Monday, April 28, 2014

Delhi's presence in Films (फिल्मों में दिल्ली )


सन् 1947 में भारत के विभाजन के साथ एक नए स्वतंत्र राष्ट्र की राजधानी के रूप में दिल्ली के चाल चरित्र में बदलाव आया। पश्चिमी पाकिस्तान से अपने ही देश में शरणार्थी के रूप में आए पंजाबी, नौकरशाह, कलाकार, लेखक और राजनीतिकों के वर्ग की आमद के साथ राजधानी के सामाजिक ढांचे में व्यापक परिवर्तन आया। देश भर से सभी तबकों के व्यक्तियों के अपने भाग्य को आजमाने के लिए दिल्ली आने की प्रवृत्ति, जो आज भी अनवरत रूप से जारी है, के परिणामस्वरूप दिल्ली "लघु भारत" के रूप में परिवर्तित हो गयी।
विभाजन के साथ मुसलमानों के उच्च वर्ग के पाकिस्तान पलायन करने के साथ पुरानी दिल्ली की तहजीब और सामाजिक शिष्टाचार में भी व्यापक परिवर्तन आया। नए उभरते भारत के साथ उसकी राजधानी दिल्ली की संस्कृति भी इंद्रधनुषी हो गई।
स्वतंत्र भारत में पहली बार केंद्र सरकार ने भी संस्कृति के क्षेत्र में प्रवेश किया। सन् 1950 में संस्कृति के क्षेत्र में राष्ट्रीय पहल के रूप में साहित्य, ललित कलाओं सहित दूसरी कलाओं को बढ़ावा देने के उद्देश्य से साहित्य अकादेमी, ललित कला अकादेमी और संगीत नाटक अकादेमी की दिल्ली में स्थापना की गई। उसके बाद राष्ट्रीय नाट्य स्कूल बनाया गया, जिसने रंगमंच कलाकारों और अभिनेता-अभिनेत्रियों को प्रशिक्षित करना शुरू किया। इनमें से कुछ-एक ने फिल्मी दुनिया में भी अपनी धाक जमाईं।
सन् 1950 में दिल्ली में फिल्म पर पहली संगोष्ठी हुई। भारतीय सिनेमा की पहली अभिनेत्री देविका रानी इस संगोष्ठी का सबसे बड़ा आकर्षण थी। इसमें बंबई, कलकत्ता और मद्रास की फिल्मी दुनिया की तत्कालीन सभी नामचीन हस्तियां शामिल हुई। जिसमें देवकी बोस, अहिंद्रा चौधरी, बी सान्याल, पंकज मल्लिक, वी. शांताराम, पृथ्वीराज कपूर, नरगिस, दुर्गा खोटे, राज कपूर, किशोर साहू, विमल राय, अनिल बिस्बास, ख्वाजा अहमद अब्बास, दिलीप कुमार, वासन जैमिनी प्रमुख थे। दिल्ली के प्रतिनिधिमंडल में उदयशंकर, रंजन, कवि नरेंद्र शर्मा थे।
इस जमावड़े में अनेक साहित्यकारों, फिल्म संगीतकारों और सिनेमा के फोटोग्राफरों ने भी हिस्सा लिया। इस संगोष्ठी की शुरुआत पंकज मल्लिक ने अपनी सुरमई आवाज में वेदों के एक गीत से की। तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने इस संगोष्ठी में शामिल कलाकारों के सम्मान में अपने सरकारी निवास पर एक रात्रि भोज दिया। इस संगोष्ठी के आयोजन से पूर्व भारत सरकार ने सर्वश्रेष्ठ फिल्म के लिए राष्ट्रीय सम्मान की स्थापना कर दी थी।
इस अखिल भारतीय सांस्कृतिक प्रतियोगिता में सभी भारतीय भाषाओं की फिल्मों ने हिस्सा लिया। पहला पुरस्कार, विमल राॅय को उनकी फिल्म "दो बीघा जमीन" के लिए प्राप्त हुआ।
तब से लेकर अब तक के बरसों के सफर में दिल्ली मुख्यधारा की हिंदी फिल्मों के सबसे बड़े बाजार के रूप में उभरी है।
इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं कि हिंदी फिल्में आज की दिल्ली की युवा पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करती है। जिनमें हिंदी के साथ अंग्रेजी का समावेश और पंजाबी शब्दों का इस्तेमाल साफ नजर आता है। यहां तक कि फिल्म निर्माताओं और निर्देशकों के फिल्मी कथानक भी देश की एकता की भावना के सामाजिक सरोकारों को दर्शाते हैं।

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