलकाबाद का यह शहर बियावान बंजर में तब्दील हो नेस्तनाबूद हो जाएगा और यहां सिर्फ गूजर डकैतों का वास होगा। जब यह खबर सुल्तान तक पहुंची तो उसने ख्वाजा निजामुद्दीन को सबक सिखाने की ठान ली।




देश के पूर्वी क्षेत्रों में सुल्तान ने जहां जहां आक्रमण किया, उसकी जीत हुई। गयासुद्दीन तुगलक ने दिल्ली पहुंचने में थोड़ी ही देर बाकी थी कि उसने हुक्म जारी किया कि निजामुद्दीन की दरगाह को तबाह कर मिट्टी में मिला दिया जाय। जब शहर कोतवाल ने निजामुद्दीन को पहुंच कर यह शाही ऐलान बताया तो बस इतना कहा, “हुनूज दूर अस्त” (अभी दिल्ली दूर है)।


कोतवाल जैसे ही शहर पहुंचा, उसे खबर मिली कि सुल्तान के साथ कोई दुर्घटना हो गई है। अगले दिन संदेषवाहक सुल्तान की मौत की खबर लेकर पहुंचा कि ज बवह किसी फाटक की मेहराब टूटकर उसके ऊपर गिर पड़ी और सुल्तान की मौत हो गई। यह सन् 1325 ईस्वी की बात है। इस तरह ख्वाजा की भविष्यवाणी सच हो गुजरी।


तुगलकाबाद का विशाल किला जो तुगलक ने बनवाया था, शीघ्र ही सुनसान-बियाबान में बदल गया। यमुना नदी जो कभी इसकी प्राचीरों को छूती हुई बहा करती थी, अपना रूख बदलकर दूर चली गई। किले के सारे कुएं सूखकर जलविहीन हो गए। अब यहां सिर्फ सियारों, चमगादड़ों, उल्लुओं और गूजरों का बसेरा रह गया। कभी सुनहरी दिखनेवाली इसकी दीवारें भरभराकर ढह गई। बची रही सिर्फ गयासुद्दीन तुगलक की मजार, मानो अल्लाह ने यह भी चाहा हो कि वह अपनी आंखों अपने वैभव के सपनों के ध्वंसावशेष देखता रहे।



एक अन्य ऐतिहासिक आख्यान के अनुसार, उसकी (गयासुद्दीन तुगलक) हत्या उसके पुत्र और उत्तराधिकारी मुहम्मद बिन तुगलक ने की। 1321 में गयासुद्दीन तुगलक की मृत्यु के साथ ही तुगलकाबाद का अल्पकालिक वैभव भी समाप्त हो गया।


इब्न बतूता के अनुसार, जब सुल्तान गयासुद्दीन बंगाल में था तभी उसे उलूगखां (मुहम्मद बिन तुगलक का सुल्तान बनने से पहले का नाम) के चिंताजनक व्यवहार के समाचार प्राप्त हुए। उसे सूचना मिली कि वह अपने समर्थकों की संख्या बढ़ा रहा है और शेख निजामुद्दीन औलिया का चेला बन गया है। इस शेख के सुल्तान के संबंध अच्छे न थे। सुल्तान ने उलूगखां और निजामुद्दीन औलिया को दिल्ली पहुंचने पर दंड देने की धमकी दी, जिसके बारे में औलिया ने कहा कि "दिल्ली अभी बहुत दूर" है।


सुल्तान शीघ्रता से बंगाल से वापिस लौटा और उलुगखां ने उसके स्वागत के लिए नवीन राजधानी तुगलकाबाद से तीन या चार मील दूर अफगानपुर नाम गांव में एक लकड़ी का महल बनवाया। वह महल अहमद ऐयाज (जिसे बाद में उलूगखां उर्फ सुल्तान मुहम्मद तुगलक ने अपना वजीर बनाया) ने इस प्रकार बनवाया कि हाथियों के द्वारा एक विशेष स्थान पर धक्का लगने से वह गिर सकता था। भोजन के बाद, उलुगखां ने सुल्तान से बंगाल से लाए गए हाथियों के प्रदर्शन की प्रार्थना की। सुल्तान की आज्ञा से वे हाथी प्रदर्शित किए गए और उनका धक्का महल को लगा तो वह गिर गया और सुल्तान तथा उसका छोटा पुत्र महमूद उसमें दबकर मर गए। उलूगखां ने मलबा हटवाने में भी जानबूझकर देर की और जब सुल्तान व उसके पुत्र की लाशें उसमें से निकली तो सुल्तान अपने पुत्र पर इस प्रकार झुका हुआ पाया गया जैसे वह अपने पुत्र की रक्षा करना चाहता था।



इब्न बतूता को इस घटना के बारे में शेख रूकनुद्दीन ने बताया था जो उस समय महल में था और जिसे उलूगखां ने नमाज पढ़ने के बहाने उस समय उस स्थान से हटा दिया था। इस तरह तीसरी दिल्ली के सुलतान का गयासुद्दीन तुगलक का दर्दनाक अंत हुआ।


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